एक समय था जब पश्चिम बंगाल भारत की आर्थिक रीढ़ था। 1960 के दशक में राज्य का राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान 10.5% हुआ करता था और यह तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था। कोयला, जूट, स्टील उद्योगों का केंद्र कोलकाता (तब कलकत्ता) एशिया का लंदन कहलाता था। लेकिन 34 वर्षों के वामपंथी 34 साल का वाम राज और फिर ममता के 15 साल।
वर्षों (2011-2026) ने इसे औद्योगिक दृष्टि से खस्ताहाल बना दिया। आज राज्य का राष्ट्रीय जीडीपी में शेयर मात्र 5.5% रह गया है। और इसे राष्ट्रीय औसत के साथ तालमेल बिठाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। संरचनात्मक खामियां और ‘सिंडिकेट’ की नई संस्कृति ने औद्योगिक विकास की रीढ़ तोड़ दी है।
वाम मोर्चा सरकार ने सत्ता संभालते ही भूमि सुधारों के नाम पर औद्योगिक विकास की बलि चढ़ा दी। 1978 के ‘ऑपरेशन बार्गा’ ने लाखों बटाईदारों को मालिकाना हक तो दिया, लेकिन इसके बदले औद्योगिक भूमि अधिग्रहण को लगभग असंभव बना दिया। नतीजा यह हुआ कि बड़े निवेशक टाटा, बिड़ला जैसे समूह बंगाल से पलायन करने लगे।
1980 के दशक तक 2,500 से अधिक कारखाने बंद हो चुके थे, और औद्योगिक जीएसडीपी का हिस्सा घटकर 13 प्रतिशत के आसपास सिमट गया। आरबीआई की ‘हैंडबुक ऑफ स्टैटिस्टिक्स’ के अनुसार, 1990-91 में राज्य का जीडीपी शेयर 8.2 प्रतिशत था, जो 2010-11 तक घटकर 6.6 प्रतिशत रह गया। इस दौरान हड़ताल संस्कृति ने उत्पादकता को नष्ट कर दिया। हर साल औसतन 100 से अधिक हड़तालें दर्ज की गईं, जो राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक थीं।
उम्मीदों पर पानी
2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो आशा की किरण जगी। मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि चार वर्षों में बंगाल को आर्थिक रूप से नंबर-1 बना देंगी। लेकिन सिंगुर का टाटा नैनो प्रोजेक्ट उसी वर्ष विफल हो गया। 400 एकड़ भूमि पर किसानों ने तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के नेतृत्व में कब्जा कर लिया और 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहण को अवैध घोषित कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि 2,000 करोड़ का निवेश डूब गया और टाटा गुजरात चला गया, जहां आज वह सफलता का प्रतीक है। ऐसे ही, नंदीग्राम विवाद ने निवेशकों का भरोसा तोड़ दिया।
नीति आयोग और सांख्यिकी मंत्रालय के वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 2011 के बाद बंगाल में ‘पंजीकृत कारखानों’ की संख्या में उस अनुपात में वृद्धि नहीं हुई जैसी गुजरात, महाराष्ट्र या तमिलनाडु में देखी गई। 2011-12 में भारत के कुल फैक्ट्री आउटपुट में बंगाल का योगदान 2.9% था, जो 2022-23 की रिपोर्टों के अनुसार लगभग 2.5% पर स्थिर या मामूली गिरावट के साथ बना हुआ है। इसका मुख्य कारण राज्य की ‘भूमि नीति’ है। ममता सरकार ने स्पष्ट किया कि सरकार उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण नहीं करेगी। इस नीति ने बड़े प्रोजेक्ट के लिए दरवाजे बंद कर दिए, क्योंकि निजी कंपनियों के लिए बंगाल जैसे घनी आबादी वाले राज्य में सीधे किसानों से जमीन खरीदना एक प्रशासनिक और कानूनी दुःस्वप्न बन गया।
भाग रहीं कंपनियां
कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2011 से 2025 तक 6,688 कंपनियां या तो बंद हुई हैं या गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक जैसे राज्यों में चली गईं। इनमें से 1,800 से अधिक तो अकेले गुजरात गई हैं जिससे राज्य को 5 लाख प्रत्यक्ष रोजगार मिले और पश्चिम बंगाल ने ये रोजगार खो दिए।
