पश्चिम बंगाल में 250 के आसपास ग्रामीण ओर अर्द्ध शहरी सीटें हैं जहां पिछले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने 170 और भाजपा ने 70 सीटें जीती थीं। इस चुनाव में यही सीटें निर्णायक होने जा रही हैं, खास तौर पर ग्रामीण सीटें।
ममता बनर्जी सरकार की “लक्ष्मी भंडार” योजना पिछले कुछ वर्षों में ग्रामीण समाज, विशेषकर महिलाओं के बीच, एक स्थिर आधार बना चुकी है। वर्तमान में सामान्य वर्ग की महिलाओं को लगभग 1000 रुपये प्रतिमाह और अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग की महिलाओं को 1500 रुपये की सहायता दी जा रही है।
गांवों में इसे “निश्चित आय” की तरह देखा जाने लगा है-ऐसी आय, जो कम सही, पर तय तो है। लेकिन इसके मुकाबले भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी वादों में ग्रामीण महिलाओं को 3000 रुपये प्रतिमाह तक की सहायता देने की बात कही है। यह प्रस्ताव मौजूदा सहायता से दोगुना है, और इसी कारण यह ग्रामीण मतदाता के बीच चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।
बांकुरा के सोनामुखी गांव की एक महिला कहती हैः “दीदी का पैसा हर महीने आता है, इसलिए उसपर भरोसा है। लेकिन अगर कोई तीन हजार देने की बात करता है, तो बहुत फर्क पड़ जाता है।” इसी तरह की बातें आम तौर पर ग्रामीण महिलाएं कहती हैं। रानीनगर के इस्लामपुर गांव की एक महिला ने कहाः “ डेढ़ हजार तो मिल ही रहे हैं। अगर तीन हजार मिलने लगें तो बहुत सहूलियत हो जाएगी।” इसी गांव के एक किसान कहते हैं: “ डेढ़ हजार से होता क्या है? खेत छोटे होते चले गए और हमारे बच्चों के सामने रोजगार नहीं। यह पैसा इतना ही है कि न जी सको, न मर सको।” ये टिप्पणियां मोटे तौर पर संकेत हैं कि ग्रामीण इलाकों में लोगों के मन में जो लहर चल रही है, वह प्रदेश स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकती है।
इसके अलावा, गांवों में एक और ट्रेंड देखने को मिल रहा है- जहां “लक्ष्मी भंडार” जैसी योजनाएं बिना बाधा पहुंची हैं, वहां तो संतोष है लेकिन जहां लाभार्थी चयन का तरीका पक्षपातपूर्ण है, वहां लोगों में असंतोष भी है।
(लेखक कोलकाता में रहते हैं और उन्होंने हाल ही में कई
गांवों की यात्रा करके जमीनी स्थिति जानी।)
















