पश्चिमी सूचकांकों का पुराना खेल: अकादमिक स्वतंत्रता की आड़ में भारत पर निशाना, जानें रिपोर्ट की पोल!
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पश्चिमी सूचकांकों का पुराना खेल: अकादमिक स्वतंत्रता की आड़ में भारत पर निशाना, जानें रिपोर्ट की पोल!

Academic Freedom Index India: पश्चिमी सूचकांकों और 'फ्री टू थिंक 2026' रिपोर्ट में भारत को निशाना बनाने का खेल। जानिए इन रिपोर्ट्स की कार्यप्रणाली और पूर्वाग्रह का सच।

Written byआशीष कुमार 'अंशु'आशीष कुमार 'अंशु' — edited by Shivam Dixit
Sep 24, 2026, 12:35 am IST
inभारत, विश्लेषण, मत अभिमत

हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत की स्थिति गिराने वाले अध्ययन हो या प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में देश को कई बंद समाजों से भी नीचे दिखाने वाली रैंकिंग-भारतीयों को ऐसे अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों से बार-बार निराशा हुई है। इनकी कार्यप्रणाली में पूर्वाग्रह साफ झलकता है। भारतीय विद्वानों ने इनकी पोल बार-बार खोली है। डेटा चयनात्मक होता है, प्रश्नावली सीमित विशेषज्ञों पर टिकी होती है और निष्कर्ष अक्सर एक खास वैचारिक लेंस से निकलते हैं।

स्कॉलर्स एट रिस्क (एसएआर) की ‘फ्री टू थिंक 2026’ रिपोर्ट और अकादमिक स्वतंत्रता सूचकांक (एएफआई) का भारत संबंधी आकलन भी उसी श्रृंखला का हिस्सा लगता है। रिपोर्ट कहती है कि भारत का एएफआई स्कोर 2024 के 0.16 से गिरकर 2026 में 0.14 हो गया और देश ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’ श्रेणी में चीन व अफगानिस्तान के पड़ोस में बैठ गया है। जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच दर्ज 382 हमलों में भारत के 42 मामले संख्या में सबसे अधिक बताए गए हैं। ये आंकड़े चिंता पैदा करते हैं, लेकिन इन्हें बिना जांच स्वीकार करना उसी गलती को दोहराना होगा जिससे भारतीयों का विश्वास इन रिपोर्टों से उठ चुका है।

चुनिंदा घटनाएं, अधूरी तस्वीर

रिपोर्ट केंद्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा पर बढ़ते प्रभाव, यूजीसी के माध्यम से नियंत्रण, कुलपतियों की नियुक्तियों में छूट और संविदा शिक्षकों की बढ़ती संख्या को राज्य के हस्तक्षेप का प्रमाण मानती है। जामिया मिलिया इस्लामिया में परीक्षा प्रश्न, साउथ एशियन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर की सेवा समाप्ति, एसआरएम इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी  (चेन्नई) में सोशल मीडिया पोस्ट पर कार्रवाई और एनसीईआरटी पाठ्यक्रम से जुड़े तीन विद्वानों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लेख किया गया है। जम्मू-कश्मीर में 25 पुस्तकों पर प्रतिबंध को वैचारिक अनुपालन का नया मॉडल बताया गया है। छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर कार्रवाई, दिल्ली विश्वविद्यालय में सभाओं पर अस्थायी रोक और एबीवीपी बनाम एआईएसए-एनएसयूआई के टकराव को परिसरों के राजनीतिकरण का सबूत माना गया है।

इन घटनाओं को नकारा नहीं जा सकता। परिसर में हिंसा, बिना अनुमति के सभाएं और प्रशासनिक कार्रवाई किसी भी लोकतंत्र में चर्चा का विषय बननी चाहिए। लेकिन रिपोर्ट इन घटनाओं को लगभग एकतरफा ढंग से सरकार और एबीवीपी जैसे छात्र संगठनों के खाते में डाल देती है। वामपंथी छात्र संगठनों और एनएसयूआई द्वारा वर्षों से चलाए गए आंदोलनों, कक्षाओं में व्यवधान, परीक्षाओं के बहिष्कार और वैचारिक असहमति रखने वाले शिक्षकों पर दबाव का उल्लेख बहुत कम या संदर्भहीन है। ‘शांतिपूर्ण विरोध’ की परिभाषा अक्सर एक पक्ष की होती है। जो घटनाएं रिपोर्ट में ‘हमला’ बनती हैं, वे कई बार विश्वविद्यालय के अनुशासन, परीक्षा सुधार या परिसर सुरक्षा से जुड़ी प्रशासनिक कार्रवाई होती हैं। 42 मामलों को ‘सबसे अधिक’ बताना भारत जैसे विशाल उच्च शिक्षा तंत्र-हजारों विश्वविद्यालय, लाखों शिक्षक और करोड़ों छात्र-के संदर्भ में अनुपात का ध्यान नहीं रखता।

यूजीसी सुधारों को नियंत्रण का औजार मात्र बताना भी अधूरा है। कुलपति नियुक्ति मानकों में बदलाव और संविदा पदों पर चर्चा लंबे समय से चल रही है। संस्थागत स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संतुलन हर लोकतंत्र में तनाव पैदा करता है। अमेरिका में भी संस्थागत स्वायत्तता के स्कोर में गिरावट दर्ज की गई है, फिर भी भारत को विशेष रूप से ‘बीजेपी सरकार के अधीन’ टैग के साथ पेश किया जाता है। यह भाषा विश्लेषण से ज्यादा आरोप लगती है। मतलब रिपोर्ट पढ़कर यही लगता है कि स्कॉलर्स एट रिस्क को स्कोर में गिरावट की चिंता कम है, उन्हें बीजेपी की सरकार  से परेशानी अधिक है।

