पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : घुसपैठ का वोटशास्त्र
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पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : घुसपैठ का वोटशास्त्र

पश्चिम बंगाल में न केवल घुसपैठ हो रही है, बल्कि यह जनमत को भी प्रभावित कर रही है, इसलिए इस बार के विधानसभा चुनाव में यह एक बड़ा मुद्दा है

Written byआराधना शरणआराधना शरण
Apr 14, 2026, 11:00 am IST
inविश्लेषण, पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में घुसपैठ एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इसलिए विशेष तौर पर चुनावों के दौरान यह मुद्दा गरमा जाता है। क्या घुसपैठिये भारत के नागरिक बन रहे हैं और क्या अब वे, खास तौर पर सीमाई जिलो में, लोकमत को भी प्रभावित करने लगे हैं? ये प्रश्न उत्तर मांगते हैं। उत्तर भी ऐसा जो निर्विवाद हो, उसमें संदेह की कोई गुंजाइश न हो। मूल प्रश्न पर आने से पहले जरा याद करते हैं वर्ष 2000 में क्रिकेट मैच फिक्सिंग के भांडे का फूटना। इसमें उस बात के बारे में ठोस सबूत मिल गए थे जिसकी आशंका बहुत लोगों को पहले से थी। यह खुलासा संयोग से ही हुआ था जिसमें दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट कप्तान हंसी क्रोनिए की अविश्वसनीय संलिप्तता का पता चला था। संयोग इसलिए कि दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा उद्योगपतियों से रंगदारी मांगने के कुछ संदिग्धों के फोन टैप कर रही थी और उसी में मैच फिक्सिंग के सुराग हाथ लग गए। यानी खोज कुछ रहे थे, हाथ लग गया कुछ और। अमेरिका के हड्सन इंस्टीट्यूट और पश्चिम बंगाल में घुसपैठ के मामले में भी ऐसा ही हुआ। बंगाल में होने वाली घुसपैठ और बाहरी लोगों को नागरिक बनाने के आरोप साबित हो गए।

घुसपैठ के ठोस प्रमाण

हड्सन इंस्टीट्यूट एक अंतरराष्ट्रीय नीति शोध संस्थान है जो अमेरिकी सरकार के लिए इनपुट जुटाता है। इसने कार्नेगी एनडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के साथ मिलकर बांग्लादेश के सीमाई इलाकों पर शोध किया। इसके लिए पैसे अमेरिका के विदेश मंत्रालय से मिले और इरादा था इस क्षेत्र के लिए अमेरिकी नीति की दिशा तय करने के लिए जमीनी स्थितियों के बारे में ठोस जानकारी इकट्ठा करना। 2023 से 2024 के दिसंबर तक दो साल यह प्रोजेक्ट चला और इसके मुख्य शोधकर्ता थे सदन मुखर्जी जो बीएसएफ में बतौर अधिकारी काम कर चुके थे और उन्हें घुसपैठ के लिए अपनाए जाने वाले तौर-तरीकों की अच्छी जानकारी भी थी। यह शोध पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों मुर्शिदाबाद (66% मुस्लिम), मालदा (51% मुस्लिम), उत्तर दिनाजपुर, नदिया, उत्तर 24 परगना के 150 से अधिक गांवों/ प्रखंडों में किया गया। इसमें 12 सौ प्रभावित परिवारों, 800 बीएसएफ/पुलिस अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों से बात की गई। इनके अलावा डिटेंशन सेंटरों में रह रहे 500 संदिग्ध घुसपैठियों की बातें भी दर्ज की गईं। इसके बाद मिली जानकारी का बीएसएफ के रिकॉर्ड और जनगणना के आंकड़ों से मिलान किया गया। इसके साथ ही उपग्रह से प्राप्त चित्रों के आधार पर इसकी पड़ताल की गई कि जिन इलाकों में रिहाइश बढ़ने के दावा किया जा रहा है, क्या उपग्रह से मिले चित्र उसकी पुष्टि करते हैं?

