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पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : बलात्कारी पर मेहरबानी

कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज की महिला डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या के मामले में शासन-प्रशासन ने जिस तरह लीपापोती की कोशिश की, उसने संदेशखाली प्रकरण की तरह ही महिला सुरक्षा का ढोंग बेनकाब कर दिया

Written byPanchjanyaPanchjanya
Apr 16, 2026, 01:45 pm IST
in पश्चिम बंगाल

संदेशखाली प्रकरण के बाद अब रुख करते हैं राजधानी कोलकाता का। सबसे ‘सुरक्षित’ माने जाने वाले इस शहर के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अगस्त 2024 में एक युवा महिला डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या ने देश को झकझोर दिया। मामले में अदालत ने अभियुक्त संजय राय को उम्रकैद की सजा सुनाई और सीबीआई ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए राय को फांसी देने की याचिका दायर की है। लेकिन, इस मामले से जुड़े कई तथ्य हैं जो बताते हैं कि इस मामले में संभवतः कुछ और लोग शामिल थे, जिन्हें बचाया गया। समय के साथ यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं रहा, बल्कि उन सवालों का प्रतीक बन गया जो जांच प्रणाली, संस्थागत जवाबदेही और सत्ता-प्रशासन के रिश्तों पर उठते रहे हैं।

घटना के शुरुआती समय से ही कई ऐसी विसंगतियां सामने आईं जिन्होंने संदेह को जन्म दिया। एक तो, अस्पताल जैसे नियंत्रित और अपेक्षाकृत सुरक्षित परिसर में इस तरह की वारदात का होना अपने आप में असामान्य था। इससे भी अधिक असामान्य था शुरुआती प्रतिक्रिया का तरीका। एफआईआर दर्ज करने में देरी, अपराध स्थल को तत्काल सील न करना, और पर्याप्त फॉरेंसिक सुरक्षा का अभाव। इन सभी तत्वों को सामान्य लापरवाही की श्रेणी में रख भी दिया जाता और चर्चा लचर व्यवस्था पर सिमट जाती, यदि बाद की घटनाएं उन्हें सबूत मिटाने के सोचे-समझे प्रयासों से नहीं जोड़ देतीं।

अकारण नहीं संदेह

  • संदेह के बीजः 9 अगस्त 2024 को सुबह 9.30 बजे अस्पताल के सेमिनार हॉल में 31 वर्षीय महिला डॉक्टर का शव मिला। शव अर्धनग्न अवस्था में था और उसपर गंभीर चोटों के निशान थे। इसी दिन पोस्टमॉर्टम हुआ और ‘अप्राकृतिक मृत्यु’ का मामला दर्ज किया गया। शुरू में परिवार को सूचना दी गई कि मामला ‘आत्महत्या’ का है। यह पहला कारण था जिससे मामले को दबाए जाने की आशंका ने जन्म लिया।
  • शुरुआती जांच में गहराया संदेहः 10 अगस्त को सिविक वॉलंटियर संजय रॉय को गिरफ्तार किया गया। परिवार और डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि एफआईआर दर्ज करने में देरी हुई, घटनास्थल को तुरंत सील नहीं करके साक्ष्यों को सुरक्षित करने में लापरवाही की गई। बाद में यही बिंदु सीबीआई को केस सौंपे जाने का बड़ा आधार बना।
  •  प्रिंसिपल और प्रशासन पर सवालः घटना स्थल के आसपास “रेनोवेशन/मरम्मत” का आदेश दिए जाने की बात सामने आई। डॉक्टरों और प्रदर्शनकारियों ने इसे साक्ष्य मिटाने की कोशिश बताया। 12 अगस्त 2024 को लापरवाही के आरोपों से घिरे अस्पताल के प्रिंसिपल संदीप घोष का इस्तीफा।
  • सीबीआई को मामलाः 13 अगस्त 2024 को यह कहते हुए कि राज्य पुलिस की जांच पर भरोसा नहीं, कलकत्ता हाईकोर्ट ने केस को सीबीआई को सौंपने का फैसला सुनाया।
  • कैंडल मार्च और भीड़ का हमलाः 14 अगस्त को कोलकाता में मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों का बड़ा कैंडल मार्च आरजी कर अस्पताल से शुरू होकर श्यामबाजार, एस्प्लेनेड होते हुए पार्क स्ट्रीट तक निकाला गया। हजारों लोग शामिल हुए।
    14-15 की दरम्यानी रात को ही हजारों की भीड़ अस्पताल पर धावा बोलती है। प्रदर्शन स्थल पर तोड़फोड़ की जाती है, रेप-हत्या के घटनास्थल को तहस-नहस कर दिया जाता है।
  •  सुप्रीम कोर्ट सख्तः 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। 20 अगस्त को पहली सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि पुलिस और प्रशासन ने गंभीर चूक की। डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए टास्क फोर्स बनाने की पहल।
  •  संजय राय को सजाः 7 अक्तूबर को सीबीआई चार्जशीट दाखिल करती है। पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और पुलिस अधिकारी अभिजीत मंडल साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ्तार। 18 जनवरी 2025 को संजय राय को आजीवन कारावास की सजा।

