पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में सत्ता के दो प्रमुख दावेदारों तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के अपने-अपने तर्क हैं। चुनाव आयोग के मतदाता शुद्धिकरण अभियान से आपा खो बैठीं ममता बनर्जी एसआईआर प्रक्रिया को ‘बंगाल को बर्बाद’ करने के प्रयास के रूप में देखती हैं और भाजपा को धमकी देती हैं कि यह केंद्र में उसकी सरकार की ‘ताबूत में अंतिम कील’ साबित होने जा रही है। वहीं, घुसपैठियों को नागरिक बनाने की संस्थागत व्यवस्था को राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव के विरुद्ध बताते हुए भाजपा इस चुनाव को ‘सभ्यतागत लड़ाई’ की संज्ञा देती है।
हर चुनाव से पहले हवा में तैर रहे मुद्दों के आधार पर लोकमत की जमीन किसके लिए सज-संवर रही है, ऐसी जिज्ञासा स्वाभाविक है। पश्चिम बंगाल में जनमत का आकलन करने के लिए ‘पाञ्चजन्य’ ने विशेष अभियान चलाया। हमने प्रबुद्ध लोगों के आकलन सुने और आम लोगों की मनःस्थिति को पढ़ने की कोशिश भी की। महानगर-बड़े शहरों से लेकर गांव-कस्बों और छोटे शहरों तक में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीके से लोगों का मत जाना। इस क्रम में हमने आम लोगों में बैठे भय को भी महसूस किया। अमूमन सभी ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर बात की। यह भय स्वाभाविक है।
पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल पार्टी की जीत के जश्न में जमकर हिंसा की गई थी और कई विरोधियों को जान तक से हाथ धोना पड़ा था। लोगों के इसी भय को दूर करने के लिए केंद्रीय बलों की 500 कंपनियों को इस बार चुनाव नतीजे आने के बाद भी बंगाल में ही रुकने को कहा गया है और इस कदम के सकारात्मक प्रभाव के संकेत मिल रहे हैं।
यहां पूरी स्पष्टता के साथ यह बता देना आवश्यक है कि यह ‘चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण’ नहीं क्योंकि यह विशुद्ध रूप से एक तकनीकी प्रक्रिया होती है। लेकिन उतनी ही स्पष्टता के साथ यह भी बताना जरूरी है कि जनमत टटोलने के हमारे इस प्रयास में जो संकेत उभरे हैं, यदि मतदान तक उनकी प्रभावशीलता बनी रहती है, तो यह चुनाव ममता-राज पर विराम लगाने वाला सिद्ध होगा।
भारी पड़ता घुसपैठ का साथ
इस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा है घुसपैठ। हमारे जन-आकलन अभियान के दौरान इसके मुख्यतः तीन आयाम सामने आए हैं। एक, ममता बनर्जी ने जिस तरह चुनाव आयोग के अभियान को मुस्लिम विरोधी और उनके वोट काटने के प्रयास के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, वह सिरे नहीं चढ़ पाया। सुप्रीम कोर्ट ने आपत्तियों और दावों के निपटारे का दायित्व न्यायाधीशों को सौंपकर इस प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करने की संभावनाओं को खत्म कर दिया था, लेकिन जिस तरह मालदा में न्यायिक अधिकारियों को हिंसक भीड़ ने लगभग 10 घंटे तक घेरे रखा और शासन-प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा, उसे लोगों ने गंभीरता से लिया है।
दूसरा, ममता सरकार के ‘घुसपैठिया प्रेम’ ने राज्य के मूल मुसलमानों के एक बड़े वर्ग को उसके खिलाफ खड़ा कर दिया है क्योंकि उन्हें लग रहा है कि इससे एक तो पूरे समुदाय की छवि खराब हो रही है और दूसरे, उनके हिस्से के संसाधनों की ‘हकमारी’ हो रही है।
इसका तीसरा आयाम यह है कि प्रदेश में ‘सेकुलर’ समुदाय के बड़े हिस्से में इस बात को लेकर नाराजगी है कि ममताराज में ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ को शासन से लेकर प्रशासन के स्तर तक कार्य संस्कृति का मूल बना दिया गया जिससे बंगाल का व्यापक सामाजिक सेकुलर चरित्र बदल गया और हिंसा-दंगों की प्रवृत्ति घर कर गई। स्वाभाविक है, घुसपैठियों को नागरिक बनाना सीमाई विधानसभा क्षेत्रों के चुनावी गणित को ही आकार देने वाला मुद्दा नहीं रहा, बल्कि पूरे राज्य के चुनाव को प्रभावित करने वाला कारक बन गया है।
