मुंबई (महाराष्ट्र)। मुंबई में आयोजित I.I.M.U.N. के प्रतिष्ठित मंच से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने देश के सामाजिक, राजनीतिक, वैश्विक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक परिदृश्य पर विचार व्यक्त किए. उन्होंने ‘भारतीय दृष्टिकोण से विश्व को एकजुट करने में युवाओं की भूमिका’ पर जोर देते हुए यह स्पष्ट संदेश दिया कि देश की नई पीढ़ी (Gen-Z और Gen-Alpha) देश का भविष्य है, जिन्हें शंका की दृष्टि से देखने के बजाय अपनत्व, संवाद और मार्गदर्शन की आवश्यकता है.
इसके अतिरिक्त, उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, शिक्षा सुधार, LGBTQIA+ समुदाय, महिलाओं की सहभागिता, रोजगार, आरक्षण और सतत विकास जैसे समसामयिक विषयों पर संघ के दृष्टिकोण को प्रमुखता से रेखांकित किया.

1. युवा पीढ़ी, Gen-Z एवं लोकतांत्रिक अधिकार
NEET पेपर लीक तथा अन्य मुद्दों को लेकर युवाओं द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में सरसंघचालक जी ने स्पष्ट किया कि युवाओं की शिकायतें पूरी तरह से जायज़ हैं:
- राष्ट्रविरोधी नहीं हैं युवा: यदि Gen-Z आंदोलन या विरोध प्रदर्शन कर रही है, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वे राष्ट्रविरोधी (Anti-National) हैं. वे हमारे अपने समाज और राष्ट्र का हिस्सा हैं तथा हमारी अगली पीढ़ी हैं.
- अपनत्व एवं संवाद: सार्थक और फलदायी संवाद के लिए अपनत्व का भाव होना अनिवार्य है. जब संवाद अपनत्व के साथ होता है, तभी एक-दूसरे की समस्याओं को सही ढंग से समझा जा सकता है. जब अन्य सभी प्रशासनिक रास्ते बंद हो जाते हैं, तो लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन भी संवाद का ही एक वैध माध्यम बनता है.
- पीढ़ीगत अंतर और ईमानदारी: आज की Gen-Z और Gen-Alpha पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक स्पष्ट और तर्कसंगत प्रश्न पूछती है. सरसंघचालक जी ने कहा कि नई पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों से अधिक ईमानदार है और यदि उन्हें दोनों पीढ़ियों में से किसी एक पर विश्वास करने को कहा जाए, तो वे Gen-Z पर विश्वास करेंगे.
- सिस्टम सुधार के लिए आंदोलन: युवाओं का आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि ‘सिस्टम सुधार’ (System Correction) के लिए होना चाहिए. प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज या पेलेट गन के प्रयोग संबंधी प्रश्नों पर उन्होंने कहा कि पूर्ण जानकारी के बिना अंतिम निर्णय देना उचित नहीं होगा.

2. शिक्षा व्यवस्था एवं नई पीढ़ी का निर्माण
शिक्षा प्रणाली में मूलभूत सुधारों की आवश्यकता रेखांकित करते हुए सरसंघचालक जी ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण विचार रखे:
- शिक्षा जीवन की आवश्यकता: शिक्षा कोई व्यावसायिक (Commercial) व्यापार नहीं है, बल्कि यह जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता (Necessity) है, जो समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुलभ होनी चाहिए.
- GDP के 6% बजट का समर्थन: शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 6 प्रतिशत व्यय करने की लंबे समय से चली आ रही मांग का समर्थन करते हुए उन्होंने इसे पूरी तरह उचित और लागू करने योग्य बताया.
- सामाजिक उत्तरदायित्व एवं विद्या भारती: शिक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज का सामूहिक कर्तव्य है. संघ से जुड़े ‘विद्या भारती’ संगठन द्वारा लगभग 23,000 विद्यालयों का सफल संचालन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.
- शिक्षक प्रशिक्षण व सुधार: शिक्षा सुधार की शुरुआत शिक्षकों के गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण (Training) से होनी चाहिए. केवल विद्यालय चलाना या धन अर्जित करना शिक्षा का ध्येय नहीं हो सकता; इसका मुख्य उद्देश्य आने वाली पीढ़ी का चरित्र निर्माण करना है. इसके लिए हर बार आंदोलन की आवश्यकता नहीं होती, समाज की सजगता से भी सुधार संभव है.
