‘स्मृति और विस्मृति के संघर्ष में हमारी विजय अभी शेष’
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होम मत अभिमत

‘स्मृति और विस्मृति के संघर्ष में हमारी विजय अभी शेष’

राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी भारत का बौद्धिक और शैक्षणिक वि-औपनिवेशीकरण अधूरा है। सभ्यतागत स्मृति, स्वदेशी ज्ञान और शिक्षा की पुनर्स्थापना के बिना आत्मनिर्भर भारत का स्वप्न भी अधूरा रहेगा

Written byजे. नन्दकुमारजे. नन्दकुमार
Aug 3, 2026, 08:01 pm IST
inमत अभिमत, संघ @100
जतंर मंतर पर विरोध प्रदर्शन का एक दृश्य

जतंर मंतर पर विरोध प्रदर्शन का एक दृश्य

भारत की दीर्घ और जीवंत ज्ञान परम्परा के विषय में कुछ भी कहने से पूर्व हमें एक मूलभूत प्रश्न पर विचार करना होगा। क्या पराधीन मानस के साथ व्यक्ति मुक्त चिंतन कर सकता है? प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से 15 अगस्त 2022 को ‘पञ्च-प्रण’ का आह्वान किया। इसमें एक प्रण था देश के समक्ष “औपनिवेशिक मानसिकता और पराधीनता के हर अंश को समाप्त करना।” यह एक शैक्षणिक और सभ्यतागत कार्य है, कठिन कार्य है, क्योंकि इससे हमें परिवेश को नहीं, अपितु अपनी दृष्टि को बदलना है।
जब भी मैं सोचता हूं कि वि-औपनिवेशीकरण (decolonisation) क्यों महत्वपूर्ण है, तो मुझे मिलान कुंदेरा का उपन्यास The Book of Laughter and Forgetting याद आता है।

उपन्यास की शुरुआत फरवरी 1948 से होती है। प्राग के एक बारोक महल की बालकनी से कम्युनिस्ट नेता क्लेमेंट गॉटवाल्ड एक विशाल जनसमूह को संबोधित कर रहे हैं। मौसम बहुत ठंडा है और बर्फ गिर रही है। गॉटवाल्ड ने सिर पर कुछ नहीं पहन रखा है। उनके साथी व्लादिमीर क्लेमेंटिस अपना फर वाला हैट उतारकर उनके सिर पर रख देते हैं। उस क्षण की तस्वीर लाखों प्रतियों में छपती है। हर बच्चा स्कूल की पाठ्यपुस्तकों और संग्रहालयों में वही फोटो देखकर बड़ा होता है। लेकिन कुछ समय बाद क्लेमेंटिस सत्ता की दृष्टि में अपराधी घोषित कर दिए जाते हैं और चार वर्ष बाद उन्हें देशद्रोह के आरोप में फांसी दे दी जाती है। इसके बाद सरकारी प्रचार तंत्र चुपचाप उस तस्वीर से क्लेमेंटिस को मिटा देता है। ऐसा लगता है मानो वे कभी वहां थे ही नहीं। उनकी उपस्थिति का केवल एक निशान बचता है-वह फर वाला हैट, जो अब भी गॉटवाल्ड के सिर पर दिखाई देता है।

कुंदेरा इस घटना को एक ऐसी चेतावनी में बदल देते हैं, जो किसी भी राष्ट्र को बेचैन कर सकती है। उनके उपन्यास का एक पात्र कहता है, “किसी राष्ट्र को मिटाने का पहला कदम उसकी स्मृति को मिटाना होता है। उसकी किताबें, उसकी संस्कृति और उसका इतिहास नष्ट कर दो। फिर कोई नई किताबें लिखे, नई संस्कृति गढ़े और नया इतिहास बना दे। कुछ ही समय में वह राष्ट्र यह भूलने लगेगा कि वह कौन था और उसका अतीत क्या था।” सत्ता के विरुद्ध मनुष्य का संघर्ष, दरअसल स्मृति और विस्मृति के बीच का संघर्ष है।”
इन पंक्तियों को धीरे-धीरे पढ़िए। यह टैंकों या सीमाओं की बात नहीं कर रही हैं। यह उस पाठ्यक्रम की बात कर रही हैं, जिसके माध्यम से लोगों को इतिहास और अपनी पहचान सिखाई जाती है।हमारी परम्परा में भी इस प्रक्रिया का भली-भांति विश्लेषण किया गया है, जो मुझे आज भी हतप्रभ करता है। भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण क्रमवार यह प्रक्रिया बताते हैं-
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।2.62।।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63।।

