वंदे मातरम् कुछ अज्ञात तथ्य
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 वंदे मातरम् कुछ अज्ञात तथ्य

एक बार स्वामी विवेकानंद ढाका गए थे। युवकों से बातचीत करते हुए एक युवक ने उनसे पूछा, “हमें क्या पढ़ना चाहिए?” तब स्वामी जी ने तुरंत उत्तर दिया-“बंकिम का साहित्य, बंकिम और बंकिम का ही साहित्य पढ़ो।”

Written byPanchjanyaPanchjanya
Sep 1, 2026, 07:56 pm IST
inभारत, विश्व
  • एक बार स्वामी विवेकानंद ढाका गए थे। युवकों से बातचीत करते हुए एक युवक ने उनसे पूछा, “हमें क्या पढ़ना चाहिए?” तब स्वामी जी ने तुरंत उत्तर दिया-“बंकिम का साहित्य, बंकिम और बंकिम का ही साहित्य पढ़ो।”
  •  क्रांति के अग्रदूत वासुदेव बलवंत फड़के एडन जेल में मृत्यु के अधीन हुए। यमपाश उन्हें जकड़ रहे थे। क्षणभर के लिए यमदूत भी थर्रा गए। हमेशा वे यातना से विव्हल, रोती हुई सूरतें और बचने के लिए व्यर्थ चेष्टाएं देखते थे, परंतु वासुदेव जी के चेहरे पर मंद मुस्कान थी। एक चुनौती थी, साथ ही कृतकृत्यता के भाव थे और होठों पर मंत्र था-“वंदे मातरम्।”
  •  योगी अरविंद भी वंदे मातरम् के भाव से प्रभावित थे। उन्होंने वंदे मातरम् का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्होंने ‘इंदुप्रकाश’ में वंदे मातरम् पर लेख लिखे। वंदे मातरम् के संबंध में यह प्रथम दार्शनिक व्याख्या थी। अरविंद कहते हैं-बंकिम ने स्वदेश को माता की संज्ञा दी। वंदे मातरम् संजीवनी मंत्र है। हमारे स्वाधीनता संग्राम का शस्त्र वंदे मातरम् है। उनकी ‘भवानी मंदिर’ पुस्तक भी ‘आनंदमठ’ पर आधारित थी।
  •  ‘वंदे मातरम्’ की स्वरलिपि सर्वप्रथम यदुनाथ भट्ट ने बनाई थी-मल्हार राग और कव्वाली ताल में। बंकिम बाबू स्वयं हार्मोनियम पर जगदीशनाथ राय, हेमचंद्र बनर्जी और ताराप्रसाद चट्टोपाध्याय के साथ वंदे मातरम् गाते थे। आगे चलकर नेपालचंद्र धर नाम के गायक ने इस गीत को देस मल्हार राग में ढाला।
  •  इस गीत के प्रचार में ठाकुर परिवार का भारी योगदान रहा। प्रतिभा सुंदरी देवी ने सर्वप्रथम इसकी स्वरलिपि बनाकर ‘बालक’ पत्रिका में उसका समावेश किया।
  •  1896 में स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसकी स्वरलिपि बनाई और कांग्रेस अधिवेशन में इसे गाया भी। कविवर की भावमधुर आवाज, भक्तिपूर्ण स्वर तथा गीत की भावनाओं से जनमानस इतना प्रभावित हुआ कि उसी समय इस पर राष्ट्रगीत की मुहर लगा दी।
  •  1901 के कांग्रेस अधिवेशन में गायक दक्षिणरंजन सेन ने वंदे मातरम् गाया था। अध्यक्ष थे श्री दीनशा ईदुलवाचा। महात्मा गांधी भी इस अधिवेशन में उपस्थित थे।
  • रवींद्रनाथ जी की भतीजी सरलादेवी चौधुरानी का धैर्य और साहस अत्यंत प्रशंसनीय था। 1905 में वाराणसी में कांग्रेस का अधिवेशन था। अध्यक्ष थे नामदार गोखले। सरलादेवी को अधिवेशन मंडप में देखकर उनसे वंदे मातरम् गाने का आग्रह होने लगा। अंत में अध्यक्ष के विरोध और जनता के आग्रह के बीच दो कड़ियां गाने की अनुमति लेकर वे खड़ी हुईं। वंदे मातरम् गीत का प्रभाव ऐसा था कि वे अपने को खो बैठीं और पूरा गीत गाकर ही रुकीं।

