संसद में सरकार को कठघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है, किंतु जब कोई राजनीतिक दल ऐसे विषय पर आक्रामक रुख अपनाए, जिसके संबंध में उसका अपना ऐतिहासिक रिकॉर्ड बार-बार विवादों के केंद्र में रहा हो, तब कई नैतिक प्रश्न खड़े हो जाते हैं। आज संसद में कांग्रेस राम मंदिर से जुड़े विषयों को लेकर सरकार पर हमलावर दिखी।
लोकसभा और राज्यसभा में व्यवधान की स्थिति बनी हुई है। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार निर्विवाद है, किंतु यह अधिकार संसद की कार्यवाही को निरंतर ठप करने का औचित्य नहीं बन सकता। वर्तमान गतिरोध के बीच कांग्रेस राममंदिर के चढ़ावे और प्रबंधन में कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठा रही है। यदि किसी धार्मिक न्यास या मंदिर के संचालन में कोई अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। किंतु इसके समानांतर एक दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्या कांग्रेस का अपना राजनीतिक इतिहास उसे भगवान श्रीराम और राममंदिर के प्रश्न पर नैतिक रूप से सबसे आगे खड़े होकर बोलने की वैधता देता है?
2007 : जब रामसेतु राष्ट्रीय बहस का विषय बना
वर्ष 2007 में केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए-1) सरकार थी। सरकार सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल परियोजना को आगे बढ़ा रही थी, जिसके अंतर्गत मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरूमध्य के बीच समुद्री जहाजों के लिए नया मार्ग विकसित किया जाना था। इस परियोजना के तहत रामसेतु के एक हिस्से में ड्रेजिंग (समुद्र की खुदाई) का प्रस्ताव था। यहीं से विवाद आरंभ हुआ और मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गया।
सितंबर 2007 में केंद्र सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में जो हलफनामा प्रस्तुत किया गया, कहा गया कि वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं हैं, जिनके आधार पर भगवान श्रीराम के अस्तित्व को ऐतिहासिक रूप से सिद्ध किया जा सके। साथ ही यह भी कहा गया कि रामसेतु किसी मानव-निर्मित पुल का प्रमाण नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से बने रेत के टीलों की श्रृंखला है।
यह हलफनामा सीधे करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचानेवाला सिद्ध हुआ। साधु-संतों से लेकर अनेक सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों ने इसे भगवान श्रीराम के अस्तित्व को नकारने का प्रयास बताया। तीव्र जन-प्रतिक्रिया के बाद अंततः केंद्र सरकार को अपना हलफनामा वापस लेना पड़ा।
विवाद को और गहरा करने वाले बयान
उस समय केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि रामसेतु के मानव-निर्मित होने के समर्थन में कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। दूसरी ओर, यूपीए सरकार के प्रमुख सहयोगी दल द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के नेता एम. करुणानिधि ने भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते हुए अत्यंत विवादास्पद टिप्पणी की थी। उन्होंने व्यंग्यात्मक शैली में पूछा था कि यदि राम ने पुल बनाया था, तो वे किस इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़े थे और उनके पास कौन-सी डिग्री थी।
यद्यपि करुणानिधि कांग्रेस के सदस्य नहीं थे, किंतु वे उसी यूपीए सरकार के सबसे प्रभावशाली सहयोगियों में थे और उनकी पार्टी के मंत्री टी.आर. बालू सेतुसमुद्रम परियोजना का दायित्व संभाल रहे थे। इसलिए इन बयानों को उस समय यूपीए सरकार की राजनीतिक संवेदनशीलता से अलग करके नहीं देखा गया।
इसी पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के प्रति यह धारणा मजबूत की कि वह भगवान श्रीराम और उनसे जुड़े सांस्कृतिक प्रतीकों को आस्था की दृष्टि से न देखते हुए राजनीतिक और कानूनी विमर्श के विषय के रूप में देखती है। यही कारण है कि आज जब वही कांग्रेस राममंदिर के नाम पर संसद में सरकार से जवाब मांगती है, तब उसके अतीत के ये प्रसंग अनिवार्य रूप से चर्चा में आ जाते हैं। यहीं से वह नैतिक प्रश्न जन्म लेता है, जिसका उत्तर आज भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से से अधिक कांग्रेस के अपने ऐतिहासिक आचरण से जुड़ा हुआ है।
रामसेतु विवाद के बाद भी भगवान श्रीराम और रामजन्मभूमि का प्रश्न कांग्रेस के लिए समय-समय पर राजनीतिक असहजता का कारण बनता रहा है। विशेष रूप से अयोध्या विवाद के अंतिम न्यायिक चरण में पार्टी की भूमिका को लेकर अनेक प्रश्न उठे हैं। दिसंबर 2017 में सर्वोच्च न्यायालय में रामजन्मभूमि मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता एवं कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल, सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से उपस्थित हुए। उन्होंने न्यायालय से आग्रह किया कि इस संवेदनशील मामले की सुनवाई लोकसभा चुनावों के बाद तक स्थगित कर दी जाए। उनका तर्क था कि इस विवाद का राजनीतिक प्रभाव पड़ सकता है।
यद्यपि न्यायालय ने अंततः इस आग्रह को स्वीकार नहीं किया, किंतु इस घटनाक्रम ने यह धारणा अवश्य बनाई कि कांग्रेस इस विषय को न्यायिक समाधान से अधिक राजनीतिक दृष्टि से देख रही है। इसके बाद जब सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के आधार पर अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण प्रारंभ हुआ, तब यह अपेक्षा की जा रही थी कि इस अवसर को राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखा जाएगा। किंतु ऐसा नहीं हुआ।
प्राण-प्रतिष्ठा से दूरी : क्या यह केवल राजनीतिक निर्णय था?
