पश्चिम बंगाल आज करुणा, सहानुभूति और साहचर्य के लगातार शिथिल पड़ने की व्यथा-कथा कहता राज्य बन गया है। ममता बनर्जी की गद्दीनशीनी का समय ऐसा समय माना जाएगा जहां प्रदेश भर में चीख, पुकार, विलाप ने बंगालियों के विनम्र, सदाशयी और भद्रलोकी समाज को प्रशासनिक बंधक बनाकर अनिश्चित संसार में झोंक दिया है।
ममता ने सत्तावाद से टीएमसी के लिए नई राजनीति का प्रभावशाली उपकरण बनाने की ऐसी कोशिश की जिससे संत से सतीत्व तक सबके सब संकट में आ गए। स्वयं को बलशाली, दबंग और निर्भय दिखाने के फेर में ममता ने अपनी उस ममता से ही हाथ धो लिए जिसके लिए वामपंथ छोड़कर प्रदेश ने उनका साथ दिया था।
ममता बनर्जी बांग्ला बोलती जरूर हैं, लेकिन उनकी भाषा की आक्रामकता के कारण टैगोर, शरतचंद्र, बंकिम की अंतरानुशासिक शब्दावली गायब नजर आती है। यानि उनकी शैली में आवेगों का बिछलन है, लेकिन किस तट पर रुकना है, उसका संयम दिखाई नहीं देता।
भवानीपुर में साधुओं के साथ घटना
हाल ही में कोलकाता के भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र के वार्ड नंबर 70 स्थित एक आश्रम में कई साधुओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया, उन्हें धमकाया गया, बिजली-पानी की आपूर्ति बंद कर देने की धमकी दी गई। साधु-संतों का कहना है कि वे कालीघाट और आसपास के क्षेत्रों में सनातन धर्म का प्रचार कर रहे थे। पद्मपुकुर इलाके में उनके आश्रम में कुछ लोग घुस आए, उन्हें खींचकर आश्रम से बाहर निकाला गया।
जब इसे टीएमसी पार्षद असीम बसु ने इस सबको गलत बताया तो खुद सुवेन्दु अधिकारी ने इसे हिन्दुओं पर अत्याचार निरुपित किया। भवानीपुर से ही ममता बनर्जी को सुवेन्दु अधिकारी चुनौती दे रहे हैं, वे नंदीग्राम से भी चुनाव लड़ रहे हैं।
कालीघाट मंदिर के पास ही ममता बनर्जी का पुश्तैनी घर है, पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी के घर से साधुओं के साथ घटी दुर्घटना का स्थल पैदल चलने पर करीब तीन मिनट की दूरी पर है। सवाल यह है कि जिस लोकतांत्रिक अबीरी जनोत्सवों के चलते सरकारें बनती हैं, उनसे वैदिक समाज और बौद्ध युग के इस आदिपर्व को हताहत करने वाली शक्तियां कहां से उभर आती हैं? आखिर कैसे और क्यों भद्रलोकी समाज के इतिहास में बर्बरता का इतिहास मिला दिया गया?
चुनावी हिंसा और राजनीतिक परिदृश्य
खबरें हैं कि 2021 के विधानसभा चुनावों के दौरान हुई या की गई हिंसा में 40 लोग मारे गए और 2019 के लोकसभा चुनाव में 11 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। इस चुनाव में कांग्रेसी नदी में कोलाहल सदैव की तरह बरकरार है, जिसमें उम्मीद के दीपदान, बहाव के साथ बहता कचरा, निराशा के शव पूरे पश्चिम बंगाल में जगह-जगह बहते दिखाई दे रहे हैं।
1972 के बाद कांग्रेस को यहां कभी राजनीतिक जमीन हासिल नहीं हुई। हालांकि चुनाव परिणामों के कनक-तन को अपने साथ साझा करने की हर कोशिश आत्मनिर्भर बनती कांग्रेस कर रही हैं। 294 सीटों पर दो दशक के अंतराल बाद प्रत्याशी खड़ी करती कांग्रेस स्वेटर की तरह सपने बुन रही है कि तृणमूल से छूटते मतदाता अबकी बार कांग्रेस को चुनेंगे।
कूचबिहार जिले की चुनावी स्थिति
