डर के आगे जीत है : क्या ट्रंप साहब के 100 प्रतिशत टैरिफ से डरने की है जरूरत?
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डर के आगे जीत है : क्या ट्रंप साहब के 100 प्रतिशत टैरिफ से डरने की है जरूरत?

Trump 100 Percent Tariff: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 100% टैरिफ के प्रस्ताव का वैश्विक व्यापार पर असर। जानिए भारत के पास इससे निपटने के क्या विकल्प हैं।

Written byडॉ. अश्वनी महाजनडॉ. अश्वनी महाजन — edited by Shivam Dixit
Sep 23, 2026, 08:00 pm IST
inभारत, विश्व, विश्लेषण
डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति

जब से राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी राष्ट्रपति के नाते अपनी दूसरी पारी की शुरुआत की है, दुनिया भर के देशों पर उन्होंने टैरिफ आक्रमण शुरू किया हुआ है, जिसके कारण विश्व व्यापार में एक अनिश्चितता आई हुई है। एक जनवरी 1995 को जब से विश्व व्यापार संगठन अस्तित्व में आया था, तब से यह आशा की गई थी कि विश्व व्यापार नियमों के आधार पर चलेगा और कोई भी देश अपनी मनमर्जी से एकतरफा कार्यवाही नहीं कर सकेगा। टैरिफ पूर्व निर्धारित दरों के आधार पर ही लगेंगे और गैर-टैरिफ रूकावटें में नियमों के अनुसार ही होंगी। देश के उद्योगों को नुकसान पहुंचाने या बाजारों पर कब्जा करने की दृष्टि से अनावश्यक डंपिंग नहीं होगी और ऐसा होने पर डंपिंग रोधी शुल्क लगाए जा सकेंगे। नियमों का उल्लंघन होने पर विश्व व्यापार संगठन में विवाद निपटारण व्यवस्था के अंतर्गत कार्रवाई भी हो सकेगी। एक लंबे समय तक यह चलता रहा।

लेकिन अमरीका जिसके दबाव में की वजह से ही, विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई थी, पिछले लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय से उसी के असहयोग के कारण केवल संगठन का कामकाज ही प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि विवाद निपटारण व्यवस्था तो बिल्कुल ठप्प ही हो गई है। इसके कारण किसी भी देश द्वारा मनमानी होने पर उसका समाधान कठिन हो जाता है।

इन हालातों में अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा मनमानी टैरिफ लगाने से एक तरफ विश्व व्यापार संगठन पंगु बना हुआ है, तो दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अस्त-व्यस्त हो रहा है। हाल ही में अमरीकी सेनेट द्वारा पारित कानून, जिस पर राष्ट्रपति ट्रंप ने भी हस्ताक्षर कर दिए हैं, के अनुसार राष्ट्रपति को यह अधिकार मिल गया है कि वह भारत सहित उन देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा सकेंगे, जो रूस से ज्यादा कच्चा तेल खरीदते हैं।

गौरतलब है कि भारत पिछले कुछ सालों से अपनी जरूरत का लगभग 40 प्रतिशत कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है। चूंकि रूस पर, अमरीका और पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए हुए हैं, वो भारत को सस्ते दामों पर तेल बेच रहा था। वर्ष 2022-23 से पहले भारत रूस से अपनी जरूरत का मात्र 2 प्रतिशत ही कच्चा तेल खरीदता था। आईएमएफ के अनुसार वर्ष 2024 में भारत की 40 प्रतिशत मांग की आपूर्ति रूसी तेल से हुई और उससे अनुमानित डिस्काउंट से लाभ यदि 10 डालर प्रति बैरल भी मानें, तो उसके कारण भारत को लगभग 8 अरब अमेरिकी डॉलर की बचत हो रही थी, जो हमारी जीडीपी के 0.2 प्रतिशत के बराबर है। हालांकि वर्ष 2026 के लिए आईएमएफ के आंकड़े उपलब्ध नहीं है, लेकिन जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 तक के लिए आईएमएफ का कहना है कि भारत ने कुल तेल आयातों का 41 प्रतिशत रूस से आयात किया। अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद 2025-26 में भी भारत ने रूस से 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा।

जुलाई और अगस्त 2026 की बात की जाए तो देखते हैं कि जुलाई में भारत के कुल कच्चे तेल के आयात का हिस्सा 55.9 प्रतिशत और 45 प्रतिशत रहा। माना जा सकता है कि अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद वर्ष 2022-23 से अभी तक भारत लगातार रूसी तेल खरीद कर बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा बचा रहा है।