एक नजर में जानिए सरसंघचालक जी का विस्तृत संवाद के मुख्य बिंदु
| प्रमुख विषय | सरसंघचालक जी के वक्तव्य का मुख्य सार |
|---|---|
| Gen-Z व युवा प्रदर्शन | युवा राष्ट्रविरोधी नहीं हैं, उनकी मांगें जायज हैं, व्यवस्था सुधार के लिए संवाद व अपनत्व जरूरी. |
| शिक्षा सुधार | शिक्षा व्यापार नहीं आवश्यकता है, GDP के 6% बजट आवंटन का पूर्ण समर्थन. |
| LGBTQIA+ समुदाय | हमारे समाज का अंग हैं, विवाह संस्था के स्थान पर समलैंगिक जोड़ों के लिए पृथक कानूनी ढांचा हो. |
| महिलाओं की भागीदारी | राष्ट्र निर्माण में पुरुषों के समान व पूरक भूमिका, प्रतिनिधि सभा में पूर्ण सहभागिता. |
| आरक्षण (Reservation) | सामाजिक भेदभाव रहने तक आरक्षण आवश्यक |
| अंतरराष्ट्रीय संबंध | मानवता सर्वोपरि है, पाकिस्तान के सभी नागरिक शत्रु नहीं, सद्भाव व संवाद ही ध्येय. |
3. सोशल मीडिया एवं डिजिटल विवेक
डिजिटल युग में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर बोलते हुए उन्होंने जिम्मेदारी और विवेक की आवश्यकता पर बल दिया:
- नैतिक उत्तरदायित्व: यदि सोशल मीडिया पर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के कारण 10 लाख लोग कोई गलत निर्णय लेते हैं, तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी उस व्यक्ति की भी बनती है.
- प्रामाणिकता और विवेक: सोशल मीडिया पर केवल प्रामाणिक (Authentic) और विश्वसनीय स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही विश्वास करना चाहिए तथा हमेशा सकारात्मक व समाजहितकारी सामग्री ही साझा करनी चाहिए.
- मार्गदर्शन की आवश्यकता: Gen-Z में यह विवेक विकसित होना चाहिए कि डिजिटल जगत में क्या सही है और क्या गलत. इसमें वरिष्ठ पीढ़ी का दायित्व है कि वह युवाओं का सही मार्गदर्शन करे.

4. रोल मॉडल, राष्ट्रीय दृष्टिकोण एवं वैश्विक संबंध
अंतरराष्ट्रीय संबंधों और राष्ट्रीय सुरक्षा के संतुलन पर विचार रखते हुए उन्होंने भारतीय जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया:
- हिंसक रोल मॉडल से दूरी: Gen-Z को हिंसक (Violent) या उग्र रोल मॉडल्स का अनुसरण करने से बचना चाहिए.
- राष्ट्रीय संकट में एकजुटता: जब देश की संप्रभुता या सुरक्षा पर संकट आए, तो सभी आंतरिक मतभेदों को भुलाकर नागरिकों को अपनी सरकार और सशस्त्र बलों (Military) के साथ दृढ़ता से खड़ा होना चाहिए.
- शाश्वत मानवीय संबंध: राजनीतिक सीमाओं और संघर्षों के बावजूद सांस्कृतिक संबंध समाप्त नहीं होते. चीन के लोग स्वीकार करते हैं कि भारत ने उन्हें 2000 वर्षों तक जीवन-मूल्य दिए हैं, और 100 वर्ष पूर्व पाकिस्तान भी भारत का ही भाग था.
- स्थायी शत्रुता नहीं: सभी पाकिस्तानी नागरिक भारत के शत्रु नहीं हैं. भारत का ध्येय किसी राष्ट्र को मिटाना या पराजित करना नहीं, बल्कि संवाद के माध्यम से सद्भाव (Harmony) स्थापित करना है. संघर्ष के बाद भी शांति के प्रयास जारी रहने चाहिए, क्योंकि अंततः “Humanity is One” (मानवता सर्वोपरि है).
5. एलजीबीटी (LGBTQIA+) समुदाय एवं विवाह संस्था
“LGBTQIA+ समुदाय के लोग हमारे ही समाज का अभिन्न अंग हैं और भारतीय परंपरा में उन्हें समायोजित व स्वीकार करने का इतिहास रहा है।” – सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी
- विवाह (Vivaah) का सामाजिक स्वरूप: भारतीय परंपरा में विवाह केवल दो व्यक्तियों के साथ रहने का समझौता या सुविधा नहीं है. यह एक पवित्र सामाजिक संस्था (परिवार/कुटुंब) है, जो समाज की आधारभूत इकाई है और जहाँ अगली पीढ़ी का चरित्र-निर्माण होता है.
