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होम भारत

अमदाबाद विस्फोट : फांसी और फांस

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार गुजरात हाई कोर्ट ने 38 आतंकवादियों को को फांसी की सजा सुनाई है। दुर्भाग्य की बात यह है कि अधिकतर मुस्लिम संगठनों ने इस सजा पर आपत्ति जताई है। वे इन्हें आतंकी मानने को तैयार नहीं हैं

Written byपाञ्चजन्यपाञ्चजन्य
Aug 4, 2026, 07:42 pm IST
inभारत, गुजरात
अमदाबाद में 2008 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की तस्वीर ( फाइल फोटो)

अमदाबाद में 2008 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की तस्वीर ( फाइल फोटो)

26 जुलाई, 2008 की शाम अमदाबाद लगभग 70 मिनट तक सिलसिलेवार बम धमाकों से दहल उठा। शहर के अलग-अलग हिस्सों में हुए विस्फोटों में 56 लोगों की मौत हुई और 246 लोग घायल हो गए। बाजारों, सार्वजनिक स्थानों और अस्पतालों को निशाना बनाकर किए गए इस आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। करीब 18 वर्ष बाद, 7 जुलाई, 2026 को गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले में विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए 38 दोषियों की मृत्युदंड की सजा और 11 दोषियों की आजीवन कारावास की सजा की पुष्टि कर दी। साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को मृतकों के निकटतम परिजनों तथा घायलों के लिए बढ़ा हुआ मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह फैसला आतंकवाद के विरुद्ध भारत की न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।

70 मिनट में हुए थे 21 धमाके

26 जुलाई, 2008 को शाम करीब 6:45 बजे से 7:55 बजे के बीच अमदाबाद में सिलसिलेवार विस्फोट हुए। उपलब्ध न्यायिक और समाचार अभिलेखों के अनुसार शहर के लगभग 20 स्थानों पर 21 धमाके हुए। इनका प्रभाव सार्वजनिक बसों, बाजारों और अन्य भीड़भाड़ वाले स्थानों तक रहा। अस्पतालों को भी निशाना बनाया गया, जहां पहले विस्फोटों में घायल लोगों का उपचार चल रहा था। इस कारण हमले की भयावहता और बढ़ गई।

यह हमला गुजरात के इतिहास की सबसे घातक आतंकी घटनाओं में से एक था और देश के सबसे गंभीर आतंकी हमलों में भी इसकी गिनती होती है। दो दिन बाद सूरत में भी कई जिंदा बम बरामद किए गए, हालांकि वे विस्फोटित नहीं हुए।

इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी जिम्मेदारी

विस्फोटों से कुछ मिनट पहले कई टेलीविजन चैनलों को इंडियन मुजाहिदीन की ओर से 14 पृष्ठों का एक ईमेल भेजे जाने की बात जांच में सामने आई। इसकी विषय पंक्ति थी-“Await 5 minutes for the revenge of Gujarat.” ईमेल में इंडियन मुजाहिदीन की ओर से हमले की जिम्मेदारी लेने का दावा किया गया था। इसमें 2002 के गुजरात दंगों का उल्लेख करते हुए हमले को कथित प्रतिशोध से जोड़ने का प्रयास किया गया था। ईमेल में महाराष्ट्र के कुछ राजनेताओं, उद्योगपति मुकेश अंबानी और कुछ बॉलीवुड अभिनेताओं को भी धमकी दी गई थी। इसमें 2002 की गुजरात हिंसा और अन्य बम धमाका मामलों में मुस्लिम आरोपियों के विरुद्ध चल रहे मुकदमों का भी उल्लेख था।

जांच के दौरान कुछ स्रोतों ने हमले को हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (हूजी) से जुड़े ऑपरेटिव्स से भी जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि अमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में अभियोजन और न्यायिक कार्रवाई का मुख्य केंद्र इंडियन मुजाहिदीन और प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से जुड़े आरोपियों की कथित भूमिका रही।

इस हमले को वर्ष 2008 में देश के विभिन्न शहरों में हुई आतंकी गतिविधियों की व्यापक कड़ी के संदर्भ में भी देखा गया। 25 जुलाई को बेंगलुरु में सिलसिलेवार धमाके हुए थे और 13 सितंबर को दिल्ली में बम धमाके हुए। कुछ इंटरसेप्टेड संचार के संदर्भ में इन घटनाओं को ‘ऑपरेशन BAD’ से जोड़कर भी देखा गया।

