‘ऐसे शुरू हुआ गुजरात में संघ कार्य’
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‘ऐसे शुरू हुआ गुजरात में संघ कार्य’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अत्यंत विश्वस्त परिंदु भगत (काकू भाई) प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ‘साबरमती संवाद’ के दौरान पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर से बातचीत

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Sep 21, 2026, 07:39 pm IST
inसाक्षात्कार, पाञ्चजन्य इवेंट
परिंदु भगत (काकू भाई) प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता ‘साबरमती संवाद’ के दौरान पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर से बातचीत

परिंदु भगत (काकू भाई) प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता ‘साबरमती संवाद’ के दौरान पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर से बातचीत

हमेशा पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अत्यंत विश्वस्त परिंदु भगत (काकू भाई) प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ‘साबरमती संवाद’ के दौरान पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर से बातचीत में उन्होंने पहली बार किसी सार्वजनिक मंच पर ऐसी कई बातें साझा कीं, जिनकी जानकारी आम कार्यकर्ता को नहीं थी। इसे महज एक वार्ता कहना उचित नहीं होगा, बल्कि यह एक ऐसी कहानी है, जिसमें संघ के प्रति उनके समर्पण, लगन और लंबे अनुभवों की झलक मिलती है। प्रस्तुत हैं उसके मुख्यांश

मेरे पिताजी कन्हैयालाल भगत, जो बच्चू भाई भगत के नाम से जाने जाते थे। जब गुजरात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य शुरू हुआ, तब मधुकर राव भागवत जी (वर्तमान सरसंघचालक जी के पिताजी) संघ कार्य के लिए गुजरात आए और हमारे अमदाबाद स्थित घर भी आते रहे। उन्होंने पिताजी को संघ से जोड़ा। उस समय अमदाबाद में संघ का काम प्रारंभिक अवस्था में था और संसाधन भी सीमित थे। माणेक चौक से साबरमती तक शाखा जाने के लिए लोग स्थानीय ट्रेन का उपयोग करते थे और कई बार लौटते समय पटरी के किनारे पैदल चलकर वापस आते थे। इन्हीं कठिन परिस्थितियों के बीच गुजरात में संघ का कार्य धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

नरेंद्र भाई से संपर्क

नरेंद्र भाई से मेरा संपर्क 1969 में हुआ, जब अमदाबाद में बड़ा दंगा हुआ और वे विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के कार्य के लिए आए। उन्हीं दिनों संघ अधिकारियों और कार्यकर्ताओं की एक बैठक में मैंने उन्हें पहली बार विस्तार से सुना। वे पहले भी पिताजी से मिलने घर आते थे, इसलिए उन्हें प्रचारक के रूप में जानता था। लेकिन उस बैठक में उनके व्यक्तित्व की एक नई छवि मेरे सामने आई-लोगों को प्रेरित करने और कठिन परिस्थितियों में काम करने की उनकी असाधारण क्षमता।

स्वाभाविक सादगी

संघ के विजयादशमी कार्यक्रमों में हम परिवार के साथ जाते थे। नरेंद्र भाई पूर्ण गणवेश में पीछे एक कोने में बैठ जाते थे। उनकी सादगी बहुत स्वाभाविक लगती थी। विहिप के शुरुआती सम्मेलन में सिद्धपुर में लगभग दो लाख रुपये (उस समय की बड़ी रकम) जुटाए गए थे। वकील साहब (लक्ष्मणराव इनामदार) ने वह राशि नरेंद्र भाई को सुरक्षित रखने के लिए दी। कार्यक्रम के बाद उन्होंने पूरा हिसाब देकर भुगतान कराया। यह उनकी जिम्मेदारी, संसाधनों के प्रति सावधानी और पारदर्शिता का प्रमाण था।

संसाधनों का सावधानी से उपयोग

वे संसाधनों का अत्यंत सावधानी से उपयोग करते थे। व्यवस्था प्रमुख या कोष की जिम्मेदारी होने पर पैसा अपने पास रखने के बजाय उसे कार्यालय में जमा कराने पर जोर देते थे। जब पार्टी के पास पर्याप्त वाहन नहीं होते थे, तो समर्थकों के वाहनों की सूची बनाकर जरूरत के अनुसार उनका उपयोग किया जाता था। यहां तक ध्यान रखा जाता था कि वाहन-मालिक स्वयं चालक न बने, ताकि व्यक्तिगत संबंध या पक्षपात की स्थिति न बने।

अरुण जी से परिचय

नरेंद्र भाई के माध्यम से अरुण जेटली से मेरा परिचय हुआ। वे गुजरात हाई कोर्ट में एक मामले के सिलसिले में आते थे। बाद में मेरे बेटे और अरुण जी की भांजी ने डीएआईसीटी में एक ही डिवीजन में पढ़ाई की, फिर हम समधी बने। यह संबंध संघ, जनसंघ या भाजपा की राजनीति से नहीं, बल्कि पारिवारिक था। अरुण जी विलक्षण वकील थे। उनकी कानूनी समझ बहुत गहरी थी और नरेंद्र भाई से उनकी अच्छी मित्रता थी।