पश्चिम बंगाल का कूचबिहार जिला इस विधानसभा चुनाव के बारे में तफसील से बना रहा है कि तृणमूल के लिए मत युद्ध आसान नहीं है, जिले की 9 विधानसभा सीटों में से पिछली बार ही भाजपा ने 7 सीटों पर विजयी परचम फहराया था। सिर्फ सिताई और मोहालीगंज उससे दूर रह गए थे। विविध सामाजिक संरचना वाले जिले में कुच राजवंशी समुदाय का प्रभाव है। इसके अलावा अनुसूचित जाति भी बड़ी संख्या में है। दिनहाटा जैसे क्षेत्र में मुस्लिम बहुलता है, इसलिए कि यह इलाका बांग्लादेश का सीमावर्ती है।
लक्ष्मी भंडार’ और ‘दुआरे चिकित्सा’ योजना और बंगाल विभाजन का भय फैलाकर सूती साड़ी में साध्वी का भेष बनाकर ममता अपना सत्ताई घरौंदा बचाने में लगी है।
आसनसोल में ममता कह रही हैं कि उनके पास सूचना है कि केन्द्र सरकार एक बार फिर परिसीमन करेगी ताकि प्रदेश को तीन भागों में बांटा जा सके। लेकिन वे अपने प्राक् कल्पित आरोपों के उत्तर में कोई प्रमाण नहीं दे पाती। मतदाताओं को उनकी खिन्नता के बावजूद डराते हुए उन्होंने कहा कि पूरे पखवाड़े चौकन्ने रहो, बाद में हम सब देख लेंगे।
जनता के बीच परिवर्तन की सुगबुगाहट
कोलकाता के साल्ट लेक इलाके पर नजर डालें तो यहां ज्यादातर झंडे तृणमूल कांग्रेस के दिखाई देते हैं, लेकिन पूछने पर लोग बताते हैं कि न तो ये झंडे हमने लगाए हैं, न हमारी मर्जी से लगे हैं और न हम इनके वोटर हैं। ये तो इनकी पार्टी के दबंगों की करामात है। शिक्षकों की भर्ती, कोयलाचोरी जैसे घोटाले कटमनी और शारदा चिटफंड घोटालों पर घोटालों की बानगी की तरह है। इस पर ‘एंटीइनकमबेंसी’। इसका कोई पृथक सर्वे तो नहीं हुआ, मगर आम जनता सत्ताई पार्टी के मुखौटों से तंग आ चुकी है।
लोग निजी बातचीत में लोग बदलावी बयार का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि खामोश दिखते चेहरों के बीच दिखते तनाव का कारण उनकी चुप्पी का चयन है, जो वे परिवर्तन के लिए कर चुके हैं। भारतीय प्रामाणिक और संवाद प्रिय शैली के लिए जाने जाते हैं, लेकिन यदि वे अपनी चयनित चुप्पी में उतर जाते हैं तो वह संकेत होता है कि उनका मन वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था से बदल चुका है।
बंगाल में महिलाओं के खिलाफ अपराध और आंकड़े
नारी-विमर्श पर, नारी शक्तिकरण पर, नवाचार की दुहाई देने वाली पश्चिम बंगाल की सरकार अपने ही राज्य में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों पर मूक-दर्शक बनी रही या कि उसकी अपनी भी इसमें कहीं न कहीं संलिप्तता रही है। एनसीआरबी की 22 और 23 की रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34-34 हजार मामले दर्ज किए गए।
आपको याद होगा कोलकाता के आरजीकर मेडिकल कालेज में महिला डाक्टर के साथ हुई घटना, संदेशखाली में महिलाओं के साथ उत्पीड़न की घटनाओं से देश शर्मसार है। यहां की महिलाओं को एक महिला नेत्री के किए गए और दिए गए विमर्श पर भी ऐतबार नहीं करना चाहिए? घटनाओं के आंकड़ों ने बताया कि यह प्रदेश हिंसा से देश के सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में से एक है। अपहरण के हौंसलो में वृद्धि दिखाती अनेक तालिकाएं हैं जिनमें महिलाओं को निशाना बनाया गया है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का कहना है कि महिलाओं के अपहरण की संख्या पुरुषों की तुलना में लगभग पांच गुना है। अजीब बौद्धिक दरिद्रता में असहमतियों से भरे लोगों और स्त्रियों को दलीय उपनिवेशों के अंधियारे कुंए में फेंका जा रहा है। उच्च दबाव का यह संकट मनुष्य की संवेदना का भी संकट है जिसे समझना आज अनिवार्य है।