जांच में सामने आई बहुस्तरीय साजिश

गुजरात पुलिस ने केंद्रीय एजेंसियों के सहयोग से अमदाबाद सीरियल ब्लास्ट की जांच को आगे बढ़ाया। जांच के दौरान कई आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इनमें बड़ी संख्या में सिमी से जुड़े या उससे संबंधित बताए गए लोग शामिल थे। जांच के प्रमुख बिंदुओं में ईमेल की तकनीकी पड़ताल, मोबाइल फोन रिकॉर्ड का विश्लेषण, विस्फोटों में इस्तेमाल वाहनों की बरामदगी, सीसीटीवी फुटेज और विस्फोटक उपकरणों में इस्तेमाल सामग्री की जांच शामिल थी।

जांच में सामने आया कि कई सिम कार्ड को महीनों पहले कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सक्रिय किया गया था और धमाकों से ठीक पहले उन्हें निष्क्रिय कर दिया गया। ईमेल को नवी मुंबई के एक आईपी एड्रेस तक ट्रैक किए जाने की बात भी सामने आई, जिसके बाद एक अमेरिकी नागरिक से पूछताछ और उसके निवास पर छापे की कार्रवाई की गई।

जांच एजेंसियों ने चोरी किए गए विस्फोटक-युक्त वाहनों, सीसीटीवी फुटेज, जिनमें पुणे टोल प्लाजा का फुटेज भी शामिल था, तथा बमों में इस्तेमाल एलपीजी सिलेंडरों और लकड़ी के क्रेटों के स्रोत की पड़ताल की। बेंगलुरु और अमदाबाद में आतंकी गतिविधियों का उल्लेख करने वाले इंटरसेप्टेड संचार को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।

मामले में दो हजार से अधिक पृष्ठों की चार्जशीट दाखिल की गई। मुकदमे के दौरान हजारों दस्तावेज और बड़ी संख्या में गवाहों के बयान अदालत के सामने रखे गए।

78 आरोपी, 49 दोषी

इस मामले में कुल 78 आरोपियों के विरुद्ध विशेष अदालत में मुकदमा चला। आरोपी गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल और अन्य राज्यों से जुड़े थे। इनमें पूर्व सिमी नेता सफदर नागोरी और संगठन से जुड़े कई अन्य आरोपी भी शामिल थे।
8 फरवरी 2022 को विशेष अदालत ने 49 आरोपियों को दोषी ठहराया और 28 को बरी कर दिया। इसके बाद 18 फरवरी, 2022 को अदालत ने 38 दोषियों को मृत्युदंड और 11 को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

एक ही मामले में 38 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के कारण इस फैसले को भारतीय न्यायिक इतिहास में अभूतपूर्व माना गया। विशेष अदालत का यह फैसला इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण था कि इतने बड़े आतंकी षड्यंत्र में शामिल दोषियों को एक साथ कठोरतम दंड दिया गया। 7 जुलाई, 2026 को गुजरात हाई कोर्ट की खंडपीठ ने विशेष अदालत के फैसले के विरुद्ध दायर अपीलों पर फैसला सुनाया। अदालत ने 38 दोषियों की मृत्युदंड की सजा और 11 अन्य दोषियों की आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी।

फैसले के साथ अदालत ने पीड़ितों के लिए मुआवजे की राशि भी बढ़ाई। मृतकों के निकटतम परिजनों को 10 लाख रुपए, गंभीर रूप से घायल लोगों को 5 लाख रुपए और साधारण रूप से घायल लोगों को एक लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया गया। यह भुगतान 31 मार्च 2027 तक किए जाने का आदेश दिया गया है।

असाधारण रूप से बड़ा मुकदमा

अमदाबाद सीरियल ब्लास्ट का मुकदमा भारत के सबसे जटिल और लंबे समय तक चले आतंकी मुकदमों में शामिल रहा। घटना के बाद विशेष अदालत के फैसले तक 13 वर्ष से अधिक समय लगा और हाई कोर्ट में अपीलों पर निर्णय आने में भी लगभग चार वर्ष लगे।
मामले में अनेक एफआईआर को एक साथ जोड़कर जांच और सुनवाई की गई। अभियोजन ने बड़ी संख्या में गवाहों, दस्तावेजों और भौतिक साक्ष्यों को अदालत के सामने प्रस्तुत किया। जांच का दायरा गुजरात से बाहर के कई राज्यों तक फैला हुआ था।

