समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव के हालिया बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुराने सवाल को फिर खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि यदि सपा 2027 में सत्ता में आती है तो जेल में बंद आजम खान को गृहमंत्री बनाया जाएगा और सम्भल हिंसा के अभियुक्तों के खिलाफ चल रहे मुकदमे वापस लिए जाएंगे।
यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सपा शासनकाल में गंभीर अपराधों और आतंकवाद के मामलों में मुकदमे वापस लेने के प्रयासों के आरोप पहले भी सामने आते रहे हैं। कई मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप के कारण ऐसे प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सके। पूर्व डीजीपी बृजलाल ने शिवपाल के बयान के संदर्भ में सपा सरकार की इसी कार्यशैली का उल्लेख किया है। उनका आरोप है कि उनके कार्यकाल में आतंकियों और अपराधियों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के प्रयास किए गए।
आतंकियों को बचाने की कोशिश
बृजलाल ने आतंकी खालिद मुजाहिद की 2013 में हुई मौत के बाद अपने, तत्कालीन डीजीपी और 42 पुलिसकर्मियों के खिलाफ तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के आदेश पर बाराबंकी में हत्या का एफआईआर दर्ज होने का उल्लेख किया। उनके अनुसार, उस समय अधिकारियों में यह संदेश गया था कि आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सतर्क रहें। खालिद, जो वाराणसी-फैजाबाद विस्फोट का आरोपी था, की 18 मई 2013 को फैजाबाद से लखनऊ लाते समय लू लगने से बाराबंकी में मौत हो गई थी।
यह प्रसंग केवल आजम खान या सम्भल तक सीमित नहीं है। असली सवाल है कि क्या राजनीति के लिए कानून अलग-अलग हो सकता है? क्या वोटबैंक साधने के लिए गंभीर मामलों में अभियोजन वापस लेने की घोषणा की जा सकती है? और क्या सत्ता में आने के बाद सरकार अपराध और राजनीति के बीच की रेखा मिटा सकती है?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में तुष्टीकरण का यह अध्याय नया नहीं है। नया केवल इतना है कि वर्षों बाद भी सपा नेताओं के बयानों में वही पुरानी प्राथमिकताएं दिख रही हैं। लोकतंत्र में सरकार बदल सकती है, लेकिन कानून का राज किसी दल की सुविधा से नहीं
बदल सकता।
आजम पर दर्ज मामले
शिवपाल यादव ने आजम के जिन मुकदमों को वापस लेने की बात कही है, उनकी प्रकृति बेहद गंभीर है। इनमें बकरी, भैंस और किताब चोरी से लेकर सरकारी जमीन पर कब्जे, शत्रु संपत्ति, जालसाजी और फर्जी दस्तावेजों तक के मामले शामिल हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव हलफनामे में आजम के खिलाफ 103 मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। इनमें सबसे चर्चित मामला अब्दुल्ला आजम के दो जन्म प्रमाणपत्रों का है। आरोप था कि अलग-अलग स्थानों से दो जन्म प्रमाणपत्र बनवाए गए और उनका अलग-अलग सरकारी कार्यों में इस्तेमाल किया गया। इस मामले में आजम खान, उनकी पत्नी तंजीम फातिमा और बेटे अब्दुल्ला आजम को अक्तूबर 2023 में रामपुर की अदालत ने दोषी ठहराया और सात साल की सजा सुनाई।