2012 के गुजरात विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र भाई के हलफनामे में वैवाहिक स्थिति को लेकर कानूनी-राजनीतिक चर्चा हुई। अरुण जी का मानना था कि कोई तथ्य नहीं छिपाया जाना चाहिए। उपलब्ध कानूनी विकल्पों के अनुसार हलफनामे में आवश्यक जानकारी दी गई और जहां जानकारी अनुपलब्ध थी, उसे स्पष्ट किया गया। अरुण जी विभिन्न दलों के नेताओं से भी संवाद बनाए रखते थे। जीएसटी पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने के प्रयासों में वे विपक्ष के नेताओं से बातचीत करते थे। उनका मानना था कि बड़े नीतिगत मुद्दों पर संवाद और सहमति आवश्यक है। हमारे परिवार में यह संस्कार रहा कि संघ के सरसंघचालक से लेकर कार्यालय के कार्यकर्ता तक सभी समान हैं। घर के कार्यक्रमों में कार्यालय के सभी लोग भोजन के लिए आते थे।

मैंने केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की, फिर कानून की पढ़ाई की और आगे चलकर एलएलएम तथा पीएचडी भी की। यह यात्रा कुछ हद तक अप्रत्याशित रही। परिवार और संघ के वरिष्ठों के साथ रहने से लगातार सीखने का अवसर मिलता रहा।

कानून में रुचि

केमिकल इंजीनियरिंग के बाद कानून में रुचि बढ़ी। राजनीति और चुनाव कानून में विशेष रुचि हुई। मैंने एलएलएम किया और संविधान व चुनाव कानून पर ‘वन नेशन, वन इलेक्शन: ए क्रिटिकल लीगल स्टडी’ विषय पर पीएचडी की, जो 2024 में पूरी हुई। इसके बाद प्रयास रहा कि समाज और संस्थाओं से प्राप्त ज्ञान व अनुभव को शिक्षा के माध्यम से वापस समाज को दिया जाए। इसी क्रम में मैं विश्वविद्यालयों में संविधान और चुनाव कानून पढ़ाता हूं।

प्रशासन का मजबूत आधार

पिछले 25 वर्ष में गुजरात में विकास, पारदर्शिता और प्रशासन का एक मजबूत आधार तैयार हुआ, जिसका प्रभाव आगे की सरकारों और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी दिखाई देता है। ज्योतिग्राम योजना इसका उदाहरण है। गांवों में नियमित बिजली मिलने से केवल बिजली की समस्या ही नहीं सुलझी, बल्कि ग्रामीण जीवन और आर्थिक गतिविधियों पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा। जब गांव में बिजली, शिक्षा, उद्योग और अन्य सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, तो लोगों का शहरों की ओर पलायन कम होता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केवल कृषि तक सीमित रखने के बजाय मूल्यवर्धन पर ध्यान देना जरूरी है।

डेयरी इसका अच्छा उदाहरण है। सिर्फ दूध बेचने के बजाय मक्खन, चीज और अन्य मूल्यवर्धित उत्पाद बनाए जाएं तथा फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा दिया जाए, तो गांवों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी विकास की दिशा में कई काम हुए हैं। सड़क और कनेक्टिविटी में सुधार, जैसे अमदाबाद से भावनगर की यात्रा के समय में कमी, इसका प्रमाण है। ग्रामीण क्षेत्रों में डेयरी, फूड प्रोसेसिंग और मूल्यवर्धित उत्पादों को बढ़ावा दिया जा रहा है। औद्योगिक विकास के साथ टिकाऊ विकास पर भी ध्यान आवश्यक है।

सरल स्वभाव

मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल का स्वभाव सरल और सहज है। वे सामान्यतः शांत रहते हैं, लेकिन जब किसी विषय से लोगों को नुकसान होने की स्थिति आती है, तो गंभीरता से प्रतिक्रिया देते हैं। विकास के स्तर पर औद्योगिक विस्तार, सड़क-कनेक्टिविटी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मूल्यवर्धन जैसे क्षेत्रों पर काम हो रहा है।

सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि सीमित संसाधनों और छोटे स्तर से शुरू हुआ संगठनात्मक कार्य समय के साथ व्यापक सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में बदल गया। मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि संघ ने जो संस्कार दिए-समाज के प्रति जिम्मेदारी, संसाधनों का संयमित उपयोग, पारदर्शिता और समाज को वापस देने की भावना-वे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में काम आते रहे।

Topics: मधुकर राव भागवतविश्व हिंदू परिषदप्रचारक और गणवेशनरेंद्र मोदीसंसाधनों की पारदर्शितासाबरमती संवादचुनावी हलफनामा विवादमुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेलसंविधान और चुनाव कानूनजीएसटीवन नेशनपाञ्चजन्य विशेषवन इलेक्शनसंघ का विस्तारगुजरात विकासगुजरात का विकास मॉडलRSSपरिंदु भगत काकू भाईगुजरात में संघ कार्य
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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