अर्थात्—विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्ति से कामना पैदा होती है। कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

देखिए, यह शृंखला कहां घातक बनती है। क्रोध नहीं, मोह नहीं-स्मृतिभ्रंश। स्मृति का नाश होने पर। इसके बाद तो बुद्धिनाश निश्चित है। कुंदेरा बीसवीं सदी के एक सर्वसत्तावादी (टोटेलिटेरियन) राज्य के बारे में जो लिखते हैं और गीता एक साधक के अंतर्मन का जो वर्णन कर रही है, दोनों का संदेश एक है। स्मृतिलोप विवेकहीनता को जन्म देगा। अविवेकी का कोई सार्थक अस्तित्व नहीं। यह किसी भी व्यक्ति और समाज, दोनों पर समान रूप से लागू होता है।

जो यह कल्पना करते हैं कि वे अलग रह सकते हैं, उनके लिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है-
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।।
लोक-स्मृति के संघर्ष काल में तटस्थ रहना निर्दोष होना नहीं है। यह भी मौन-अपराध है।

शिक्षा से आरंभ होने वाला परिवर्तन

  • जब हम उपनिवेशवाद शब्द सुनते हैं, तो सैनिकों और संधियों, अधिकृत क्षेत्र और आर्थिक शोषण की कल्पना करते हैं। किंतु सबसे प्रभावी उपनिवेशवाद कभी भी भूमि का नहीं, बल्कि विचारों का रहा है। राजनीतिक शासन 1947 में समाप्त हो गया। मानसिक उपनिवेशवाद भाषा और पाठ्यक्रमों के माध्यम से बना रहा। “पाश्चात्य ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है” -यह अवधारणा समाप्त नहीं हुई।
    औपनिवेशिक शिक्षा किसी उद्देश्य के साथ रची गई थी और वह उद्देश्य स्पष्ट था। इसका लक्ष्य ऐसे मानस तैयार करना था, जो उपनिवेशक (शासक) की प्रशंसा करें और अपनी ही विरासत से लज्जित अनुभव करें। ज्ञान केंद्रीकृत कर दिया गया। हमारी अपनी परम्पराओं को मिथक, फोकलोर और अन्धविश्वास कहकर तिरस्कृत कर दिया गया।कुछ पीढ़ियों में एक सूक्ष्म परिवर्तन हुआ। हम स्वयं को कमतर आंकने लगे। अपने विचारों के लिए बाहर से स्वीकृति की अपेक्षा करने लगे। पाणिनि, आर्यभट्ट और भरतमुनि जैसी मेधा को जन्म देने वाली सभ्यता का बौद्धिक आत्मविश्वास धीरे-धीरे क्षीण होने लगा और हमारी सभ्यतागत स्मृति टूटने लगी।मैंने इस विनाश को बौद्धिक उपनिवेश के छह ‘I’ के रूप में सोचना शुरू किया है। वे पृथक रोग नहीं, बल्कि एक लंबी व्याधि के चरण हैं।
  • पहला है Insensibility (बेसुधता)-अपनी सभ्यता के प्रति भावनात्मक और बौद्धिक संवेदनशून्यता। संवेदनशून्यता घातक है। यह स्वाभाविक नहीं है; लंबी अवधि में निर्मित की जाती है, जब तक कोई व्यक्ति अपने आधार के प्रति उदासीन और थोड़ा संशयपूर्ण नहीं हो जाता।
  •  दूसरा है Ignorance (अज्ञान) –अपनी ही बौद्धिक विरासत से सामान्य अपरिचय। या तो सामान्य रूप में हम जागरूक नहीं होते, या कई बार जानबूझकर अज्ञानता में रखा जाता है।
  •  तीसरा है Irreverence (अनादर)-यहां स्वदेशी परम्पराओं की केवल उपेक्षा ही नहीं की जाती, उनका उपहास भी बनाया जाता है। देखिए कि कैसे रामायण और महाभारत को कक्षाओं में “मिथक” बताया जाता है, जबकि यूनानी और नॉर्डिक मिथकों को उनकी प्रतीकात्मकता और गहराई के लिए गंभीरता से पढ़ाया जाता है। यह दोहरा मापदंड इतना सामान्य हो गया है कि हम उसे पहचान भी नहीं पाते।
  •  चौथा है Ill-will (कुभावना) – सभ्यतागत स्व-अभिव्यक्ति के प्रति द्वेषभाव, जहां कुछ भी भारतीय पढ़कर शंका की दृष्टि से देखा जाता है और उसे पिछड़ा, प्रतिक्रियावादी या संदिग्ध मान लिया जाता है; जैसे अपनी जड़ों की ओर मुड़ना ही किसी प्रकार का अपराध हो।
  •  पांचवां है Inaction (निष्क्रियता)- यह दुःखद है, क्योंकि यह उन्हीं लोगों की विफलता है जो वास्तव में बेहतर जानते हैं। वे विकृतियों और झूठे षड्यंत्रों को देख पाते हैं, पर संस्थागत दबाव, उपहास के भय या आलस्य के कारण मौन रहते हैं। दिनकर इन्हीं लोगों के बारे में लिख रहे थे।
  • छठा है Incompetence (अक्षमता) — इस बिंदु पर हमने अपनी भाषाई, पद्धतिगत और दार्शनिक उपकरण खो दिए हैं, जो हमें अपने स्रोतों से सीधे संवाद करने के योग्य बनाते थे। अब हम कोई संस्कृत ग्रन्थ स्वयं नहीं पढ़ पाते। हमें अपने ही पूर्वजों के ग्रन्थालय का अन्वेषण करने के लिए पश्चिमी मध्यस्थ की आवश्यकता पड़ती है। मेरे लिए यह सबसे दुःखद है।

