पश्चिम बंगाल 2026 : भ्रष्टाचार, हिंसा और 'सिंडिकेट राज' के खिलाफ जनता का विद्रोह? जानें क्यों इस बार मुश्किल में है TMC
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पश्चिम बंगाल 2026 : भ्रष्टाचार, हिंसा और ‘सिंडिकेट राज’ के खिलाफ जनता का विद्रोह? जानें क्यों इस बार मुश्किल में है TMC

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में ममता बनर्जी के गढ़ भवानीपुर में दिखी बौखलाहट क्या सत्ता परिवर्तन का संकेत है? रिकॉर्ड 93% मतदान और टीएमसी के सिकुड़ते आधार पर पढ़िए आशीष कुमार 'अंशु' का विशेष विश्लेषण

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Shivam Dixit
Apr 28, 2026, 05:19 pm IST
inविश्लेषण, पश्चिम बंगाल
Mamata Banerjee at Bhawanipur rally during West Bengal Election 2026 analysis.

बंगाल में परिवर्तन की बयार: क्या 2026 में सत्ता विरोधी लहर टीएमसी के दुर्ग को ढहा देगी?

25 अप्रैल 2026 को कोलकाता के भवानीपुर में ममता बनर्जी की चुनावी सभा एक अनोखे विवाद में बदल गई। सभा के दौरान पास में भाजपा की रैली से तेज आवाज आने लगी। ममता बनर्जी ने मंच छोड़ते हुए कहा, “‘बदला लेना होगा”।

यह बयान न सिर्फ सभा की असफलता को दर्शाता था, बल्कि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पूरे प्रचार अभियान में दिख रही बौखलाहट का प्रतीक बन गया।

भवानीपुर ममता का गढ़ माना जाता है, लेकिन इस बार विरोधी खेमे की मौजूदगी ने उन्हें असहज कर दिया। सभा महज चार-पांच मिनट चली और टीएमसी कार्यकर्ताओं ने भाजपा रैली की ओर मार्च निकाला, जिससे नारे और झड़पें हुईं। सुरक्षा बलों को हस्तक्षेप करना पड़ा। यह घटना अकेली नहीं थी। पूरे प्रचार के दौरान टीएमसी नेताओं में आत्मविश्वास की कमी साफ नजर आई।

पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : संदेशखाली का संदेश

2021 के बाद से टीएमसी का सिकुड़ता आधार

2011 में ममता बनर्जी ने ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ सत्ता संभाली थी। उन्होंने  लोकतंत्र की बहाली, उद्योगों का पुनरुत्थान और बेहतर शासन देने का वादा किया था । लेकिन कथनी और करनी में बड़ा अंतर रहा। 2021 के विधानसभा चुनाव में ही टीएमसी के पैरों तले जमीन खिसकने लगी थी। उस समय आईपीएसी (Indian Political Action Committee) और पार्टी के संगठनात्मक तंत्र ने किसी तरह स्थिति संभाली।

इस बार 2026 के चुनाव में स्थिति अलग है। चुनाव आयोग ने गुंडागर्दी पर सख्त नकेल कसी है। मतदान केंद्रों पर टीएमसी के गुंडों की दादागीरी नहीं चल रही। पूरे बंगाल में यात्रा के दौरान यह बात सामने आई कि टीएमसी नेताओं का आत्मविश्वास हिला हुआ है। गांव-गांव में भाजपा समर्थक कैमरे के सामने बोलने से डरते थे, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। पहले वे कैमरा बंद होने पर भी नहीं बोल पाते थे लेकिन अब वे बोलने लगे हैं।

सयानी घोष विवाद : धार्मिक संवेदनाओं को ठेस

टीएमसी की हताशा सिर्फ सभाओं तक सीमित नहीं। पार्टी की एक प्रमुख नेता और जाधवपुर से सांसद अभिनेत्री सयानी घोष ने पहले शिवलिंग पर कंडोम डालकर सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। यह घटना हिंदू भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाने वाली थी।

संदेशखाली मामला : शेख शाहजहां को बचा रही है पुलिस, कलकत्ता हाई कोर्ट ने जताया संदेह

ऐसे विवाद टीएमसी की सांप्रदायिक राजनीति को उजागर करते हैं, जहां एक तरफ अल्पसंख्यक वोट बैंक को संभालने की कोशिश होती है, तो दूसरी तरफ बहुसंख्यक समाज की भावनाओं की अनदेखी। बंगाल की जनता इन घटनाओं को भूलने वाली नहीं है।

भय और गुंडागर्दी की विरासत : CPM से टीएमसी तक

पश्चिम बंगाल में भय का राज नया नहीं है। यह सीपीएम के जमाने से चला आ रहा है। टीएमसी ने उसी कैडर-आधारित राजनीति को अपनाया और उसे और मजबूत किया। गांव-गांव में सिंडिकेट, स्थानीय स्तर पर समानांतर शक्ति संरचना और विरोधियों को डराने-धमकाने का तंत्र खड़ा किया गया।

परिणामस्वरूप बंगाल में जंगलराज जैसी स्थिति बनी। रोजगार छिन गए, युवा पलायन करने को मजबूर हुए। बिहार के जंगलराज को जिन्होंने सिर्फ सुना था, उन्होंने बंगाल में आकर उसे महसूस किया।

मालदा में बंगलौर से आए एक परिवार ने बताया कि अगर भाजपा की सरकार बनी तो वे वापस बंगलौर नहीं लौटेंगे ।

Sandeshkhali के शैतान शेख शाहजहां के खिलाफ 6 दिन में 700 केस, ज्यादातर यौन शोषण और जमीनों पर कब्जे की शिकायतें