हिंसा, घटनाएं और सामाजिक प्रभाव
अपराध सामाजिक समरसता के निषिद्ध इलाकों से शुरू होता है और प्रपंच स्थल पर ही पूरा घटित होता है। वे मछलियां कहां जाएं जिनकी नियति में मृत्यु के बाद भी वहीं तैरना बदा है। विस्थापित होने में असमर्थ अपने भाव, भाषा और क्षेत्र से जुड़े ये लोग जिन्होंने गंगासागर जाते हुए निर्वस्त्र किया जाना और पीटा जाना झेला था, सभी साधु थे। वह पुरुलिया में घटा था।
वहीं जब भाजपा ने इस घटना को ‘पालघर जैसी घटना’ बताया तो उसका खंडन होना ही था, पुलिसिया अंदाज में किए खंडन में कहा गया कि यह अपहरण की गलतफहमी का नतीजा था। भावुक अपील के साथ दिल-दिमाग की लुटेरी ममता सरकार के बौने विवेक के आगे पूरा देश हतप्रभ है।
अनुभव, अनुभूतियों और संवेदना की उछाली फांखों ने पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को संजीदगी में – नए प्रदेश की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार कर दिया है। हिंसक, सारबहुल हरकतों ने साफ कर दिया है कि युवा और महिला मतदाता की प्रतिक्रिया निश्चित इस सरकार को बदल देगी। वैसे भी स्त्री को आवाज देती महादेवी जी कह गई ‘तू न अपनी छांह को अपने लिए कारा बनाना, जाग तुझको दूर जाना’।
धार्मिक संस्थाओं पर आरोप और प्रतिक्रिया
अनेक पूर्वनियोजित लगती दुर्घटनाओं के बावजूद इस देश की एकात्मता की पहचान ही चरम स्वाधीनता में है, जिसे नियंत्रित करने और अपने ढंग से संचालित करने का प्रयास पश्चिम बंगाल में अर्से से किया जा रहा है। जिस देश में प्रत्येक व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक स्तर की आवश्यकतानुसार अनुभव प्राप्ति के अवसर दिए जाने के अनेक विमर्श मौजूद हैं, वहीं पश्चिम मेदिनीपुर में हिन्दू संत हिरण्मय महाराज पर जान लेवा हमला हुआ, उनके बाल तक काट दिए गए। बावजूद इस सबके मुख्यमंत्री ममता ने भारत सेवाश्रम संघ और रामकृष्ण मिशन जैसे संगठनों पर राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के आरोप लगाए। इसका जबर्दस्त विरोध भी हुआ, लेकिन उन्होंने इसे दलीय स्पर्धा का मसला निरुपित कर दिया।
चुनाव प्रक्रिया और हिंसा का प्रभाव
चुनाव के समय फैलती या फैलायी जाती हिंसा ने चुनाव आयोग को प्रदेश में एक चरण में संपन्न होने वाले चुनाव को 6 चरण तक किए जाने के लिए बाध्य कर दिया। 2021 में तो यहां आठ चरणों में चुनाव करना पड़ा। कारण हिंसा, हत्या, पोलिंग एजेंट की पिटाई और अपने हक में मतदान का दौर पश्चिम बंगाल के राजनीतिक स्वभाव के रूप में विभिन्न पार्टियों ने प्रचारित करवाया।
2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान हुई हिंसा में 40 लोग मारे गए। यहां मालदा और मुर्शिदाबाद ज्यादा संवेदनशील इलाके हैं। भवानीपुर में 45 फीसदी गैर बंगाली वोटर हैं। कहते हैं यहां की राजनीति एक ही दिशा में चलती है। वह दिशा गुजराती, मारवाड़ी, सिख और सिंधी इस बार तय कर रहे हैं।
शिक्षा, समाज और अंतिम टिप्पणी
क्या हाल बना दिया है ममता ने प्रदेश का जहां 15 से 19 बरस के 13 फीसदी बच्चे स्कूल ही नहीं जाते। यह उस प्रदेश का जहां अग्रेजों के जमाने में भी खासे अध्ययनशील और राष्ट्रवादी लोग जन्मे। शायद इसीलिए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि ‘बमों’ का जवाब ‘बैलेट’ से और भय का भरोसो से देने का समय गया है। और ‘सोनार बाग्ला‘ का भी।

