अमरीका द्वारा रूस से तेल खरीदने के खिलाफ टैरिफ की कवायद अगस्त 2025 से शुरू हुई, जब उसने रूस से कच्चा तेल खरीदने पर मौजूदा व्यापार टैरिफ के अलावा 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया, जिससे कुल टैरिफ का बोझ 50 प्रतिशत हो गया। समझना होगा कि 2024-25 में अमरीका को भारत ने 86.51 अरब डॉलर का निर्यात किया था। टैरिफ लगाने के बाद चाहे निर्यात कम नहीं हुए, लेकिन निर्यात बढ़ने की वृद्धि दर जरूर थम गई और 2025-26 में अमरीका को निर्यात केवल 1 प्रतिशत अधिक 87.3 अरब डॉलर के रहे। लेकिन समझना होगा कि चाहे हमारे निर्यात नहीं घटे, लेकिन अमरीका के साथ हमारा व्यापार अतिरेक जरूर कम हुआ है, क्योंकि अमरीका से हमारे आयात 17.2 प्रतिशत बढ़ गए। अमरीकी कच्चा तेल औद्योगिक इनपुट क्रिटिकल आयात में वृद्धि के मुख्य कारण रहे।

समझा जा सकता है कि अमरीका को निर्यात बढ़ने की गति थमी है, लेकिन यह भी सच है कि भारत के निर्यात बढ़ने की गति अब अवश्य बढ़ने लगी है। वर्तमान वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में हमारे निर्यात 12 प्रतिशत बढ़े, जबकि पिछलें साल की इसी तिमाही में यह 6 प्रतिशत ही बढ़े थे। यानी माना जा सकता है कि अमरीकी टैरिफ ने भारत के अमरीका के निर्यात की बढ़ने की गति को जरूर कम किया है, लेकिन भारत के निर्यात पहले से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं।

अमरीकी मजबूरी

गौरतलब है कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा टैरिफ थोपते हुए भी भारत से होने वाले लगभग आधे निर्यातों को उससे मुक्त रखा गया, जिनमें दवाइयां, कृषि उत्पादन एवं खाद्य वस्तुएं, कच्चा माल एवं क्रिटिकल मिनरल, उच्च तकनीक एवं उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स आदि। इस वजह से भी अमरीका को भारतीय निर्यातों पर प्रभाव नहीं पड़ा और टैरिफ से प्रभावित अमरीका को भेजे जाने वाले उत्पादों का रुख निर्यातकों ने दूसरे बाजारों की ओर मोड़ दिया, जिसके कारण भारत के कुल निर्यातों की वृद्धि दर कम होने के बजाए पिछले साल 6 प्रतिशत से इस साल 12 प्रतिशत तक बढ़ गई।

जबसे अमरीकी टैरिफ का दौर शुरू हुआ है, उस दौरान भारत द्वारा अभी तक 38 देशों को शामिल कर भारत ने 9 मुक्त व्यापार समझौते किये हैं, जिनमें कई विकसित देश भी हैं। इनका कुछ असर तो अभी दिख रहा है और जल्दी इसका व्यापक असर भी देखने को मिलेगा।

क्या 100 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ से डरने की है जरूरत?

ध्यातव्य है कि फरवरी 2026 में अमरीका के साथ समझौते के मसौदे पर सहमति होने के बाद भारत ने अमरीका से तेल और गैस की खरीद बढ़ा दी है। यही नहीं, वेनेजुएला से भी तेल की खरीद का पैसा सीधे अमरीका को भेजा जा रहा है। आज अमेरिका के आग्रह पर भारत वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है।

अमरीका के हालिया कानून में छूट देकर यूरोप को तो दंडात्मक टैरिफ से मुक्त कर दिया गया और इस नए कानून के लक्ष्य भारत और चीन बन चुके हैं। चीन पर अमरीका की निर्भरता कई मायनों में बहुत अधिक है, इसलिए जानकारों का मानना है कि वो चीन पर तो 100 प्रतिशत टैरिफ नहीं लगाएगा। इसलिए भारत अमरीकी दबाव का एकमात्र लक्ष्य दिखाई देता है।