तृणमूल और मदरसों का नेटवर्क सक्रिय

2024 में यह शोध रिपोर्ट यूके से प्रकाशित होने वाले ‘जर्नल ऑफ एशियन सिक्योरिटी एंड इंटरनेशनल अफेयर्स’ में “बांग्लादेश इनफिल्ट्रेशन एंड डेमोग्राफिक चेंज इन ईस्टर्न इंडिया” शीर्षक से छपी।

इस शोध का अनुमान है कि भारत में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या 1.2 करोड़ है जिनमें 57 लाख अकेले पश्चिम बंगाल में हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2011 से 2023 के दौरान शोध के इलाकों में मुस्लिम आबादी में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि वहां से 8 प्रतिशत हिन्दुओं का पलायन हुआ। शोध घुसपैठ कराने की एक संस्थागत व्यवस्था विकसित होने की बात करता है। इसमें स्थानीय तृणमूल कार्यकर्ताओं, वक्फ बोर्ड और मदरसों का नेटवर्क मदद करता है।

“इस तरह भारत में फर्जी तरीके से आने वाले 70 प्रतिशत घुसपैठिये आधार कार्ड और वोटर आईडी बनवा लेते हैं। शोध से यह भी पता चलता है कि मुर्शिदाबाद के 40 से ज्यादा गांवों में जनसांख्यिकी इस तरह बदल गई है कि ये ‘नो हिन्दू जोन’ बन गए हैं।” शोध कहता है कि वर्ष 2024 के दौरान देश में घुसपैठ की 40 हजार घटनाएं हुईं जिनमें से 25 हजार से ज्यादा अकेले पश्चिम बंगाल में हुईं।

क्यों रिपोर्ट भरोसे के लायक

अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर हड्सन की इस रिपोर्ट पर भरोसा क्यों किया जाए? इसका जवाब है शोध के तरीके में, जिसमें जमीनी जानकारी को कई स्रोतों से जांचा-परखा गया, तकनीक की कसौटी पर कसा गया। सदन मुखर्जी और उनकी टीम ने गूगल अर्थ इंजन प्लेटफॉर्म का उपयोग करके डेटा प्रोसेस किया। इसकी पुष्टि करने के लिए इसरो के नेशनल रिमोट सेन्सिंग सेंटर से डेटा लिया गया और फिर उसके बाद ‘यूएसजीएस अर्थ एक्सप्लोरर, कॉपरनिकस ओपन ऐक्सेस हब’ से डेटा डाउनलोड किया गया। इसमें हाई रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरें ली गईं और फिर 2011 और 2023 की स्थितियों की तुलना की गई।

इसके जरिये देखा गया कि किन इलाकों में विस्तार हुआ, कहां निर्माण हुआ, निर्माण घनत्व में क्या बदलाव आया, कृषि भूमि में क्या अंतर आया। इससे पता चला कि इस अवधि, यानी 2011 से 2023 के दौरान मुर्शिदाबाद में कृषि भूमि में 12 प्रतिशत और मालदा में 9 प्रतिशत की कमी आई जबकि यहां नई झोपड़पट्टी/मस्जिदों के निर्माण में क्रमशः 25 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस अवधि में मुर्शिदाबाद में 42 और मालदा में 28 नए गांव बस गए। गंगा-पद्मा नदी के कटान से भी नई बस्तियां बनीं। इन बस्तियों के निर्माण की पुष्टि सेन्टिनल-2 से भी हुई। सेन्टिनल-2 पृथ्वी पर नजर रखने के लिए कॉपरनिकस कार्यक्रम के अंतर्गत चलाया जा रहा मिशन है।

गौर करने वाली बात यह है कि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में उभर आई ये बस्तियां वक्फ और मदरसे की जमीन पर बनाई गई हैं। इन नई बस्तियों पर रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले बीएसएफ के रिकॉर्ड से भी मिलान किया गया जिससे इन निर्माण की पुष्टि हुई। इस रिपोर्ट का निष्कर्ष यही है कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों को नागरिक बनाने का एक नेटवर्क काम कर रहा है जिसमें सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के साथ-साथ अग्रणी मुस्लिम संगठन बराबर की भूमिका निभा रहे हैं। अब यह देखना जरूरी है कि इस शोध के नतीजे क्या किन्हीं और विश्वसनीय संगठनों के अध्ययन से मेल खाते हैं?

गवाही देतीं अन्य रिपोर्टें

संयुक्त राष्ट्र की प्रवासन एजेंसी है इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन (आईओएम)। यह मानवीय, सुरक्षित और व्यवस्थित प्रवासन को बढ़ावा देने पर 1951 से काम कर रही है। इसकी 2023 की रिपोर्ट ‘इरेगुलर माइग्रेशन इन साउथ एशिया’ में पश्चिम बंगाल का भी उल्लेख है। इसके अनुसार 2022 में 12 हजार रोहिंग्या/बांग्लादेशियों ने घुसपैठ की जिनमें से 60 प्रतिशत पश्चिम बंगाल पहुंचे। संस्था ने ‘ढाका-कोलकाता रूट’ पर एक हजार प्रवासियों से भी बात की। वहीं, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) की 2025 की दक्षिण एशिया की रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल में 50 हजार से ज्यादा रोहिंग्या रह रहे हैं लेकिन सरकार उन्हें शरणार्थी के तौर पर रजिस्टर नहीं कर रही।