आजम ने जौहर विश्वविद्यालय के नाम पर वंचित समाज के तीन लोगों की जमीन की रजिस्ट्री करा दी थी। नियमानुसार, वंचित समाज की भूमि अगर कोई सामान्य जाति का व्यक्ति खरीदता है तो जिलाधिकारी की अनुमति आवश्यक है। इसके अलावा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 10 मई 2022 के आदेश में 13.842 हेक्टेयर (34.19 एकड़) भूमि को लेकर शत्रु संपत्ति संबंधी मामले का उल्लेख है। सार्वजनिक उपयोग की इस जमीन पर चारदीवारी बनाकर विश्वविद्यालय परिसर में शामिल कर लिया गया था, जिससे आवागमन बाधित हो गया था। बाद में उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय द्वारा जमानत की शर्त के रूप में भूमि का कब्जा लेने संबंधी निर्देश पर रोक लगा दी।
इसी मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने राजस्व अभिलेखों में उक्त भूमि को शत्रु संपत्ति के रूप में दर्ज किए जाने और उसके एक हिस्से के सीमा सुरक्षा बल को पट्टे पर दिए जाने का उल्लेख किया था। न्यायालय के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि विवादित भूमि विश्वविद्यालय से तीन ओर से घिरी हुई थी। इतना ही नहीं, सिंचाई विभाग ने रामपुर जिले को बाढ़ से बचाने के लिए कई करोड़ रुपये की छूट दी, मगर मंत्री के पद पर रहते हुए आजम खान ने इस बजट को जौहर विश्वविद्यालय के लिए खर्च करवा दिया। पर्यटन विभाग के बजट का दुरूपयोग करके विश्वविद्यालय परिसर के भीतर ही एक झील का निर्माण कराया गया।
आतंकियों पर मेहरबानी
31 दिसंबर 2007 की रात रामपुर में नए साल के जश्न के बीच लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकवादियों ने सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर पर हमला किया। इसमें एक नागरिक और सात सीआरपीएफ जवान मारे गए तथा कई घायल हुए थे। करीब 12 साल चली सुनवाई के बाद नवंबर 2019 में रामपुर की सत्र अदालत ने मोहम्मद शरीफ, सबाउद्दीन, इमरान शहजाद और मोहम्मद फारूक को मृत्युदंड सुनाया, जबकि जंग बहादुर खान को उम्रकैद और फहीम अंसारी को 10 वर्ष की सजा दी। इमरान और फारूक पाकिस्तानी नागरिक थे, जबकि सबाउद्दीन बिहार और शरीफ रामपुर का निवासी था।
2012 में जब सपा की सरकार बनी तो इन आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे मुकदमे को वापस लेने का प्रयास किया गया, लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी के बाद सरकार पीछे हट गई। 29 अक्तूबर 2025 को उच्च न्यायालय ने चारों मृत्युदंड और जंग बहादुर की उम्रकैद रद्द कर दी।
अदालत ने कहा कि जांच की खामियां मामले की जड़ तक पहुंचती हैं और अभियोजन मुख्य आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। पांचों आरोपियों को हत्या, साजिश, देश के खिलाफ युद्ध और यूएपीए सहित गंभीर धाराओं से बरी किया गया, लेकिन शस्त्र अधिनियम के तहत 10 वर्ष की सजा बरकरार रखी गई। फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2026 में सुनवाई स्वीकार की।
मुकदमे वापसी के वादे ने उठाए सवाल
प्रश्न यह नहीं कि आजम के खिलाफ कितने मुकदमे हैं। प्रश्न यह है कि क्या सत्ता में आने के बाद किसी राजनीतिक दल को गंभीर आपराधिक और शत्रु संपत्ति संबंधी आरोपों वाले मुकदमे राजनीतिक सुविधा के आधार पर वापस लेने का अधिकार मिल जाना चाहिए?
