पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : ‘माटी’ से मुठभेड़
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होम भारत पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : ‘माटी’ से मुठभेड़

यह संक्रमण राज्य को किस दिशा में ले जाता है, यह इसपर निर्भर करेगा कि “माटी” को केवल नारे में रखा जाता है या उसे पुनः सांस्कृतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया जाता है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 16, 2026, 06:35 pm IST
inपश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा केवल एक चुनावी उद्घोष नहीं था, बल्कि यह 34 वर्षों के वामपंथी शासन के बाद एक नए बंगाल के उदय का संकल्प था। ममता बनर्जी ने जब इस नारे को बुलंद किया, तो बंगाल की जनता को नई उम्मीद दिखी। यहां ‘माटी’ संस्कारगत शुचिता थी। किंतु, पिछले एक दशक के घटनाक्रमों, विशेषकर संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं के बाद, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या बंगाल की वह पावन माटी अब राजनीतिक रक्तपात, संस्थानिक भ्रष्टाचार और ‘धमकी की संस्कृति’ में तब्दील हो चुकी है? क्या बंगाल ‘सभ्यतागत पतन’ के दौर से गुजर रहा है?

भद्रलोक परंपरा बनाम ‘धमकी-हिंसा’ की संस्कृति

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन अपनी पुस्तक “ दि आर्गुमेंटेटिव इंडिया” में भारतीय, विशेषकर बंगाली परंपरा को “तर्क और बहस की संस्कृति” के रूप में रेखांकित करते हैं। यह तर्कशीलता ही “माटी” का केंद्रीय तत्व है- जहां असहमति को स्थान मिलता है, और सत्ता के विरुद्ध प्रश्न करना सांस्कृतिक स्वभाव होता है। लेकिन आज के बंगाल में ‘संवाद’ का स्थान ‘विस्फोटकों’ और ‘लाठियों’ ने ले लिया है। यहां राजनीतिक विरोध का अर्थ अब केवल वैचारिक असहमति नहीं, बल्कि भौतिक अस्तित्व को मिटा देने वाला कारक हो गया है जिसका उदाहरण समय-समय पर दिखता रहा है। 2021 के विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद बंगाल ने वह मंजर देखा जिसे स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ‘अभूतपूर्व’ कहा जा सकता है। सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं न जीत का जश्न विरोधियों को चुन-चुनकर निशाना बनाकर मनाया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

इस रक्तपात पर अधिवक्ता अनिंद्य सुंदर दास, प्रियंका टिबड़ेवाल और कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिकाएं डालीं। याचिकाओं में कहा गया कि राज्य पुलिस मूकदर्शक बनी रही और हजारों लोग पड़ोसी राज्यों (असम और ओडिशा) में शरण लेने को मजबूर हुए। पीड़ितों को उनके ‘राजनीतिक झुकाव’ के कारण निशाना बनाया गया। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने की। खंडपीठ ने राज्य सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि “हिंसा छिटपुट थी”। कोर्ट ने कहा: “जब राज्य का तंत्र जानबूझकर एक वर्ग विशेष को प्रताड़ित होने देता है, तो वह ‘रूल ऑफ लॉ’ नहीं, बल्कि ‘लॉ ऑफ रूलर’ बन जाता है। एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को केवल इसलिए अपना घर छोड़ना पड़े क्योंकि उन्होंने अपनी पसंद का वोट दिया, यह हमारे सभ्य समाज के माथे पर कलंक है।” न्यायालय ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि पुलिस ने कई मामलों में एफआईआर तक दर्ज नहीं की थी, जिससे अपराधियों को ‘संस्थानिक संरक्षण’ की बात साफ होती है।

मानवाधिकार आयोग ने की पुष्टि

कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मौका मुआयना किया। 13 जुलाई 2021 की उसकी रिपोर्ट पश्चिम बंगाल के समकालीन इतिहास का सबसे काला अध्याय मानी जाती है। यह रिपोर्ट केवल आंकड़ों का संकलन नहीं थी, बल्कि राज्य में ‘लोकतंत्र की विफलता’ का गंभीर दस्तावेज थी। आयोग ने राज्य के विभिन्न जिलों का दौरा किया और हजारों पीड़ितों से मुलाकात की। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव बाद की हिंसा में 57 लोगों की हत्या की पुष्टि हुई जिनमें विपक्षी दलों के कार्यकर्ता और आम नागरिक शामिल थे। लगभग 2,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। आयोग को कुल 1,979 शिकायतें मिलीं, जिनमें से कई सामूहिक बलात्कार, यौन उत्पीड़न और लूटपाट से संबंधित थीं। हजारों लोगों को असम और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों में शरण लेनी पड़ी। रिपोर्ट में इसे ‘आंतरिक विस्थापन’ का गंभीर मामला बताया गया।