दूसरे प्रदेशों में पलायन कर गए बंगाली परिवार बड़ी संख्या में बंगाल सिर्फ परिवर्तन की उम्मीद लेकर आ रहे हैं।

टीएमसी और सीपीएम के प्रदेश में भाजपा अपनी जगह बनाने में इसलिए सफल हो पाई क्योंकि दोनों ने अच्छा शासन नहीं दिया। ‘माँ-माटी-मानुष’ के नारे खोखले साबित हुए।

पहले चरण में उच्च मतदान : टीएमसी की गणित बिगड़ी

23 अप्रैल 2026 को पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान हुआ। मतदान प्रतिशत करीब 93% रहा, जो रिकॉर्ड स्तर का था। खास बात यह कि हिंदू मतदाताओं ने भी मुसलमानों की तरह 80-90% हिस्सेदारी दिखाई। इससे टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक की गणित बिगड़ गई।

टीएमसी इस बार खौफ खड़ा करने में नाकाम रही क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त थी। परिणामस्वरूप विपक्षी समर्थकों में उत्साह बढ़ा और मतदान केंद्रों तक पहुंच आसान हुई।

दूसरे चरण से पहले हिंसा की बौखलाहट

29 अप्रैल को दूसरे चरण में 142 सीटों पर मतदान होना है। ये सीटें सत्ता के समीकरण के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। पहले चरण के नुकसान की भरपाई के लिए टीएमसी ने सिंडिकेट वाली पकड़ वाले मुस्लिम बाहुल इलाकों में हिंदू मतदाताओं को डराने की कोशिश तेज कर दी है।

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हिंसा की कुछ प्रमुख घटनाएं:

  • उत्तर 24 परगना के जगदल में भाजपा विधायक भाटपारा से उम्मीदवार पवन सिंह के घर पर कच्चे बम फेंके गए, तीन लोग घायल।
  • विद्याधरपुर इलाके में भाजपा कार्यकर्ता शिबू राय के घर पर बमबारी, खिड़कियां क्षतिग्रस्त।
  • मुर्शिदाबाद में करीब 100 जिंदा बम बरामद, मतदान प्रक्रिया प्रभावित करने की साजिश।
  • हावड़ा में ‘जय बांग्ला’ बनाम ‘जय श्री राम’ नारों को लेकर विवाद, लाठीचार्ज।

ये घटनाएं साफ बताती हैं कि टीएमसी ‘सब कुछ जीतने’ की मानसिकता के साथ काम कर रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, मतदान से पहले हिंसा का मकसद विपक्षी समर्थकों को घर में कैद रखना है।

पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : महिला सुरक्षा तार-तार

सुरक्षा का अभूतपूर्व इंतजाम : चुनाव आयोग का सख्त रुख

चुनाव आयोग ने इस बार कोई रिस्क नहीं लिया। दूसरे चरण के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में केंद्रीय बलों की लगभग 500 कंपनियां तैनात। कुल मिलाकर पूरे चुनाव में 2.4 लाख से ज्यादा सीएपीएफ (Central Armed Police Forces) जवान। ड्रोन, एआई सर्विलांस, बॉडी कैम और 100 मीटर की ‘लक्ष्मण रेखा’ जैसी नई व्यवस्थाएं लागू की गई है।

प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई – हिंगलगंज थाना प्रभारी निलंबित, डायमंड हार्बर में 5 पुलिसकर्मी सस्पेंड, नए पर्यवेक्षक नियुक्त हुए। क्षेत्र डोमिनेशन के लिए रूट मार्च तेज किया गया।

टीएमसी के गुंडों को सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच ‘टाइम गैप’ का फायदा उठाने की कोशिश करते हुए पाया गया, लेकिन आयोग की चाक-चौबंद व्यवस्था इसे सीमित कर रही है।

Bengal Elections 2026 में बदलती हवा? : संत से सतीत्व तक छाया संकट, बंगाल में हिंसा से पनपा असंतोष, जानें वर्तमान स्थिति

बंगाल की जनता अब डरने को तैयार नहीं

पिछले 15 सालों में टीएमसी ने भय के सहारे सत्ता कायम रखी। लेकिन अब बदलाव दिख रहा है। लोग कह रहे हैं – यह चुनाव परिवर्तन का है। 2021 में जमीन हिली थी, इस बार वह ‘खिसकती’ साफ नजर आ रही है।

4 मई को परिणाम आएंगे। संभवना कम है कि ममता वापसी कर लें, फिर भी उसकी वापसी होती भी है तो पार्टी का मनोबल टूट चुका है। सत्ता में आने के बाद पांच साल सरकार चलाना उनके लिए आसान नहीं होगा। रोजगार, पलायन, सिंडिकेट राज और धार्मिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे जनता के जेहन में हैं।

भवानीपुर से लेकर मुर्शिदाबाद तक, बंगाल अब भय के राज से उबरने की तैयारी में है। चुनाव प्रचार थम गया है। अब जनता को फैसला करना है, पुरानी हताशा भरी राजनीति या नया आत्मविश्वास। टीवी स्क्रीन पर चाहे जो हेडलाइन आए, लेकिन मैदान में हवा साफ तौर पर बदल रही है।

 

पश्चिम बंगाल चुनाव-2026 : बलात्कारी पर मेहरबानी

Topics: Election Commissionwest bengal violenceWest Bengal election 2026पश्चिम बंगाल चुनाव 2026TMC vs BJPBhawanipur RallySayani Ghosh ControversyBengal Voters Trendआशीष कुमार अंशुMamata Banerjee
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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