सिंचाई विभाग की जमीन, सरकारी संसाधनों और जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े विवादों ने आजम खान की राजनीति पर लंबे समय से गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 2019 में रामपुर प्रशासन ने जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े ‘हमसफर’ रिसॉर्ट की दीवार को सिंचाई विभाग की जमीन पर बने नाले पर अतिक्रमण बताते हुए ध्वस्त किया था। प्रशासन के अनुसार करीब एक किलोमीटर लंबे नाले पर कब्जे से जलनिकासी प्रभावित हो रही थी।
इसी तरह सपा सरकार के दौरान रामपुर में 40 लाख रुपये की लागत से बना ‘उर्दू गेट’ भी नियमों के उल्लंघन के कारण 2019 में प्रशासन की कार्रवाई का शिकार हुआ। निर्माण के लिए पीडब्ल्यूडी और रामपुर विकास प्राधिकरण की अनुमति नहीं ली गई थी और गेट की ऊंचाई इतनी कम थी कि भारी वाहन वहां से नहीं निकल सकते थे। शिकायतकर्ता भाजपा विधायक आकाश सक्सेना कहते हैं, ‘‘गेट की ऊंचाई इसलिए कम की गई थी ताकि पुलिस और पी.ए.सी के भारी वाहन जौहर विश्वविद्यालय में न जाने पाएं।’’ प्रशासन ने उसी कार्रवाई में जौहर विश्वविद्यालय परिसर के भीतर मौजूद पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस और बिजली उपकेंद्र पर भी कब्जा लिया था। आरोप था कि सरकारी परिसंपत्तियों को विश्वविद्यालय की सीमा में शामिल कर दिया गया था।
सम्भल हिंसा का सच
अब सम्भल हिंसा की बात। शिवपाल यादव ने जिस सम्भल हिंसा के अभियुक्तों के मुकदमे वापस लेने की बात कही, उसकी पृष्ठभूमि समझना जरूरी है। 19 नवंबर 2024 को चंदौसी की अदालत ने शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किया। याचिका में दावा किया गया था कि वर्तमान मस्जिद परिसर में पहले हरिहर मंदिर था। एडवोकेट कमिश्नर रमेश सिंह राघव ने 19 और 24 नवंबर को सर्वेक्षण किया और बाद में सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट अदालत में दाखिल की।
24 नवंबर को दूसरे चरण के सर्वेक्षण के दौरान हिंसा भड़क उठी, जिसमें चार लोग मारे गए और पुलिसकर्मियों सहित कई घायल हुए। हिंसक भीड़ ने सर्वेक्षण टीम और पुलिस को निशाना बनाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने निचली अदालत को आगे की कार्यवाही रोकने और सर्वेक्षण रिपोर्ट को सीलबंद रखने का निर्देश दिया।
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग ने 2026 में विधानसभा में पेश रिपोर्ट में रिपोर्ट अदालत में सम्भल हिंसा को पूर्व नियोजित बताया। आयोग के अनुसार यह अचानक भड़की भीड़ की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि अदालत के आदेश पर हो रहे सर्वेक्षण को बाधित करने के उद्देश्य से रची गई आपराधिक साजिश थी। रिपोर्ट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, सपा विधायक इकबाल महमूद के बेटे सोहेल इकबाल तथा जामा मस्जिद की इंतजामिया समिति से जुड़े कुछ लोगों के नाम षड्यंत्र में शामिल होने के संदर्भ में सामने आए हैं। यही नहीं, आयोग ने पुलिस पर लगे आरोपों की भी जांच की और कहा कि चारों मौतें पुलिस की गोलीबारी से नहीं हुईं।
मूल प्रश्न यह है कि जिस विवाद का समाधान न्यायालय में होना था, उसे सड़क पर हिंसा का रूप क्यों दिया गया? ऐसे में शिवपाल यादव का यह कहना कि सत्ता में आने पर संभल हिंसा के अभियुक्तों के मुकदमे वापस लिए जाएंगे, केवल राजनीतिक बयान नहीं है। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या सपा राजनीति में कानून से ऊपर वोटबैंक को रखने की पुरानी प्रवृत्ति अभी भी कायम है?
क्या अदालत के आदेश से शुरू हुई प्रक्रिया को हिंसा से रोकने वालों को सत्ता में आते ही राजनीतिक संरक्षण देने का वादा किया जा सकता है?
आजम खान के मामलों से लेकर सम्भल तक तस्वीर का सबसे चिंताजनक पहलू यही है, जहां कानून अपना रास्ता तय कर रहा हो, वहां राजनीति को हस्तक्षेप नहीं, न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान करना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार मुकदमे वापस लेने का राजनीतिक वादा कर सकती है, लेकिन न्याय का अधिकार न तो किसी नेता की जागीर है और न किसी वोटबैंक की संपत्ति।

