दोहरे मापदंड और कार्यप्रणाली की कमजोरी

एएफआई 0 से 1 के पैमाने पर पांच आयामों-अनुसंधान व शिक्षण की स्वतंत्रता, संस्थागत स्वायत्तता, आदान-प्रदान, परिसर अखंडता और अभिव्यक्ति-को मापता है। विशेषज्ञ सर्वेक्षण पर आधारित ऐसे सूचकांकों में चयन पूर्वाग्रह स्वाभाविक है। जो विशेषज्ञ भारत की परिसर राजनीति को एबीवीपी बनाम आईसा/ एनएसयूआई की जगह हिंदू राष्ट्रवाद बनाम स्वतंत्र चिंतन के द्वंद्व के रूप में देखेंगे, उनके उत्तर स्कोर गिराएंगे ही। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भी सीमित गुमनाम उत्तरदाताओं और फंडिंग स्रोतों पर सवाल उठते रहे हैं। हैप्पीनेस रिपोर्ट में आर्थिक-सामाजिक प्रगति के बावजूद भारत को कई अस्थिर देशों से नीचे रखना उसी पद्धति की याद दिलाता है। एएफआई की रिपोर्ट भी अब सवालों के घेरे में है।

179 देशों में से 50 में दशक भर में गिरावट आई है। रिपोर्ट इस वैश्विक गिरावट को स्वीकार करती है। बावजूद इसके भारत को युद्धग्रस्त या पूर्ण प्रतिबंध वाले देशों के साथ एक श्रेणी में रखना तुलना को विकृत करता है। चीन, ईरान, रूस या अफगानिस्तान में शोध विषयों पर राज्य का सीधा प्रतिबंध, विद्वानों की जेल और परिसरों का सैन्यीकरण भारत की स्थिति से गुणात्मक रूप से भिन्न है। भारत में विपक्षी विचार वाले शिक्षक अभी भी लिखते, पढ़ाते और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोलते हैं। आईआईटी, आईआईएससी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों से निकलने वाला शोध उत्पादन, पेटेंट और वैश्विक रैंकिंग में सुधार रिपोर्ट के निराशावादी चित्र से मेल नहीं खाता।

पुस्तकों पर प्रतिबंध या पाठ्यक्रम विवाद को ‘वैचारिक अनुपालन का नया मॉडल’ कहना अतिशयोक्ति है। हर समाज अपनी शिक्षा नीति में राष्ट्रीय इतिहास, संवेदनशील क्षेत्रों और सामाजिक सद्भाव के सवालों पर बहस करता है। पश्चिमी विश्वविद्यालयों में भी कुछ विषयों पर आत्म-सेंसरशिप और फंडिंग कटौती के मामले सामने आए हैं। उन्हें रिपोर्ट उसी तीखे राजनीतिक लेबल के साथ नहीं पेश करती।

चिंता जायज है, लेकिन निदान गलत

परिसरों में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ा है। छात्र संगठन कार्यक्रमों को राजनीतिक अखाड़ा बना देते हैं। पुलिस और प्रशासन की प्रतिक्रिया कभी-कभी कठोर होती है। संविदा शिक्षकों की अनिश्चितता और विश्वविद्यालय प्रशासन की केंद्रीय दिशा शोध संस्कृति को प्रभावित कर सकती है। ये आंतरिक चुनौतियां हैं जिन पर भारत को गंभीरता से विचार करना चाहिए—विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता मजबूत करनी चाहिए, परिसर हिंसा पर समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए और शोध की गुणवत्ता को मात्र प्रकाशन संख्या से आगे बढ़ाना चाहिए।लेकिन एसएआर जैसी संस्थाओं का समाधान लगभग हमेशा एक ही दिशा में जाता है-सत्ताधारी दल की विचारधारा को मूल समस्या मानना। यह दृष्टिकोण भारत की संवैधानिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया, चुनावी जनादेश और उच्च शिक्षा के विस्तार को नजरअंदाज करता है। पिछले एक दशक में नए संस्थान, ऑनलाइन शिक्षा, अनुसंधान अनुदान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ा है। इन उपलब्धियों को रिपोर्ट लगभग नहीं छूती।

भारतीय विद्वानों का काम इन सूचकांकों की आलोचना करना भर नहीं है, बल्कि अब उन्हें अपने आंकड़े, अपने मामले और अपनी पद्धति से जवाब देना है।

परिसर स्वतंत्रता का अर्थ एक विचारधारा की एकाधिकार नहीं, बल्कि असहमति के साथ अनुशासन और तथ्य आधारित विमर्श है। जब तक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें चुनिंदा घटनाओं को पूरे देश का चरित्र मानती रहेंगी, भारतीयों का इन पर से उठा विश्वास और गहराता जाएगा। सही चिंता यह है कि हम अपनी संस्थाओं को मजबूत करें, न कि हर पश्चिमी रैंकिंग को बिना सवाल अपना लें।

Topics: foreign policyIndia rankingWestern Media BiasAcademic Freedom IndexScholars At Risk ReportFree To Think 2026Panchjanya news
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार 'अंशु'
आशीष कुमार अंशु पत्रकार, लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं। आम आदमी के सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों तथा भारत के दूरदराज में बसे नागरिकों की समस्याओं पर अंशु ने लम्बे समय तक लेखन व पत्रकारिता की है। अंशु मीडिया स्कैन ट्रस्ट के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं और दस वर्षों तक मानवीय विकास से जुड़े विषयों की पत्रिका सोपान STEP से जुड़े रहे हैं। [Read more]
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