पश्चिम बंगाल में मुस्लिम की बढ़ती आबादी ना सिर्फ प्रदेश के लिए बल्कि पूरे देश के लिए चिंतन का विषय है। अंग्रेजों के समय काल में वर्ष 1901 से 1941 के बीच पश्चिम बंगाल जब यह संयुक्त बंगाल हुआ करता था, राज्य की मुस्लिम आबादी लगभग 26% थी। उस समय संयुक्त बंगाल में वर्तमान का बांग्लादेश बंगाल का ही हिस्सा हुआ करता था।
विभाजन के बाद आबादी में बदलाव
1947 में आजादी के बाद पूर्वी बंगाल पूर्वी पाकिस्तान हो गया, जो वर्तमान का बांग्लादेश है। उस समय बड़ी संख्या में मुसलमान आज के बांग्लादेश चले गए, जिस कारण वर्ष 1951 में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी घटकर लगभग 19% हो गई। 1951 में पहली बार पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी कम हो गई थी। लेकिन फिर समय के साथ-साथ धीरे-धीरे मुस्लिम आबादी पश्चिम बंगाल में फिर से तेजी से बढ़ने लगी।
वर्ष 2011 तक यह बढ़कर लगभग 27% हो गई है। वर्तमान में आजादी से पहले अविभाजित संयुक्त बंगाल में प्रतिशत के हिसाब से जितनी मुस्लिम आबादी थी, वर्तमान में प्रतिशत के हिसाब से उससे भी ज्यादा हो चुका है।
2021 विधानसभा चुनाव और मुस्लिम वोट बैंक
वर्ष 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों का विश्लेषण करते हैं तो मुस्लिम मतदाता ममता बनर्जी का सबसे बड़ा वोट बैंक बन चुका है। मुस्लिम मतदाताओं की वजह से ममता बनर्जी की जीत का रास्ता साफ हो जाता है।
पश्चिम बंगाल के सबसे ज्यादा मुस्लिम बाहुल्य छह जिलों के 2021 के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करें तो मुर्शिदाबाद में सबसे ज्यादा 66% मुस्लिम आबादी है और यहां 22 विधानसभा सीटें हैं। जिनमें से पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 20 सीटें जीती और भाजपा ने सिर्फ दो सीट जीती।
मालदा में 51% मुस्लिम आबादी है। यहां पर 12 सीटें हैं। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने आठ सीटें जीती थी। जबकि भाजपा ने चार सीटें जीती। मालदा में उत्तर दिनाजपुर में लगभग 50% मुस्लिम आबादी है और यहां भी नौ में से सिर्फ दो सीटें ही भाजपा जीत पाई। और सात सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीत ली।
वीरभूमि में मुस्लिम आबादी 37% है और यहां 11 सीटें हैं, जिनमें से भाजपा सिर्फ एक सीट यहां पर जीत पाई।
दक्षिण 24 परगना पश्चिम बंगाल का एक बड़ा जिला है, जहां 31 सीटें हैं और पिछले चुनाव में भाजपा यहां एक भी सीट नहीं जीत पाई थी, भाजपा का खाता यहां शून्य रहा। और तब अगर आप देखें तो तृणमूल कांग्रेस ने 30 सीटें जीती थी।
एक और मुस्लिम आबादी वाला जिला नादिया की बात करें और आंकड़े देखें तो, यहां मुस्लिम आबादी थोड़ी कम है, लगभग 26% के आसपास है और भाजपा इस जिले में 17 में से नौ सीटें तब जीत गई थी।
बता दें कि पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों में से 102 सीटें केवल इन्हीं छह मुस्लिम बाहुल्य जिलों में आती हैं।
चुनावी आंकड़े और परिणाम
पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने इन 102 में से 83 सीटों पर जीत हासिल की थी, जो कुल सीटों का 81% है। जबकि भाजपा महज 18 सीटें जीत पाई थी, जो कुल संख्या का 18 प्रतिशत था। हालांकि अब मुस्लिम बाहुल मुर्शिदाबाद जिले में नतीजे थोड़े चौंकाने वाले हो सकते हैं, क्योंकि मुर्शिदाबाद जिले में ही हुमायूं कबीर ने अब एक अलग बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा कर दी है।
भाजपा के लिए चुनौती
पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती मुस्लिम वोट बैंक है। पश्चिम बंगाल में जहां मुस्लिम आबादी कम है, वहां भाजपा अच्छा प्रदर्शन करती है और जहां पर मुस्लिम आबादी ज्यादा है, वहां भाजपा बुरी तरह से हारती रही है।
उत्तर और दक्षिण बंगाल के मुस्लिम मतदाताओं की असमानता ममता की परेशानी का कारण
कांग्रेस की रणनीति और चुनाव प्रचार
पश्चिम बंगाल में इस बार कांग्रेस पार्टी अकेले चुनाव लड़ रही है और इस बार उनकी नजर भी ममता बनर्जी के इसी मुस्लिम वोट बैंक पर है। पिछले चुनाव में तो कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल में एक भी सीट नहीं जीत पाई, लेकिन इस बार के चुनाव में कांग्रेस को मुस्लिम वोटर्स से काफी उम्मीद है और इसलिए पिछले 5 वर्षों में पहली बार राहुल गांधी 14 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार किया है।
राहुल गांधी ने उत्तर दिनाजपुर, मालदा और मुर्शिदाबाद जिले में चुनाव प्रचार किया और ये तीनों सीटें सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले जिले हैं।
उत्तर दिनाजपुर में 50%, मालदा में 51% और मुर्शिदाबाद में तो 66% मुस्लिम आबादी है।
पिछले चुनाव में इन तीनों जिलों में कांग्रेस पार्टी तीसरे नंबर पर थी। लेकिन इस बार उसे उम्मीद है कि शायद वो ममता बनर्जी के इस मुस्लिम वोट बैंक को विभाजित कर सकेगी। वहीं अगर बात करें मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम आबादी वाले जिलों की, तो ये कांग्रेस का असल में एक परंपरागत वोट बैंक पहले से रहे हैं।
2016 के चुनाव में मुर्शिदाबाद में कांग्रेस ने 22 में से 14 सीटें, मालदा में 12 में से आठ सीटें जीती थी।
मुस्लिम वोटर्स का रुझान
बरहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया रुख भी दिख रहा है कि मुस्लिम वोटर्स में बिखराव अब बहुत कम है और अधिकतम मुस्लिम मत तृणमूल कांग्रेस को ही मिलता है। पहले इसमें विभाजन होता था और कांग्रेस पार्टी, वाम दल और तृणमूल कांग्रेस पार्टी को भी वोट मिला करता था।
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