वंदे मातरम : भारत की सांस्कृतिक चेतना का अमर घोष

  •  ख्यातनाम गायिका हिराबाई बड़ोदेकर के संदर्भ में प्रो. अरविंद मंगरुलकर लिखते हैं-1939 की बात है। संगीत की महफिल के आखिरी में हिराबाई खड़ी होकर वंदे मातरम् गाने लगीं। उन्होंने तिलक कामोद में वंदे मातरम् गाया। यह स्वर वसंत देसाई ने दिया हुआ था।
  • 1923 में कांग्रेस का अधिवेशन काकीनाडा में था। अध्यक्ष थे सैयद मोहम्मद अली। नित्यक्रमानुसार पं. पलुस्कर गीत गाने के लिए मंच पर उपस्थित हुए। अध्यक्ष ने आक्षेप लिया। पलुस्कर ने तपाक से उत्तर दिया-“यह कांग्रेस का मंच है, न तो खिलाफत सम्मेलन का मंच, न मस्जिद।” और उन्होंने वंदे मातरम् गाना प्रारंभ किया। उन्होंने पूरा गीत गाया।
  • 1882 से 1894 तक, बंकिमचंद्र के जीवनकाल में ही ‘आनंदमठ’ के पांच संस्करण प्रकाशित हो चुके थे। 1900 तक ‘आनंदमठ’ का हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु, कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद हो चुका था। 1883 में उसकी लोकप्रियता का लाभ उठाते हुए नेशनल थिएटर (प्रताप जौहरी द्वारा संचालित) के अध्यक्ष केदारनाथ चौधरी ने इसका नाट्य-रूपांतर किया और उसी वर्ष वह मंचस्थ भी हुआ। इसमें श्री देवकंठ बागची ने वंदे मातरम् को स्वर दिया।
  • सावरकर और हरदयाल-इन दोनों क्रांतिकारियों ने लंदन के भारतीयों में क्रांति की चेतना का निर्माण किया। ‘इंडिया हाउस’ क्रांतिकारी गतिविधियों का प्रभाव-केंद्र बन गया। वंदे मातरम् के स्वर लंदन में गूंजने लगे।