भीड़ का हमला अनायास नहीं

सबसे पहले 14 अगस्त 2024 को याद करना होगा। अस्पताल के बाहर धरना-प्रदर्शन का दौर चल ही रहा था और उसमें छात्र और डॉक्टर शामिल होकर पीड़िता को न्याय दिलाने की मांग कर रहे थे। इसी बीच, महिलाओं ने शाम में कैंडल मार्च निकाला। सभी लोग आरजी कर मेडिकल कॉलेज पर इकट्ठा होते हैं और वहां से कैंडल मार्च निकलता है। इनमें आईटी पेशवेर, डॉक्टर व कामकाजी महिलाएं शामिल थीं। लेकिन इस कैंडल मार्च ने ‘कुछ लोगों’ की नींद उड़ा दी। नतीजा, एक ओर हजारों लोग डॉक्टर को इंसाफ दिलाने के लिए सड़कों पर थे, तो दूसरी ओर अस्पताल पर धावा बोलकर धरना दे रहे छात्रों-डॉक्टरों को ‘सबक’ सिखाने और सबूत मिटाने की तैयारी भी की जा रही थी। हजारों लोगों की भीड़ आरजी कर कॉलेज परिसर में घुसकर तोड़फोड़ करती है। प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को पीटा जाता है। पुलिस की गाड़ियां पलट दी जाती हैं। उसके बाद भीड़ आपातकाल वार्ड में घुसती है। वहां मौजूद डॉक्टरों और मेडिकल के छात्रों ने कमरे बंद कर जान बचाई।

घटनास्थल तहस-नहस

भीड़ ने वहां प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों पर हमला कर दिया, यह बात समझ में आ भी जाए कि ‘कोई’ ऐसा होगा जिसे इस मामले को तूल देना रास नहीं आ रहा था, लेकिन भीड़ का उस जगह से क्या लेना-देना था जहां महिला डॉक्टर के साथ बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गई थी? घंटों चली तोड़फोड़ में भीड़ ने घटनास्थल को तहस-नहस कर दिया।

और इससे जुड़े एक और ‘इत्तेफाक’ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जब मामले की जांच राज्य पुलिस से लेकर सीबीआई को सौंपने की बात अदालत में उठी तो पहले तो इसके लिए सात दिन का समय मांगा गया और जब अदालत तैयार नहीं हुई तो 24 घंटे का समय मांगा गया और इसके बाद रातों-रात हजारों गुंडे अस्पताल पर हमला बोलकर अपराध से जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट कर देते हैं? कलकत्ता हाईकोर्ट में पीड़िता की ओर से पेश वकील ने इसका जिक्र करते हुए अदालत का ध्यान बड़ी साजिश की ओर दिलाया।

साफ है, यह घटना केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं थी; इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह हुआ कि इस केस को निर्णायक परिणति तक पहुंचा सकने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्य नष्ट हो गए। किसी भी संवेदनशील अपराध में, विशेषकर बलात्कार और हत्या जैसे मामलों में, अपराध स्थल को उसके मूल स्वरूप में सुरक्षित रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक था कि क्या यह केवल संयोग था कि जिस जगह से सच्चाई निकल सकती थी, उसे तहस-नहस कर दिया गया? या फिर यह किसी सुनियोजित प्रयास का हिस्सा था जिससे यह तय किया जा सके कि जांच की दिशा किधर जाए?

खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का बयान गले से उतरने वाला नहीं। 14 अगस्त को ममता बनर्जी कहती हैं-“रविवार (18 अगस्त) तक सीबीआई जांच पूरी करके दोषी को फांसी दिलाए क्योंकि राज्य पुलिस ने 90 प्रतिशत जांच तो पूरी कर ली है।” इस बयान का क्या मतलब है? क्या ममता बनर्जी को समझ नहीं आ रहा था कि हाईकोर्ट ने उनकी पुलिस की कार्यप्रणाली पर अविश्वास जताने के बाद ही मामले की जांच सीबीआई को सौंपी है? साथ ही जब वह कहती हैं कि पुलिस ने 90 प्रतिशत जांच पूरी कर ली है, तो क्या वह पुलिस की लापरवाहियों का साथ दे रही थीं?

अस्पताल प्रशासन की भूमिका ने इस संदेह को और गहरा किया। तत्कालीन प्रिंसिपल पर बाद में सबूतों की सुरक्षा में विफल रहने और कथित रूप से उन्हें प्रभावित करने के आरोप लगे। यह केवल प्रशासनिक अक्षमता का मामला नहीं था, क्योंकि एक बड़े मेडिकल संस्थान के प्रमुख से यह अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसे मामलों में प्रक्रियात्मक सख्ती बरतें।

स्थानीय पुलिस की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में रही। आरोप लगे कि प्रारंभिक जांच में गंभीरता का अभाव था और कुछ अहम पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया गया। इसी कारण न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो गया। कलकत्ता हाईकोर्ट ने जांच को राज्य पुलिस से हटाकर सीबीआई को सौंप दिया। सामान्यतः ऐसा कदम तभी उठाया जाता है जब अदालत को यह लगे कि जांच की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह है।

छात्रों-डॉक्टरों की जुबानी

आरजी कर अस्पताल के छात्रों और डॉक्टरों ने तब कैंपस में जो कुछ कहा, उससे साफ था कि वहां कुछ और खिचड़ी पक रही थी।
आरजी मेडिकल कॉलेज के छात्र शुभांकर ने बतायाः
‘‘हम सब शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे थे। अचानक भीड़ अंदर घुसी और तोड़फोड़ करने लगी। हमने उन्हें रोकने की कोशिश की तो हमारे साथ मारपीट की गई। हमने किसी तरह इधर-उधर भागकर जान बचाई। ऐसा लग रहा था मानो भीड़ पूरी योजना के साथ आई थी।’’
मेडिकल छात्रा चिनमिता बिस्वास ने बतायाः
‘‘मैं दूसरे मेडिकल कॉलेज की छात्रा हूं। हमारे कॉलेज के छात्र भी यहां प्रदर्शन करने आए थे। लेकिन भीड़ ने हम लड़कियों के साथ भी मारपीट की। सब डर गए थे।’’
एक अन्य छात्र अंशुमन ने बतायाः
‘‘भीड़ तीसरे तल पर जाने की कोशिश कर रही थी जहां महिला डॉक्टर से दुष्कर्म हुआ था। ऐसा लग रहा था कि उन्हें अच्छी तरह समझाकर भेजा गया था कि कहां क्या करना है। उनकी मंशा सारे साक्ष्यों को नष्ट करने की लग रही थी।’’
नाम न बताने की शर्त पर आरजी कर कॉलेज के एक डॉक्टर ने बतायाः
‘‘इतनी जघन्य घटना के बाद भी इस मामले में कोलकाता पुलिस का रवैया बेहद संदेहास्पद रहा। ऐसा लग रहा है कि पुलिस ने किसी को बचाने की कोशिश की है। बहुत संभव है कि साक्ष्यों को मिटाने की कोशिश की गई हो।’’