स्वतःस्फूर्त नहीं थी हिंसा

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि यह हिंसा स्वतःस्फूर्त नहीं थी, बल्कि सत्ताधारी दल (तृणमूल कांग्रेस) के समर्थकों द्वारा मुख्य विपक्षी दल (भाजपा) के समर्थकों के विरुद्ध की गई ‘बदले की कार्रवाई’ थी। रिपोर्ट में पुलिस पर भी कड़ा प्रहार किया गया। आयोग ने कहा कि “स्थानीय पुलिस या तो पूरी तरह निष्क्रिय रही या हिंसा में शामिल रही।” पुलिस ने पीड़ितों की एफआईआर दर्ज करने से इनकार किया और कई मामलों में अपराधियों को भागने में मदद की। जांच दल ने पाया कि ग्रामीण इलाकों में इतना डर था कि लोग बयान देने से घबरा रहे थे।

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने भी 2019 के लोकसभा और 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान हुई हिंसा के पैटर्न का अध्ययन करने के बाद जारी रिपोर्ट में कहा कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा अब आकस्मिक नहीं रही, बल्कि एक “संरचनात्मक प्रवृत्ति” बन गई है। यह चुनावी प्रतिस्पर्धा, स्थानीय सत्ता संघर्ष और राजनीतिक प्रक्रियाओं के भीतर गहराई से समाहित हो चुकी है।

धार्मिक त्योहारों का इस्तेमाल

बंगाल का मूल मंत्र था- “धर्मो जार जार, उत्सव सोबार” (धर्म जिसका भी हो, उत्सव सबका है)। दुर्गा पूजा और ईद यहां साझा विरासत का हिस्सा थे। लेकिन 2010 के बाद से बंगाल के सामाजिक ताने-बाने में एक गहरा बदलाव आया है। बंगाल में अब धार्मिक जुलूस भक्ति के बजाय ‘शक्ति प्रदर्शन’ और ‘ध्रुवीकरण’ का माध्यम बन गए हैं। रामनवमी और मुहर्रम जैसे त्योहारों के समय होने वाली हिंसा अब एक वार्षिक पैटर्न बन चुकी है।

ममता ने बंगाल की ‘माटी’ का मतलब ही बदल डाला है। बंगाल की माटी को पुनः पावन बनाने के लिए ‘सांस्कृतिक शुचिता’ वापस लानी होगी जहां असहमति का सम्मान हो, महिलाओं की सुरक्षा राजनीति का विषय न होकर संस्कार का हिस्सा हो, और यह शासन की संवेदनशीलता में बराबर झलके।

सत्ता का रक्तस्नान

यह अजीब सी संस्कृति है। चुनाव नतीजे मनमाफिक आएं तो जश्न में हिंसा, और नहीं आएं तो हताशा में हिंसा! 2019 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा 42 में से 18 सीटें जीत जाती है, तब तृणमूल कार्यकर्ता भाजपा के 15 कार्यकर्ता/समर्थकों को मार डालते हैं। चुनाव परिणाम के बाद नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स ने राज्य के सभी जिलों का मौका मुआयना करके हिंसा को दर्ज किया।

  • नॉर्थ 24 परगनाः हिंसा की घटनाएं- 36, मृतक- 16 (भाजपा के 8 और तृणमूल का 1),
    घायल- 32 भाजपा के, 3 आम लोग और 1 पुलिसकर्मी।
  • पूर्वी वर्दमानः हिंसक घटनाएं- 4, मृतक- 1 (भाजपा), घायल- 7 (4 भाजपा के,3 तृणमूल)।
  • पश्चिम मिदनापुरः हिंसक घटनाएं- 2, मृतक- 1 (भाजपा), घायल- 6 (भाजपा)।
  •  बांकुराः हिंसक घटनाएं- 4, मृतक- 1 (भाजपा), घायल- 5 (3 भाजपा)।
  •  नदियाः हिंसक घटनाएं- 7, मृतक- 1 (भाजपा)।
  • मालदाः हिंसक घटनाएं- 1, मृतक- 1 (भाजपा)।
  •  कूच बिहारः हिंसक घटनाएं- 13, मृतक- 1 (भाजपा), घायल- 24 (22 भाजपा)।
Topics: धमकी की संस्कृतिसभ्यतागत पतनमांमानुष: ममता बनर्जीराजनीतिक हिंसामाटी की शुचिताबंगाल चुनावबंगाल की मिट्टीपाञ्चजन्य विशेषभद्रलोक परंपरासंदेशखालीसंवाद बनाम विस्फोटकबंगाल चुनाव 2026चुनाव बाद हिंसाध्रुवीकरणलॉ ऑफ रूलरमाटीसंस्थानिक भ्रष्टाचार
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