वंदे मातरम्’ की 150 वर्ष की यात्रा पर पाञ्चजन्य पत्रिका का विशेष आयोजन

  • 1902 से लेकर लगभग 1938 तक महात्मा गांधी पत्र के अंत में “Vande Mataram from Bapu” लिखते थे।
  • बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से निकला यह गीत 1896 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के कंठ से कांग्रेस के राष्ट्रीय मंच तक पहुंचा, 1905 के स्वदेशी आंदोलन में अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध जन घोष बना और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए मातृभूमि के प्रति समर्पण का मंत्र।
  •  1908 में खुदीराम को फांसी हुई। वंदे मातरम् कहते हुए वे मृत्यु के सिंहासन पर चढ़े।
  • 23 दिसंबर,1912 को लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया। लाला हरदयाल उस समय अमेरिका में थे। यह समाचार ज्ञात होते ही उन्होंने भरतीय छात्रों की सभा ली। आनंद से जयगान हुआ और वंदे मातरम् गीत गाया गया।
  • आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति 1906 से लेकर 1914 तक रहे। इस बीच पंजाब विश्वविद्यालय ने उन्हें दीक्षांत समारोह में आमंत्रित किया था। तब सर्वप्रथम उन्होंने वंदे मातरम् गाना प्रारंभ किया।
  • चंद्रशेखर जब पत्र लिखते थे, तब पत्र का प्रारंभ और समापन “वंदे मातरम्” से ही करते थे।
  • नेहरू ने रविन्द्र नाथ ठाकुर के सांस्कृतिक प्रभाव का उपयोग अपने राजनीतिक समझौते को सही ठहराने की ढाल के रूप में किया, ताकि कांग्रेस के भीतर विरोध कम हो। 29 अक्टूबर, 1937 को नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यसमिति ने विवादास्पद प्रस्ताव पारित कर ‘वंदे मातरम्’ को छोटा कर दिया और घोषणा की कि राष्ट्रीय मंचों पर केवल शुरुआती दो पद गाए जाएंगे। नेहरू ने सार्वजनिक रूप से इस काट-छांट का बचाव करते हुए कहा कि शेष भाग में ऐसी “विचारधारा, कल्पना और रूपक हैं जिन्हें विभिन्न समूह स्वीकार नहीं कर सकते।”
  • अक्टूबर, 1937 में मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन के बाद नेहरू की तुष्टिकरण की नीति के कारण ही इस महान राष्ट्रीय गीत का अंगभंग हुआ। उन्होंने जिन्ना और मुस्लिम लीग के सांप्रदायिक दबाव के आगे घुटने टेकते हुए सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर के साथ पत्राचार कर राजनीतिक ढाल तैयार की, और 29 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस कार्यसमिति से विवादास्पद प्रस्ताव पारित करवाकर गीत के अंतिम छंद हटा दिए।
  • अगस्त, 1938 को शास्त्रीय गायक मास्टर कृष्णराव ने मुंबई रेडियो स्टेशन में शास्त्रीय गायन ‘वंदे मातरम्’ को जोड़कर गाया। तब स्टे शन निदेशक जेड.ए. बुखारी ने बिजली गुल कर प्रसारण रोक दिया।
  •  1947 में भारत को स्वाधीनता प्राप्त हुई। 15 अगस्त को स्वतंत्रता की घोषणा होनी थी। पं. ओंकारनाथ कुछ कारणवश मद्रास गए थे। वुडलैंड होटल में उनका निवास था। अचानक नभोवाणी के निदेशक पंडितजी के पास आए और बोले, “आपको सरदार पटेलजी ने दिल्ली आकाशवाणी पर 15 अगस्त को प्रातः वंदे मातरम् गाने के लिए आमंत्रित किया है।” “मैं तैयार हूं। वंदेमातरम् गाऊंगा जरूर, परंतु पटेल जी को कहिए, पूरा गीत गाने की अनुमति होगी तो ही दिल्ली आऊंगा।” सरदार पटेल ने तत्काल संदेश दिया-“आप आइए और संपूर्ण वंदे मातरम् गाइए।” श्री श्यामलदास गांधी कहते हैं-“15 अगस्त, 1947 की भोर में, जब स्वतंत्रता का सूर्योदय हो रहा था, तब आकाशवाणी पर पंडित ओंकारनाथ खड़े होकर उस स्वर्णिम विहान में मुक्त विहंग की भांति पूरे उल्लास के साथ वंदे मातरम् गा रहे थे।”
  • 15 जून 1948 को डॉ. बी. सी. रॉय को लिखे पत्र से स्पष्ट है कि नेहरू ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्र भारत का राष्ट्रगान बनाने के प्रति गंभीर नहीं थे। उन्होंने तर्क दिया कि यह गीत अतीत के संघर्ष का प्रतीक है, जबकि राष्ट्रगान को विजय और पूर्णता का प्रतीक होना चाहिए; साथ ही इसकी धुन सैन्य या विदेशी ऑर्केस्ट्रा के अनुकूल नहीं है। उनकी व्यक्तिगत दूरी इस वाक्य से उजागर होती है: “जहां तक शब्दों का सवाल है, ‘वंदे मातरम्’ में ऐसी भाषा का उपयोग हुआ है जिसे अधिकांश लोग नहीं समझते हैं। निश्चित रूप से, मैं स्वयं इसे नहीं समझता।”

वंदे मातरम्! प्रश्न केवल गीत का नहीं, भारत की राष्ट्रीय दृष्टि का है

Topics: रवींद्रनाथ ठाकुरसरदार वल्लभभाई पटेलपाञ्चजन्य विशेषबंकिमचंद्र चट्टोपाध्याययोगी अरविंदवासुदेव बलवंत फड़केपंडित ओंकारनाथ ठाकुरजवाहरलाल नेहरूमास्टर कृष्णरावकांग्रेस अधिवेशनपंडित विष्णु दिगंबर पलुस्करस्वतंत्रता संग्रामसरलादेवी चौधुरानीवंदे मातरम्
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