इस पतन को जीडीपी भागीदारी के आंकड़े बयान करते हैं। 2011-12 में पश्चिम बंगाल शीर्ष पांच राज्यों में था-महाराष्ट्र (15.4%), तमिलनाडु (8.8%), उत्तर प्रदेश (8.2%), गुजरात (7.5%) के बाद 6.6 प्रतिशत शेयर के साथ वह देश की जीडीपी में सबसे ज्यादा योगदान करने वाला पांचवां राज्य था। लेकिन 2019-20 तक यह घटकर 5.8 प्रतिशत हो गया, और 2023-24 में तो 5.5 प्रतिशत पर सिमट गया। आरबीआई हैंडबुक (2024-25) के टेबल 28-29 से स्पष्ट है कि औद्योगिक जीएसडीपी का हिस्सा 17.2 प्रतिशत से गिरकर 13.9 प्रतिशत रह गया। विकास दर भी निराशाजनक रही। 2024-25 में महज 5.6 प्रतिशत, जो राष्ट्रीय औसत से नीचे है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के राज्यवार जीएसडीपी आंकड़ों से पता चलता है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में गिरावट 19 प्रतिशत से अधिक हुई, जबकि आईटी जैसे क्षेत्रों में मामूली वृद्धि हुई।
रूठ गया निवेश
एफडीआई के मामले में स्थिति और भी बुरी है। 2014-20 के बीच बंगाल को 12,000 करोड़ रुपये का एफडीआई मिला, लेकिन 2020-25 में यह घटकर 6,500 करोड़ रह गया- यानी 46 प्रतिशत की कमी। नीति आयोग की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि 17 बड़े राज्यों में बंगाल का एफडीआई प्रवाह सबसे निचले पायदान पर है। डीपीआईआईटी आंकड़ों से स्पष्ट है कि गुजरात को सालाना औसतन 40,000 करोड़ मिलते हैं, जबकि बंगाल को 1,300 करोड़। इसका कारण श्रम सुधारों का अभाव है। केंद्र के 9 श्रम कोड लागू करने में बंगाल अकेला राज्य है जो पूरी तरह विफल रहा।
नेताओं से परेशान होकर दी जान
साजिद हुसैन एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले महत्वाकांक्षी उद्यमी थे। उन्होंने रियल एस्टेट और निर्माण क्षेत्र में छोटे स्तर पर अपना काम शुरू किया था। न्यू टाउन क्षेत्र, जो बंगाल का ‘आईटी हब’ माना जाता है, वहां साजिद कुछ छोटे प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे। साजिद ने जुलाई 2021 में आत्महत्या कर ली थी।
साजिद की मौत के बाद उनके परिवार द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत और पुलिस जांच में जो तथ्य सामने आए, वे ‘सिंडिकेट’ की कार्यप्रणाली को नंगा करते हैं।
सिंडिकेट के सदस्यों ने साजिद पर दबाव डाला कि वह निर्माण के लिए ईंट, बालू और पत्थर केवल उन्हीं से खरीदें। सिंडिकेट द्वारा दी जाने वाली निर्माण सामग्री की गुणवत्ता बेहद खराब तो थी ही, उसकी कीमत भी बाजार भाव से 30-40% अधिक थी। जब साजिद ने घटिया माल लेने से मना किया, तो उनसे भारी ‘सिंडिकेट टैक्स’ की मांग की गई। उन्हें साइट पर काम रोकने की धमकियां दी गईं और उनके मजदूरों को पीटा गया। लगातार मानसिक प्रताड़ना, वित्तीय घाटे और सिंडिकेट के बाहुबलियों के डर से टूटकर साजिद ने आत्महत्या कर ली। अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने जो सुसाइड नोट और साक्ष्य छोड़े, वे सीधे तौर पर स्थानीय सिंडिकेट के नेताओं की ओर इशारा कर रहे थे।
साजिद की मौत के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए पश्चिम बंगाल पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी और जांच की निगरानी के आदेश दिए।
सिंडिकेट राज
विश्व बैंक और डीपीआईआईटी (उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग) द्वारा जारी ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में पश्चिम बंगाल अक्सर मध्य या निचले पायदान पर रहा है। हालांकि कागजों पर ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ जरूर है, लेकिन जमीन पर एक नई समानांतर अर्थव्यवस्था का उदय हुआ जिसे ‘सिंडिकेट’ कहा जाता है। निर्माण सामग्री की आपूर्ति से लेकर श्रम बल की भर्ती तक, स्थानीय राजनीतिक गुटों का हस्तक्षेप इतना गहरा है कि परियोजना लागत 20-30% तक बढ़ जाती है। यह ‘सिंडिकेट राज’ ही वह कारक है जिसने मध्यम और लघु उद्योगों की कमर तोड़ दी है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जगदीश भगवती और अरविन्द पनगढ़िया ने अपनी विभिन्न टिप्पणियों और लेखों में बंगाल के मॉडल की आलोचना की है। विशेष रूप से, बंगाल की औद्योगिक गिरावट पर प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष बिबेक देबरॉय ने साफ कहा है कि बंगाल ‘उत्पादक विनिर्माण’ को आकर्षित करने में विफल रहा।