बीएसएफ के आंकड़ों से भी पुष्टि

बीएसएफ के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठ के प्रयास लगातार बढ़ रहे हैं। 2023 में घुसपैठ के ऐसे 1,181 मामले दर्ज हुए, 2024 में 1,516 और 2025 के मार्च तक 384 मामले सामने आ चुके हैं। कुल मिलाकर तीन वर्षों में 2,688 घुसपैठिये पकड़े गए और उन्हें वापस सीमा पार भेज दिया गया। ध्यान रहे कि भारत-बांग्लादेश सीमा का बड़ा हिस्सा पश्चिम बंगाल से लगता है। चुनाव आयोग के एसआईआर प्रक्रिया शुरू करने के कुछ ही दिनों के भीतर हाकीपुर चेकपोस्ट से करीब 1,600 बांग्लादेशी स्वेच्छा से लौट गए, जिससे साफ होता है कि फर्जी तरीके से नागरिक बन गए लोगों में दहशत का माहौल बना क्योंकि वोटर आई कार्ड, आधार कार्ड, राशन कार्ट बना लेना भर यह साबित करने के लिए काफी नहीं था कि वे भारत के नागरिक हैं।

जाहिर है, घुसपैठियों को वोटर बनाकर सियासी मकसद साधने का खेल लंबे समय से चल रहा है। भाजपा इसी तरह के आरोप ममता बनर्जी पर लगाती रही है। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया के दौरान वोटर सूची में धांधली के आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि राज्य मशीनरी एसआईआर प्रक्रिया को अंदर से कमजोर कर रही है। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों पर जिला निर्वाचन अधिकारियों को फोन कर ‘गलत तरीके से नाम रखवाने’ का आरोप लगाया, जिसमें मृत, डुप्लिकेट, फर्जी वोटर और घुसपैठिए शामिल हैं। सुवेंदू अधिकारी ने भाजपा मुख्यालय में पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन से 20 विधानसभा क्षेत्रों के दस्तावेज दिखाए, जहां प्रत्येक बूथ में 50-150 मृत वोटरों के नाम रखे गए थे। उन्होंने डुप्लिकेट एंट्री और अवैध घुसपैठियों के उदाहरण भी दिए। उन्होंने अनुमान जताया कि बंगाल में 90 लाख फर्जी वोटर हो सकते हैं।

पश्चिम बंगाल में सरकारी शह पर हो रही घुसपैठ का सच सामने आ चुका है। जिन आरोपों को ममता बनर्जी सियासत बताकर झुठलाती रहीं, केंद्र की ओर से की जा रही राजनीति बताती रहीं, उन्हें ऐसे प्रमाणों ने साबित कर दिया, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता।

स्पष्ट है कि बंगाल में व्यवस्थात्मक तरीके से घुसपैठियों को नागरिक बनाने का खेल चल रहा है जिसमें तृणमूल कांग्रेस, वक्फ बोर्ड और मदरसों के नेटवर्क सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ममता ने अपने सालों के कार्यकाल के दौरान और कुछ किया हो या न किया हो, इस ‘वोटशास्त्र’ पर रिसर्च जरूर कर लिया और इसे जमीन पर उतारने का तरीका भी खोज निकाला। यही कारण है कि जब उनपर पश्चिम बंगाल में घुसपैठियों को नागरिक बनाकर उन्हें वोटबैंक की तरह इस्तेमाल करने के आरोप लगते हैं, तो वह इसे सिरे से नकार देती हैं।

(स्रोत- हड्सन इंस्टीट्यूट रिपोर्ट 2024,
आईओएम रिपोर्ट 2023, यूएनएचसीआर रिपोर्ट 2025)

Topics: तृणमूल कांग्रेसअवैध बांग्लादेशी घुसपैबंगाल चुनावमदरसा और वक्फ बोर्ड नेटवर्कपाञ्चजन्य विशेषबीएसएफ डेटापश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावबंगाल चुनाव 2026सीमावर्ती जिलेएसआईआर प्रक्रियाफर्जी वोटर आईडीजनसांख्यिकीय परिवर्तनघुसपैठ का वोटशास्त्ररोहिंग्या शरणार्थीहड्सन इंस्टीट्यूट रिपोर्ट
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