- कानूनी ढांचा: विवाह संस्था के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ करने के सामाजिक दुष्परिणाम (Side Effects) हो सकते हैं. इसलिए समलैंगिक संबंधों को ‘विवाह’ का नाम देने के बजाय, समलैंगिक जोड़ों के साथ रहने के लिए एक पृथक कानूनी ढांचा या व्यवस्था बनाई जानी चाहिए, जिसे समाज स्वीकार कर सके.

6. समाज एवं संघ में महिलाओं की भूमिका
- समान एवं पूरक भागीदारी: राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की भूमिका पुरुषों के समान (Equal) और पूरक (Complementary) है. उन्हें हर क्षेत्र में पुरुषों के समान अवसर और प्रशिक्षण मिलना चाहिए.
- राष्ट्र सेविका समिति: संघ स्थापना के समय की सामाजिक परिस्थितियों के कारण महिलाओं के लिए ‘राष्ट्र सेविका समिति’ का गठन किया गया था, जो एक स्वायत्त संगठन के रूप में संघ के साथ परस्पर सहयोग से कार्य करता है.
- निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी: संघ की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ में सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं की पूर्ण सहभागिता होती है और वे निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाती हैं.
7. रोजगार एवं श्रम की प्रतिष्ठा (Dignity of Labour)
- रोजगार का व्यापक अर्थ: रोजगार का तात्पर्य केवल सरकारी या वेतनभोगी नौकरी (Job) तक सीमित नहीं है. उद्यमिता (Entrepreneurship) और कौशल-आधारित कार्य (Skills) भी इसके महत्वपूर्ण स्तंभ हैं.
- श्रम प्रतिष्ठा: देश में बेरोजगारी की भावना को समाप्त करने के लिए सभी प्रकार के कार्यों को सम्मान देना होगा. समाज में ‘श्रम-प्रतिष्ठा’ (Dignity of Labour) का भाव विकसित करना अत्यंत आवश्यक है.
8. सामाजिक समरसता एवं आरक्षण (Reservation)
- आरक्षण का आधार: सामाजिक भेदभाव और असमानता के कारण ही आरक्षण की व्यवस्था की आवश्यकता उत्पन्न हुई है.
- निरंतरता की शर्त: जब तक समाज में सामाजिक भेदभाव रहेगा, तब तक आरक्षण की आवश्यकता और उसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
- बाबा साहेब का दृष्टिकोण: डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आरक्षण के विषय पर राजनीति नहीं होनी चाहिए. यदि सभी कल्याणकारी उपायों को ईमानदारी और प्रभावशीलता से लागू किया जाए, तो कालान्तर में आरक्षण की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो सकती है.
9. सतत विकास (Sustainability) एवं पर्यावरण
- SDGs में भारत का योगदान: संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने की दिशा में भारत वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.
- पर्यावरण और विकास का संतुलन: विकास और पर्यावरण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं; पर्यावरण को क्षति पहुँचाए बिना भी प्रगति संभव है. पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत प्रत्येक व्यक्ति को अपने घर और दैनिक जीवन की आदतों से करनी चाहिए.
10. नेतृत्व (Leadership) के सिद्धांत
- स्वयं का नेतृत्व: सच्चा नेतृत्व दूसरों पर शासन करने से नहीं, बल्कि स्वयं को अनुशासित करने से शुरू होता है — “You have to lead within.”
- शास्त्रोक्त गुण: एक कुशल नेता में शास्त्रों में वर्णित पाँच मूलभूत गुण होने चाहिए.
- नेताओं का निर्माण: नेतृत्व का मुख्य ध्येय केवल अनुयायी (Followers) बनाना नहीं, बल्कि नए और योग्य नेताओं का निर्माण करना है — “Leadership is to create leaders.”
सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी का यह संवाद भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण (Roadmap) प्रस्तुत करता है. उन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया कि देश के युवाओं की शक्ति, उनके प्रश्न और उनकी ऊर्जा राष्ट्र-निर्माण के लिए अनिवार्य हैं. यदि समाज में संवाद, अपनत्व, शिक्षा का प्रसार, श्रम का सम्मान और सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की जाए, तो भारत विश्व मंच पर एकजुटता और शांति का नेतृत्व कर सकता है.

