अर्थशास्त्री द्वैपायन भट्टाचार्य अपनी पुस्तक “गवर्नमेंट ऐज इफिजीःपॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स इन पोस्ट लेफ्ट बंगाल” (2016 के बाद के संदर्भों में) में लिखते हैं:
“बंगाल में विकास का मॉडल ‘पूंजीवादी निवेश’ के बजाय ‘राजनीतिक वितरण’ आधारित हो गया है। राज्य सरकार का ध्यान बुनियादी ढांचे के निर्माण या औद्योगिक क्लस्टर्स विकसित करने के बजाय प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण जैसी लोकलुभावन योजनाओं पर अधिक है, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है और दीर्घकालिक औद्योगिक निवेश के लिए धन की कमी हो गई है।”
यह मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब राज्य औद्योगिक विकास में गिरता जा रहा हो, विकास दर लुढ़कती जा रही हो और कमाई के स्रोत सूखते जा रहे हों।
नाबार्ड और आरबीआई की रिपोर्ट
आरबीआई के ‘हैंडबुक ऑफ स्टैटिस्टिक्स ऑन इंडियन स्टेट्स’ के अनुसार, पश्चिम बंगाल पर कर्ज का बोझ 2011 में लगभग 1.9 लाख करोड़ था, जिसके 2024-25 तक बढ़कर 6.5 लाख करोड़ को पार कर जाने का अनुमान है। राज्य की अपनी कर आय का एक बड़ा हिस्सा ऋण के ब्याज और वेतन/पेंशन में चला जाता है।
सीआईआई (कन्फेडरेशन ऑफ इंडस्ट्री) के एक आंतरिक सर्वे (2022) के अनुसार, बंगाल में निवेश न आने के तीन प्रमुख कारण हैं: पहला, उद्योगों के लिए बड़े भूखंडों का अभाव। दूसरा, कर्मचारी यूनियनों का आपसी संघर्ष और राजनीतिक वसूली से बिगड़ा माहौल और तीसरा, औद्योगिक पार्कों में बिजली और लॉजिस्टिक्स की लागत पड़ोसी राज्यों (ओडिशा और झारखंड) की तुलना में अधिक होना।
आईटी और नए तरह के उद्योगों से दूरी: जब बेंगलुरु, हैदराबाद और नोएडा आईटी हब बन रहे थे, बंगाल ‘एसईजेड’ नीति के विरोध में उलझा रहा। इंफोसिस और विप्रो जैसे दिग्गजों को बंगाल में विस्तार करने के लिए सालों तक इंतजार करना पड़ा क्योंकि सरकार एसईजेड का दर्जा देने के खिलाफ थी। स्थिति यह है कि बाहर से निवेश की तो बात ही छोड़िए, बंगाल के स्थानीय उद्यमी भी अपना विस्तार राज्य के बाहर कर रहे हैं। यहां तक कि ‘हल्दिया’ जैसा औद्योगिक केंद्र भी अब प्रशासनिक सुस्ती और सिंडिकेट की वजह से अपनी चमक खो रहा है। बंगाल की आर्थिक बदहाली एक बड़ी चेतावनी है। सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि 2011 के बाद बंगाल ने कथित ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर ‘औद्योगिक न्याय’ की बलि दे दी। जब तक ‘सिंडिकेट’ की समानांतर सत्ता को खत्म नहीं किया जाता और भूमि अधिग्रहण की नीतियों में व्यावहारिक बदलाव नहीं लाया जाता, तब तक बंगाल अपनी खोई हुई औद्योगिक विरासत को वापस नहीं पा सकेगा। आज का बंगाल उत्पादन के बजाय उपभोग पर आधारित अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है, जो किसी भी बड़े राज्य के लिए स्थायी भविष्य नहीं हो सकता।
स्रोत: वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण, सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, 2011-2023.भारतीय रिजर्व बैंक: भारतीय राज्यों पर सांख्यिकी पुस्तिका, 2023-24. नीति आयोग: निर्यात तत्परता सूचकांक और एसडीजी इंडिया सूचकांक रिपोर्ट. नाबार्ड: राज्य फोकस पत्र – पश्चिम बंगाल, 2024-25.विश्व बैंक: भारतीय राज्यों में व्यापार करने में आसानी का आकलन.
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