2026 का भारत 1937 का भारत नहीं है। यह वह भारत है जिसने चंद्रयान भेजा, डिजिटल क्रांति की, दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह बनाई। लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों के मामले में कांग्रेस यदि 1937 के निर्णय को आज भी अपना राजनीतिक मानक मानती है, तो यह विचार करने की आवश्यकता है कि क्या उसकी राजनीति समय के साथ बदली है!
‘वंदे मातरम्’ की 150 वर्ष की यात्रा, स्वाधीनता-संग्राम में उसकी भूमिका और राष्ट्रचेतना के प्रतीक के रूप में उसके महत्व को समझने का अवसर मिलेगा। साथ ही, आतंकवाद के विरुद्ध भारत की निर्णायक नीति और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के माध्यम से बदले सुरक्षा दृष्टिकोण को भी विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
देश के भीतर राष्ट्रीय एकता के समक्ष खड़ी वैचारिक चुनौतियों और ‘दिमागी नक्सलवाद’ के जरिए सामाजिक विभाजन को गहरा करने के प्रयासों पर भी इस अंक में विचार किया गया है। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत की अमेरिका यात्रा और ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ के माध्यम से विश्व के समक्ष प्रस्तुत भारत की विश्वबंधुत्व की दृष्टि को भी समझा जा सकेगा।

नेपाल की विनाशकारी बाढ़ के बाद पूरा भारत उसके साथ किस प्रकार खड़ा है, चीन की रणनीतिक गतिविधियों और बदलते क्षेत्रीय समीकरणों तक-पड़ोसी देशों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न भी इस अंक की सामग्री का हिस्सा हैं। तिब्बत में चीनी दमन तथा तिब्बती भाषा और संस्कृति के समक्ष खड़ी चुनौतियों पर भी विस्तृत सामग्री पढ़ने को मिलेगी। इसके साथ ही चीन के उस कानून का भी विश्लेषण किया गया है, जो वहां के अल्पसंख्यकों को पूरी तरह चीनी संस्कृति में ढालने के लिए बनाया गया है।
‘वंदे मातरम्’ से शुरू होकर राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक एकता, विश्वबंधुत्व और हिमालयी क्षेत्र की चुनौतियों तक पाञ्चजन्य का यह विशेष आयोजन भारत की बदलती राष्ट्रीय चेतना और उसके समक्ष खड़ी चुनौतियों को समग्रता से समझने का अवसर प्रदान करता है-