हालांकि, मामला यहीं शांत नहीं हुआ। केंद्रीय एजेंसी के हाथ में जांच जाने के बाद भी विवाद समाप्त नहीं हुए। सबसे बड़ा विवाद इस बात को लेकर था कि जांच को एक ही आरोपी तक सीमित कर दिया गया, जबकि कई डॉक्टरों, नागरिक समूहों और पीड़िता के परिजनों का दावा था कि यह अपराध सामूहिक हो सकता है। कुछ आरोपियों को प्रक्रिया संबंधी आधारों पर राहत मिलना, इस पूरे घटनाक्रम को और जटिल बनाता है। आपराधिक न्याय प्रणाली में देरी अक्सर न्याय को प्रभावित करती है, लेकिन जब देरी ऐसे मामले में हो जहां पहले से ही साक्ष्य नष्ट कर दिए गए हों, तो बात केवल तकनीकी कमी की नहीं रह जाती, यह न्याय की दिशा को प्रभावित करने वाला कारक बन जाती है। इस पूरे मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी समानांतर रूप से चलते रहे। विपक्ष ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वह दोषियों को बचाने का प्रयास कर रही है, जबकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया। यहां यह समझना महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक विमर्श और न्यायिक सत्य हमेशा एक जैसे नहीं होते, लेकिन जब जांच में पहले से ही विसंगतियां हों, तो राजनीतिक आरोपों को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी कठिन हो जाता है। वे कम-से-कम इस बात का संकेत अवश्य देते हैं कि सार्वजनिक विश्वास में कमी आई है।

अंततः, जब सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा और डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए व्यापक दिशा-निर्देश देने पड़े, तो स्पष्ट हो गया कि यह केवल एक राज्य या एक संस्थान की समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक संस्थागत संकट का संकेत है। सर्वोच्च न्यायालय का स्वतः संज्ञान लेना इस बात का प्रमाण था कि मामला साधारण आपराधिक दायरे से आगे बढ़ चुका था।

हालांकि मुख्य आरोपी को सजा मिल चुकी है, लेकिन इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी अनुत्तरित है- क्या पूरी सच्चाई सामने आई? या फिर जांच की दिशा को इस प्रकार नियंत्रित किया गया कि केवल वही तथ्य सामने आए जो प्रस्तुत किए जा सकते थे? साक्ष्यों के नष्ट होने, जांच में विरोधाभास, और विभिन्न संस्थाओं की संदिग्ध भूमिका- ये सभी तत्व मिलकर इस आशंका को जन्म देते हैं कि संभवतः इस अपराध की परतें उतनी सरल नहीं थीं जितनी दिखाई गईं।

संजय राय की ऊंची पहुंच

संजय राय और तृणमूल कांग्रेस के बीच संबंधों की परतें जब खुलीं, तो एक ऐसे ‘सिस्टम’ का खुलासा हुआ जहां एक मामूली ‘सिविक वॉलंटियर’ का रसूख किसी बड़े अधिकारी से कम नहीं था। जांच में पाया गया कि वह आरजी कर अस्पताल में एक ‘बिचौलिये’ के रूप में सक्रिय था और अस्पताल के उन संवेदनशील हिस्सों में बेरोकटोक जाता था, जहां डॉक्टरों के अलावा किसी का जाना मना था।

संजय राय के रसूख का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि वह कोलकाता पुलिस कमिश्नर के नाम पर पंजीकृत सरकारी मोटरसाइकिल का उपयोग करता था, जिस पर ‘पुलिस’ का स्टिकर लगा था। साथ ही, पुलिस कल्याण समिति का सदस्य न होने के बावजूद पुलिस बैरक में रहता और पुलिस की मेस में खाना खाता।
कोलकाता का यह मामला केवल एक जघन्य अपराध की कहानी नहीं; यह उस जटिल तंत्र का आईना है जहां अपराध, जांच, प्रशासन और सत्ता के बीच की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं। और जब ये रेखाएं धुंधलाती हैं, तो सबसे बड़ा नुकसान सत्य का होता है क्योंकि न्याय केवल सजा देने से नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई सामने लाने से स्थापित होता है।

Topics: संदेशखाली प्रकरणप्रशासनिक अक्षमतान्याय की मांगकानून-व्यवस्था की विफलताबंगाल चुनाव 2026बलात्कार और हत्याआरजी कर मेडिकल कॉलेज कांडजांच और प्रशासनलीपापोती की कोशिशसीबीआई जांचसिविक वॉलंटियर का रसूखमहिला सुरक्षासत्ता-प्रशासन का गठजोड़बंगाल चुनावसबूत मिटानापाञ्चजन्य विशेषसंस्थागत जवाबदे
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