पूर्व में भी भारत द्वारा अमरीका के साथ समझौते के मसौदे पर सहमति होने पर अमरीका और वेनेजुएला से तेल खरीद बढ़ा दी थी। इसलिए अमरीका को ऐसा लगता है कि वह 100 प्रतिशत टैरिफ का डर दिखाकर उससे और अधिक रियायतें ले सकता है। इससे पहले भी कई मौकों पर भारत ने मसौदे पर सहमति का आदर करते हुए अमरीकी मांगों को मान लिया। जिससे अमरीका को फायदा होने लगा। इससे पहले पिछले वर्ष अमेरिका का व्यापार घाटा भी कम हो गया।

हालांकि अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर मसौदे में कई ऐसी बातें हैं, जो भारत के हित में नहीं है, उसके बावजूद भारत की ओर से समझौते को जल्द ही करने की बात दोहराई जाती रही है। उसके बावजूद भी रूस से तेल नहीं खरीदने की मांग ऐसी है, जिसे स्वीकार करने से भारत को कई प्रकार के नुकसान होंगे।

पहला, भारत और रूस लंबे समय से मित्र हैं। अमरीका के दबाव में यदि रूस से तेल खरीद रोकी जाती है तो भारत रूस की मित्रता में खटास आ सकती है।

दूसरे, भारत की नीति यह रही है कि रणनीतिक सुरक्षा और भू-राजनीतिक कारणों से भारत अपने तेल और गैस की खरीद के स्रोतों में विविधता बनाए रखें, ताकि किसी एक स्रोत से व्यवधान होने पर भारत को नुकसान न हो।

तीसरे, रूस से तेल खरीदने के दो फायदे हैं – पहला, हमें तेल डिस्काउंट पर मिलता है, जिससे हमारे देश में मुद्रास्फीति काबू में रहती है और दूसरा यह है कि हम रूस से रुपए के बदले भी तेल खरीदते हैं, जिसे डॉलर की मांग घटती है, जिससे हम अपना व्यापार घाटा कम कर सकते हैं

चौथे, अमेरिका ऐसी बात फैलाने की कोशिश कर रहा है कि भारत रूस से तेल इसलिए खरीद रहा है क्योंकि मौजूदा राष्ट्रपति ट्रंप ने उन्हें ऐसा करने की इजाज़त दी है; राष्ट्रपति ट्रंप लगातार ऐसे बयान देते रहे हैं। इस बात को भी गलत साबित करना ज़रूरी है। इसलिए, अगर भारत 100 प्रतिशत टैरिफ के दबाव में आकर रूस से तेल खरीदना बंद कर देता है, तो मौजूदा सरकार को राजनीतिक नुकसान होगा।

क्या हैं विकल्प?

यह सच है कि भारत अमेरिका को बड़े पैमाने पर सामान निर्यात करता है, इसलिए अमेरिका उन उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है, जिनके लिए उसके पास दूसरे विकल्प मौजूद हैं। हालांकि, यह भी सच है कि अमेरिका कई उत्पाद, जैसे कि दवाएं, ज़रूरी सामान, इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स, मोबाइल और उनके पार्ट्स वगैरह को ऊंचे टैरिफ से छूट देगा।

पिछले एक साल में भारतीय निर्यातकों ने ऐसे तरीके सीख लिए हैं जिनसे वे अमेरिकी टैरिफ से बच सकते हैं और दुनिया के दूसरे बाज़ारों में अपना सामान बेच सकते हैं। इस संदर्भ में, अलग-अलग देशों और देशों के समूहों के साथ हाल ही में किए गए एफटीए (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) हमारे एक्सपोर्टर्स की मदद कर सकते हैं।

साफ़ बात यह है कि दबाव में झुकने और कमज़ोरी दिखाने से और ज़्यादा अमरीका की मांगें और बढ़ेंगी। जब कोई देश एक बार झुक जाता है, तो दूसरी तरफ़ वाले को पता चल जाता है कि ज़्यादा दबाव डालने से काम बनता है।
इस संदर्भ में, एक अहम सवाल यह है कि क्या भारत को अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) करने में केवल ऊपरी तौर पर दिलचस्पी दिखानी चाहिए। हम इस कोशिश में अमेरिका के साथ बातचीत जारी रख सकते हैं, लेकिन असल में समझौता तब तक नहीं करना चाहिए जब तक भारत के हितों की पूरी तरह से सुरक्षा न हो जाए और अमरीकी प्रशासन प्रस्तावित समझौते में यह लिखित में स्वीकार करे कि इस समझौते के बाद अमरीकी प्रशासन द्वारा लगाया गया कोई भी टैरिफ भारत पर लागू नहीं होगा।