यही शिक्षा के वि-औपनिवेशीकरण का मार्ग है। न तो यह अस्वीकृति का कार्य है और न ही अतीत में पीछे हटना। यह पुनर्स्थापना का कार्य है-ज्ञान-गरिमा की पुनर्स्थापना और लोगों द्वारा अपनी मौलिक दृष्टि से सत्य का अनुसंधान करने के अधिकार की पुनर्प्राप्ति। कुंदेरा ने सत्ता के विरुद्ध संघर्ष को स्मृति और विस्मृति के बीच का संघर्ष कहा। बेन ओकरी ने दूसरे दृष्टिकोण से लगभग वही बात कही, “किसी राष्ट्र को विष देने के लिए उसकी कथाओं को विषाक्त करो।” दोनों ही विचारकों का निष्कर्ष समान है। कोई जन-समूह तभी वास्तव में स्वतंत्र होता है, जब उसने याद रखने का अधिकार और अपनी कथा अपनी भाषा में कहने का अधिकार वापस पा लिया हो।

वैश्विक संदर्भ में वि-औपनिवेशीकरण, यह एक उचित सवाल है और मैं इसे सामान्यतः सुनता रहता हूं। परस्पर जुड़े हुए इस वैश्विक ग्राम में क्या वि-औपनिवेशीकरण अव्यावहारिक नहीं है? क्या यह हमें अलग-थलग नहीं कर देगा? क्या हम केवल स्वयं से ही बातें करते रहेंगे? मैं ऐसा नहीं मानता और कारण सरल है-वि-औपनिवेशीकरण अलगाव नहीं है; यह स्व-जागरण के साथ सहभाग है। हम आधुनिक विज्ञान का बहिष्कार नहीं कर रहे, न ही वैश्विक संवाद से मुंह मोड़ रहे हैं। हमारा बल इस विषय पर है कि ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। यह सभी के लिए है।

स्वदेशी ज्ञान-तंत्र की पुनर्स्थापना

यदि हम गंभीर हैं, तो परिवर्तन केवल पाठ्य-सूची तक सीमित नहीं रहना चाहिए, शोध-पद्धति में भी होना चाहिए। उपनिवेशवादी मॉडल कुछ मान्यताओं पर आधारित है। स्वदेशी ज्ञान इसके विपरीत है। यह मनुष्य और प्रकृति, ज्ञान और उचित जीवन-चर्या, सिद्धांत और व्यवहार के अंतर्संबंध को भी समाहित करता है। इस दिशा में बढ़ने के लिए कुछ मूलभूत परिवर्तन आवश्यक हैं।