इस पूरे मामले में फोरेंसिक साक्ष्य, कॉल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक डेटा, अनुमोदक के बयान और विभिन्न बरामदगियों को महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। जांच एजेंसियों के अनुसार यह एक बहु-राज्यीय साजिश थी, जिसमें प्रशिक्षण, संसाधन जुटाने और हमलों को अंजाम देने के लिए विभिन्न स्थानों पर मौजूद नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया।

उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार विशेष अदालत का फैसला लगभग 7,015 पृष्ठों का था, जबकि गुजरात हाई कोर्ट का विस्तृत लिखित फैसला करीब 2,215 पृष्ठों का बताया गया है। इसलिए मूल लेख में हाई कोर्ट के फैसले के लिए दिए गए 2,223 पृष्ठों के आंकड़े को संशोधित करना उचित होगा।

फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

इस मामले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही आतंकी मामले में 38 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया गया और गुजरात हाई कोर्ट ने भी उस सजा की पुष्टि कर दी। हालांकि अंतिम न्यायिक परिणाम सुप्रीम कोर्ट में संभावित अपील और उसके निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा। हाई कोर्ट के फैसले में मृत्युदंड के लिए निर्धारित ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ सिद्धांत के संदर्भ में मामले की गंभीरता पर विचार किया गया। अदालत के सामने साजिश का व्यापक पैमाना, आम नागरिकों को निशाना बनाना, सार्वजनिक स्थानों और अस्पतालों पर हमले तथा बड़े पैमाने पर भय पैदा करने के आरोप जैसे तथ्य महत्वपूर्ण रहे। अदालत ने यह भी माना कि अभियोजन के अनुसार यह केवल एक शहर तक सीमित घटना नहीं थी, बल्कि व्यापक आतंकी साजिश का हिस्सा थी। फैसले में आरोपियों के आचरण और अपराध की गंभीरता से जुड़े पहलुओं पर भी विचार किया गया। हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपियों ने अपने कृत्य या मुकदमे की प्रक्रिया के दौरान पश्चाताप प्रदर्शित नहीं किया।

राजीव गांधी हत्याकांड से तुलना

इस मामले की तुलना अक्सर राजीव गांधी हत्याकांड से की जाती है। 28 जनवरी, 1998 को चेन्नई की पूनामल्ली विशेष टाडा अदालत ने मुकदमे का सामना कर रहे सभी 26 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड दिया था। हालांकि अपील पर 11 मई, 1999 को सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले में बड़ा बदलाव किया। शीर्ष अदालत ने 19 दोषियों को बरी कर दिया, तीन की मृत्युदंड की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया और चार प्रमुख दोषियों की मृत्युदंड की सजा बरकरार रखी। बाद में इन चारों में से किसी को भी फांसी नहीं दी गई। समय के साथ कानूनी प्रक्रिया के तहत उनकी सजा में भी परिवर्तन हुआ। इस तुलना से स्पष्ट होता है कि अमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में 38 मृत्युदंड की पुष्टि भारतीय न्यायिक इतिहास में अत्यंत असाधारण स्थिति है।

न्याय की निर्णायक कसौटी

अमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामला केवल 56 निर्दोष लोगों की हत्या का मुकदमा नहीं है। यह उस व्यापक आतंकी नेटवर्क की जांच, अभियोजन और न्यायिक परीक्षण का उदाहरण है, जिसने एक सुनियोजित साजिश के तहत आम नागरिकों को निशाना बनाया।
18 वर्ष बाद आया गुजरात हाई कोर्ट का फैसला यह संदेश देता है कि आतंकवादी हिंसा के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया लंबी हो सकती है, लेकिन गंभीर अपराधों के लिए कानून के तहत जवाबदेही तय की जा सकती है। इस मामले में जांच की व्यापकता, मुकदमे की जटिलता और न्यायिक परीक्षण का स्तर आने वाले वर्षों में आतंकवाद से जुड़े मामलों के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बनेगा।

38 मृत्युदंड की पुष्टि को इसलिए भारतीय न्यायिक इतिहास की एक असाधारण घटना के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि अंतिम निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई के बाद ही निकलेगा। यही संवैधानिक न्याय व्यवस्था की विशेषता है-सबसे गंभीर अपराधों में भी अंतिम न्यायिक निर्णय निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार ही होता है।

Topics: फांसी की सजासिमीइंडियन मुजाहिदीनपाञ्चजन्य विशेषआतंकवाद पर प्रहार#अमदाबाद विस्फोटअमदाबाद सीरियलन्यायिक फैसलाहाईकोर्टगुजरातब्लास्ट
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