आत्मानिर्भरता है ज़रूरी

राष्ट्रपति ट्रंप की एकतरफ़ा टैरिफ़ की धमकी ने एक बार फिर भारत की आर्थिक मज़बूती और रणनीतिक आज़ादी के लिए ‘आत्मनिर्भरता’ के महत्व को रेखांकित किया है। जब टैरिफ़ और बाहरी प्रतिबंधों जैसी वैश्विक व्यापार नीतियों का इस्तेमाल भू-राजनीतिक हथियारों के तौर पर किया जाता है, तो ऐसे में विदेशी बाज़ारों पर बहुत ज़्यादा निर्भरता के गंभीर परिणाम होते हैं। इस संदर्भ में, हम समझते हैं कि आत्मनिर्भरता कोई लंबी अवधि का आर्थिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि एक तत्काल रणनीतिक ज़रूरत है।

सर्वप्रथम, हालांकि यह सच है कि अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा व्यापारिक गंतव्य है, जहाँ से भारत 87 बिलियन डॉलर से ज़्यादा का सामान निर्यात करता है। लेकिन यह सिर्फ़ एकतरफ़ा व्यापार नहीं है। पिछले साल, अमेरिका ने भी भारत को काफ़ी मात्रा में निर्यात किया, जिससे हमारा अमरीका के साथ व्यापार में अतिरेक काफ़ी कम हो गया। जब अमेरिका द्वारा हमारे सामान पर 100 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया जा रहा है, तो हम अमेरिका से आने वाले सामानों के के घरेलू विकल्प तलाश सकते हैं या दूसरे देशों से वही सामान खरीद सकते हैं। हमने पहले ही रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य क्षेत्रों में विदेशी स्रोतों पर अपनी निर्भरता कम कर दी है। आज भारत अमेरिका से कई तरह की तकनीकों पर निर्भर है, और तकनीकी आत्मनिर्भरता का महत्व सामने आता है। हम पहले से ही अपनी तकनीकें विकसित कर रहे हैं और उनकी गति को और तेज़ कर सकते हैं।

दूसरे, हम घरेलू निर्यात उद्योगों को भी अनुचित टैरिफ से सुरक्षित कर सकते हैं। 100 प्रतिशत टैरिफ़ की धमकी निर्यात के एक ही बाज़ार पर केंद्रित होने के ख़तरे को उजागर करती है। हमें स्थानीय स्तर पर मूल्य संवर्धन को बेहतर बनाने, उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाने और व्यापारिक साझेदारों में विविधता लाने की कोशिश करनी चाहिए—इसके लिए यूरोप, कनाडा और खाड़ी देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (एफ़टीए) की गति को भी तेज़ करना होगा और उनको सही ढंग से लागू करने का भी प्रयास करना होगा, ताकि स्थानीय निर्माताओं को किसी एक बाज़ार में आने वाले झटकों से बचाया जा सके।

तीसरे, टैरिफ़ की धमकी सीधे तौर पर भारत द्वारा सस्ते रूसी कच्चे तेल की खरीद से जुड़ी है। नवीकरणीय ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और महत्वपूर्ण क्लीन-टेक उपकरणों के घरेलू निर्माण के ज़रिए ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने से यह सुनिश्चित होता है कि भारत बाहरी कीमतों के उतार-चढ़ाव और राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रहे।

चौथे, आयात के विकल्प और घरेलू आपूर्ति श्रृंखलाओं को बढ़ावा देना भी जरूरी है।एक आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था भारत को दबाव डालने वाले विदेशी कानूनों के बजाय पूरी तरह से राष्ट्रीय हित के आधार पर स्वतंत्र विदेश नीति और व्यापारिक निर्णय लेने की कूटनीतिक ताकत देती है। आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया से अलग-थलग रहना नहीं है, बल्कि विकल्प और आर्थिक मज़बूती पैदा करना है। आंतरिक क्षमताओं, घरेलू मांग और बाज़ार के लचीलेपन को विकसित करने से यह सुनिश्चित होता है कि जब विदेशी ताक़तें अपनी मनमानी करें, तब भी भारत मज़बूत बना रहे।

Topics: donald trumpwtoglobal economyUS trade warIndia US trade relationsTrump Tariff PolicyPanchjanya news
डॉ. अश्वनी महाजन
डॉ. अश्वनी महाजन
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