किसी भी राष्ट्र-राज्य के लिए यह आधारभूत सिद्धांत है कि नागरिकता विधिक प्रक्रिया से तय हो, न कि राजनीतिक सुविधा से। इसी संदर्भ में मतदाता सूची की शुद्धिकरण प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त बन जाती है। सिद्धांततः इसे लोकतंत्र के संरक्षण के उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए जैसा सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा और जिसका संकेत हमारे अभियान में मिला।
सिंडिकेट राज से लोग त्रस्त
बंगाल के लोग ‘सिंडिकेट राज’ से परेशान हैं। शहर से लेकर गांवों तक लोगों में गुस्सा है कि एक ऐसा सामानांतर तंत्र विकसित कर दिया गया है जिसका लाभ मोटे तौर पर तृणमूल पार्टी से जुड़े लोगों और गुंडों को मिल रहा है और इसका खामियाजा आम लोगों को भुगतना पड़ रहा है। सरकारी स्कीमों का लाभ उठाने के लिए भी इस तंत्र की मुट्ठी गरम करनी पड़ रही है, यानी भ्रष्टाचार का संस्थागत तंत्र!
यदि मतदाताओं को शहरी और ग्रामीण, दो खांचों में बांटकर देखें तो दोनों ही क्षेत्रों में ममता बनर्जी के वोट बैंक में बड़ी फिसलन के संकेत मिल रहे हैं। शहरी मतदाताओं में पिछले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस का अच्छा प्रदर्शन रहा था, लेकिन इस बार स्थिति बदलती दिख रही है और बड़ा वर्ग सत्ता बदलने के उद्देश्य से मतदान करने के लिए कमर कसता दिख रहा है।
ममता बनर्जी ने इस साल से शहरी बेरोजगारों को 1500 रुपये मासिक भत्ता देने की घोषणा की है जबकि भाजपा ने तीन हजार। बेरोजगारों की शिकायत है कि ममता राज में रोजगार के अवसर पैदा करने पर न तो पर्याप्त ध्यान दिया गया, न ही उद्योग-धंधों के फलने-फूलने का माहौल बनाया गया, जिससे उन्हें राज्य से बाहर जाना पड़ता है। बंगाल में 70-80 लाख बेरोजगार हैं, लेकिन बेकारी के दंश का अनुभव अधिकतर परिवार कर रहे हैं और इसलिए यह मुद्दा केवल संबंधित युवाओं का नहीं, बल्कि उनके सगे-संबंधियों की वोटिंग को भी प्रभावित करने वाला कारक बनता दिख रहा है।
जहां तक अर्द्धशहरी और ग्रामीण इलाकों की बात है, यहां पिछले चुनाव में भी भाजपा की स्थिति अच्छी रही थी और उसकी 65-68 सीटें यहीं से आई थीं। यहां भाजपाई वोट सुदृढ़ होता दिख रहा है। ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के अंतर्गत ममता बनर्जी सरकार ने महिलाओं को दी जाने वाली राशि बढ़ाकर डेढ़ हजार कर दी है। भाजपा ने वादा किया है कि यदि उसकी सरकार बनी तो यह राशि बढ़ाकर तीन हजार कर दी जाएगी। इसका असर ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छा-खासा देखने को मिल रहा है। ग्रामीण परिवारों को लग रहा है कि अगर सत्ता परिवर्तन हो गया तो न केवल उन्हें तृणमूल कार्यकर्ताओं की गुंडागिरी से छुटकारा मिल जाएगा, बल्कि डेढ़ हजार की जगह तीन हजार मिलने से जीना भी आसान हो जाएगा।
इनके अतिरिक्त, राज्य की महिलाओं में जिस तरह का ममता विरोधी माहौल देखने को मिल रहा है, वह भी कम बड़ा कारक नहीं। संदेशखाली के ‘व्यवस्थात्मक शोषण’ से उपजी नाराजगी की रही-सही कसर आरजी कर में डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या और उसके बाद की गई लीपापोती ने पूरी कर दी है।
कुछ को आंखों से उतारने और कुछ को पलकों पर बैठाने वाले ये संकेत बड़े उलटफेर की भूमिका तैयार करते दिख रहे हैं।
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