22 जनवरी 2024 को अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक समारोह आयोजित हुआ। यह एक धार्मिक अनुष्ठान होने के साथ विश्व भर में रह रहे सभी हिन्दुओं और भारतीयों के लिए सदियों की प्रतीक्षा और न्यायिक प्रक्रिया के पूर्ण होने का सांस्कृतिक उत्सव भी था। देश-विदेश से संत, विद्वान, विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्तियों और अनेक राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इसमें सहभागिता की। किंतु इस सब के बीच कांग्रेस ने इस आयोजन का निमंत्रण स्वीकार नहीं किया। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने आधिकारिक वक्तव्य जारी करते हुए इसे भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राजनीतिक कार्यक्रम बताया।
यहीं से एक नया प्रश्न खड़ा हुआ। यदि उस समय कांग्रेस की दृष्टि में यह किसी राजनीतिक दल का कार्यक्रम था, तो आज वही कांग्रेस राममंदिर के प्रबंधन और उससे जुड़े विषयों को लेकर इतनी मुखर क्यों है? यदि मंदिर का उद्घाटन राजनीतिक था, तो क्या आज मंदिर के नाम पर संसद का गतिरोध राजनीतिक नहीं माना जाएगा? यही विरोधाभास कांग्रेस के वर्तमान रुख को कठघरे में खड़ा करता है।
नेताओं के बयान और बनती हुई राजनीतिक धारणा
राममंदिर और भगवान श्रीराम को लेकर कांग्रेस के अनेक वरिष्ठ नेताओं के वक्तव्य भी समय-समय पर विवादों का कारण बने हैं। दिसंबर 2023 में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने प्रश्न उठाया था कि क्या राममंदिर देश का वास्तविक मुद्दा है, पूरा देश राममंदिर और दीप जलाने में लगा है, जो उन्हें परेशान करता है। सैम पित्रोदा को करोड़ों लोगों के आराध्य के सामने दीप जलाना भी खटक रहा है। क्या यह करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं के प्रति असंवेदनशील टिप्पणी नहीं थी ?
पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने भी रामजन्मभूमि की ऐतिहासिकता पर सार्वजनिक रूप से प्रश्न उठाते हुए कहा था कि यह कैसे निश्चित किया जा सकता है कि भगवान राम का जन्म उसी स्थान पर हुआ, जहाँ बाबरी मस्जिद थी। श्रीराम जन्म स्थान पर सीधा संदेह व्यक्त किया गया। इसके बाद अगस्त 2026 में कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की धार्मिक प्रक्रिया पर प्रश्न उठाते हुए उसे “अशुभ” बताया।
इसी क्रम में मई 2025 में अमेरिका के ब्राउन यूनिवर्सिटी में आयोजित एक संवाद कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी की भगवान श्रीराम संबंधी घोर आपत्तिजनक टिप्पणी भी व्यापक चर्चा का विषय बनी। उन्होंने भगवान राम को एक “माइथोलॉजिकल (पौराणिक) और फिक्शनल (काल्पनिक) पात्र” कहा।
कांग्रेस के सामने नैतिक प्रश्न
इन्हीं घटनाओं की पृष्ठभूमि में जब संसद में राममंदिर के चढ़ावे और प्रबंधन से जुड़े आरोपों को लेकर कांग्रेस सरकार को घेरती है, तब स्वाभाविक रूप से उसका अपना अतीत उसके सामने खड़ा हो जाता है। यदि किसी प्रकार की वित्तीय या प्रशासनिक अनियमितता हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। इस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, किंतु राजनीतिक नैतिकता केवल वर्तमान आरोपों से निर्धारित नहीं होती; वह अतीत के आचरण से भी निर्मित होती है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी इसी संदर्भ में सही कहा है कि जो लोग कभी राम और राममंदिर के विरोध में खड़े थे, उन्हें पहले अपने पुराने बयानों और रुख पर देश से क्षमा मांगनी चाहिए। निश्चित ही भारतीय समाज में भगवान श्रीराम मर्यादा, न्याय, त्याग, कर्तव्य और सांस्कृतिक एकात्मता के प्रतीक हैं, इसलिए उनसे जुड़े किसी भी प्रश्न को केवल राजनीतिक दृष्टि से देखना भारतीय जनमानस की भावनाओं को समझने की बड़ी भूल कहलाएगी।
आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि वह राममंदिर के प्रबंधन पर सवाल उठा सकती है या नहीं। लोकतंत्र में यह उसका अधिकार है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या उसने अपने उन पुराने निर्णयों, सरकारी हलफनामों और नेताओं के बयानों पर कभी आत्ममंथन किया, जिनके कारण देश के एक बड़े वर्ग में यह धारणा बनी कि कांग्रेस भगवान श्रीराम की आस्था के प्रति सहज नहीं रही?
ये किसी को नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में अधिकार और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलते हैं। यदि कोई राजनीतिक दल अपने अतीत से संवाद किए बिना केवल वर्तमान में नैतिकता का दावा करता है, तो उसके तर्कों की विश्वसनीयता स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। शायद यही कारण है कि आज राममंदिर पर कांग्रेस के प्रत्येक राजनीतिक आक्रमण के साथ उसका अपना इतिहास भी समानांतर खड़ा दिखाई देता है और वही इतिहास उससे सबसे कठिन प्रश्न पूछ रहा है और वह यही है कि कम से कम नैतिकता और नैतिक मूल्यों की बातें कांग्रेस न करे।

