  •  पहला, स्वदेशी ज्ञान-मीमांसा (एपिस्टेमोलॉजी) की पुनर्प्राप्ति। ज्ञान कभी केवल प्रायोगिक अवलोकन नहीं था। इसमें अनुभव, व्याख्या, साक्ष्य और नैतिक अंतर्दृष्टि भी सम्मिलित हैं। हमारी परम्पराओं ने प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द के माध्यम से तथा तर्क, अवलोकन, अनुभव और कर्मशील समुदायों की सहमति के माध्यम से ज्ञान को प्रमाणित करने के ठोस आधार विकसित किए। यह साधारण लोकाचार नहीं था, बल्कि शताब्दियों तक किए गए वैचारिक मंथन से निकली अनुशासित व्यवस्थाएं थीं।
  • दूसरा, समग्र चिंतन को पुनर्जागृत करें। हमारी परम्पराएं सामान्यतः ज्ञान को विभाजित नहीं करती थीं। चिकित्सा पारिस्थितिकी से संबंधित थी। नैतिकता शासन का भी विषय थी। ध्यानात्मक अभ्यास मनोविज्ञान के लिए उपयोगी होता था। आधुनिक विशेषज्ञता ने हमें सटीकता दी है और मैं उसे अस्वीकार नहीं करूंगा, पर इससे एक बौद्धिक अकेलापन भी आया है, जहां एक क्षेत्र का विशेषज्ञ दूसरे से संवाद नहीं कर पाता। पुनः एकीकरण की आवश्यकता है।
  • तीसरा, शोध को समुदाय-केंद्रित बनाइए। उसे निष्कर्षण (Extraction) से भागीदारी की ओर ले जाइए। समुदायों का नमूनों (Specimen) की तरह अध्ययन करने के बजाय उनके साथ सहयोग करें, उन्हें ज्ञान-धारकों के रूप में देखें। मौखिक परम्पराएं, अनुष्ठान और स्थानीय पारिस्थितिक प्रथाएं रॉ-डेटा नहीं हैं; वे जिए हुए और परीक्षण किए हुए ज्ञान का भंडार हैं।
  •  चौथा, भाषा को केवल आवरण न मानकर ज्ञान का वाहक समझिए। अनुवाद से मूल अर्थ प्रभावित होता है। हर सभ्यता में एक बड़ी शब्द-संपदा होती है, जिसका स्थान किसी अन्य भाषा की शब्दावली नहीं ले सकती। धर्म, ऋत या रस को एक अंग्रेजी शब्द में अनुवाद करने का प्रयास कीजिए और आप तुरंत क्षति का अनुभव करेंगे। हमारी भाषाओं का पुनरुद्धार भावुकता नहीं, बल्कि एक एपिस्टेमोलॉजिकल अनिवार्यता है।

आगे का मार्ग

तो अब हम कहां जाएं? मैं चार विषय प्रस्तावित करूंगा-अंतिम कार्ययोजना के रूप में नहीं, बल्कि एक दिशा के रूप में।

  •  पहले, बौद्धिक साहस चाहिए— जो दृष्टि हमें दे दी गई, उसे प्रश्न करने की इच्छा। यहां तक कि उन अवधारणाओं को भी, जिन्हें स्वीकार करने पर हम पुरस्कृत हुए हैं।
  • फिर, पाठ्यक्रम सुधार-स्वदेशी ग्रन्थों, दर्शनों और पद्धतियों को अध्ययन का आधार बनाया जाए, उन्हें वैकल्पिक न रखा जाए।
  • फिर, अंतर्विषयक एकीकरण-वह प्राचीन वृत्ति पुनः लौटे, जिससे एक विद्वान बिना किसी कठिनाई के व्याकरण, तर्कशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र और तत्त्व-मीमांसा के बीच स्वतंत्र रूप से अध्ययन कर सके।
  • और अंत में, एक वैश्विक स्वदेशी संवाद- विभिन्न महाद्वीपों की सभ्यताएं समान समस्याओं से जूझ रही हैं। इसलिए पृथक प्रयासों की अपेक्षा सामूहिक समाधान अधिक प्रभावशाली होगा।
    इनमें से कोई भी दुनिया से मुंह मोड़ना नहीं है। यह स्वयं की ओर मुड़ना है, ताकि हम दुनिया से बराबरी के आधार पर मिल सकें, न कि ऐसे छात्र बनकर, जो भूल गए हों कि उन्होंने कभी पाठ्यपुस्तकें लिखी थीं। जैसा कि कुंदेरा ने कहा और जैसा गीता ने उनसे बहुत पहले जाना था, संघर्ष स्मृति और विस्मृति का है। उस संघर्ष में हमारी विजय अभी शेष है।
Topics: वि-औपनिवेशीकरणविस्मृतिपाठ्यक्रम सुधारपञ्च-प्रणऔपनिवेशिक मानसिकताज्ञान-मीमांसास्वदेशी ज्ञानमिलान कुंदेराभगवद्गीताजे. नन्दकुमारबौद्धिक स्वतंत्रताकुंदेरारामधारी सिंह दिनकरस्वदेशी संवादपाञ्चजन्य विशेषसभ्यतागत स्मृति
जे. नन्दकुमार
जे. नन्दकुमार
राष्ट्रीय संयोजक, प्रज्ञा प्रवाह [Read more]
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