वंदे मातरम्! प्रश्न केवल गीत का नहीं, भारत की राष्ट्रीय दृष्टि का है
August 31, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

वंदे मातरम्! प्रश्न केवल गीत का नहीं, भारत की राष्ट्रीय दृष्टि का है

‘वंदे मातरम्’ की रचना से दो दशक पहले 1857 में ‘मादरे वतन जिंदाबाद’ का नारा लगाने वाले अजीमुल्ला खान, 1930 के दशक में इसकी अलख जगाने वाले मौलाना रेजाउल करीम, और अपनी पत्रिका ‘धूमकेतु’ में इसे शीर्ष स्थान देने वाले काजी नजरुल इस्लाम-ये सब मुसलमान थे और ‘वंदे मातरम्’ के प्रबल समर्थक।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Aug 31, 2026, 10:33 am IST
inभारत, सम्पादकीय
वन्दे मातरम् गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

वन्दे मातरम् गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

किसी राष्ट्र को केवल नक्शे से नहीं समझा जा सकता। नक्शा सीमाएं बताता है, राष्ट्र का मन नहीं। भारत का मन उस सभ्यता में बसता है जिसने धरती को माता, नदी को मां और मिट्टी को जननी माना। अथर्ववेद का ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ इसी अनुभूति की प्राचीन अभिव्यक्ति है। इसी दीर्घ सांस्कृतिक परंपरा को आधुनिक काल में ‘वंदे मातरम्’ ने स्वर दिया।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की यह रचना इसलिए अमर हुई कि यह पहले जनता के हृदय में प्रतिष्ठित हुई, बाद में संस्थाओं ने स्वीकार किया। ‘सुजलां सुफलां शस्यश्यामलां’ में खेत हैं, नदियां हैं, मातृभूमि है और उसके प्रति कृतज्ञता है। आगे इसी मातृभूमि को शक्ति, विद्या और समृद्धि के सांस्कृतिक प्रतीकों से जोड़ा गया।

1896 में रवींद्रनाथ ठाकुर ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे गाया। बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में यह ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध जनप्रतिरोध का स्वर बना। हिंदू और मुसलमान, दोनों स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे अपनाया। समस्या तब पैदा हुई, जब राष्ट्रीय अनुभव को सभ्यता की दृष्टि से समझने के बजाय उस पर सांप्रदायिक राजनीति की कसौटी रखी जाने लगी।

‘वंदे मातरम्’ की रचना से दो दशक पहले 1857 में ‘मादरे वतन जिंदाबाद’ का नारा लगाने वाले अजीमुल्ला खान, 1930 के दशक में इसकी अलख जगाने वाले मौलाना रेजाउल करीम, और अपनी पत्रिका ‘धूमकेतु’ में इसे शीर्ष स्थान देने वाले काजी नजरुल इस्लाम-ये सब मुसलमान थे और ‘वंदे मातरम्’ के प्रबल समर्थक। किंतु कांग्रेस ने इस देश को अंग्रेजों की भांति टुकड़े-टुकड़े करने वाली दृष्टि से देखा-ऐसी दृष्टि जिसमें व्यक्ति भारतीय नहीं, केवल एक शासन-योग्य इकाई या वोट भर था। यह गंभीर राजनीतिक विमर्श का प्रश्न है कि कांग्रेस को मुसलमानों के भीतर कभी राष्ट्रीय दृष्टि नहीं, केवल अलगाव का बीज ही दिखा।

नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने अपने हितों की पूर्ति के लिए अपने प्यादे ए. ओ. ह्यूम के माध्यम से कराई गई थी। ऐसे में ‘वंदे मातरम्’ को लेकर ‘बंकिमचंद्र का मुसलमानों पर कर्ज’ जैसा लेख लिखने वाले मौलाना रेजाउल करीम का कथन महत्वपूर्ण है कि अंग्रेजों ने ‘वंदे मातरम्’ विवाद को केवल इसलिए हवा दी ताकि मुसलमानों को आजादी की लड़ाई से दूर रखा जा सके।
दक्षिण अफ्रीका से गांधी ने 1905 में लिखा कि यह राष्ट्रीय गान जैसा स्थान प्राप्त कर चुका है और इसका उद्देश्य देशभक्ति जगाना है। अतः ‘वंदे मातरम्’ को आज किसी एक विचारधारा या दल की खोज बताना इतिहास के साथ अन्याय होगा। यह उस राष्ट्रीय आंदोलन की संपत्ति था जिसमें अनेक धाराएं थीं, किंतु सबको एक करने वाली मुख्य धारा थी मातृभूमि से प्रेम।

इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 1908 में मुस्लिम लीग के अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिक पुकार बताया। उनके वक्तव्य में उस राजनीतिक दृष्टि की झलक थी, जो भारतीय राष्ट्रवाद को साझा सभ्यतागत अनुभव मानने के बजाय हिंदू-मुस्लिम राजनीतिक पहचानों के अलग-अलग चश्मे से देखने लगी।

यहीं प्रश्न पैदा होता है-यदि किसी राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति की प्रत्येक अभिव्यक्ति को सांप्रदायिक पहचान के तराजू पर तौला जाएगा, तो साझा राष्ट्रीयता का निर्माण कैसे होगा? यही कांग्रेस की राजनीति का दुरूह प्रश्न है। सैयद अली इमाम की तर्ज पर ‘वंदे मातरम्’ को सांप्रदायिक पुकार मानने वाली कांग्रेस क्या कभी ‘खिलाफत आंदोलन’ को सांप्रदायिक आवाहन कहने का साहस कर सकेगी!
वास्तव में समस्या केवल मुस्लिम लीग के विरोध की नहीं थी। उससे अधिक निर्णायक था विरोध के सामने कांग्रेस नेतृत्व का बदलता व्यवहार। 1923 के काकिनाडा अधिवेशन में मौलाना मोहम्मद अली ने ‘वंदे मातरम्’ गायन पर आपत्ति की, पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने विरोध के बावजूद गीत गाया। 1937 आते-आते विवाद इतना तीखा हो चुका था कि कांग्रेस कार्यसमिति को औपचारिक निर्णय करना पड़ा।

1937 का निर्णय केवल नेहरू की व्यक्तिगत पसंद नहीं था। कांग्रेस कहती है कि उसका दो पदों वाला निर्णय आंदोलन की सहमति पर आधारित था। लेकिन इस तथ्य को स्वीकारने के बाद भी कांग्रेस से एक बड़ा प्रश्न पूछा ही जाना चाहिए।

1937 में भारत स्वतंत्र गणराज्य नहीं था। न संविधान था, न निर्वाचित संसद। कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन थी। तब किसी दल ने तत्कालीन परिस्थितियों और सांप्रदायिक दबाव को देखते हुए अपने आयोजनों के लिए निर्णय लिया था। वह निर्णय स्वतंत्र भारत पर शाश्वत आदेश कैसे हो सकता है? एक दल का प्रस्ताव राष्ट्र का संविधान नहीं होता। राजनीतिक दल अपने प्रस्ताव बदल सकते हैं। फिर 1937 की कांग्रेस कार्यसमिति को 2026 के भारत पर अदृश्य वीटो देने का आग्रह किस लोकतांत्रिक सिद्धांत से उचित ठहराया जा सकता है?

अगस्त 2026 में कांग्रेस कार्यसमिति ने फिर स्पष्ट किया कि पार्टी अपने कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो पद ही गाएगी और उसने इसके लिए 1937 के निर्णय का सहारा लिया। कांग्रेस को अपने पार्टी कार्यक्रम की पद्धति निर्धारित करने का अधिकार है। लेकिन जब वही पार्टी 1937 के अपने निर्णय को लगभग अंतिम राष्ट्रीय मर्यादा के रूप में प्रस्तुत करती है, तब प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि देश बड़ा है या एक दल।

यहीं वह तीखा राजनीतिक रूपक जन्म लेता है कि कांग्रेस ने पहले वंदे मातरम के टुकड़े किए और बाद में देश के टुकड़े हुए। इतिहास की गंभीरता यह मांग करती है कि इसे शाब्दिक कारण और परिणाम न बनाया जाए। भारत विभाजन के कारण कहीं अधिक जटिल थे-ब्रिटिश नीतियां, मुस्लिम लीग का द्विराष्ट्रवाद, सांप्रदायिक हिंसा, कांग्रेस-लीग के बीच असफल राजनीतिक समझौते और सत्ता हस्तांतरण की परिस्थितियां। किंतु एक राजनीतिक रूपक के रूप में यह वाक्य सत्य है, क्योंकि उस मानसिकता की आलोचना आवश्यक है जिसमें राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर कट्टर सांप्रदायिक दबाव को संतुष्ट करने के लिए बार-बार पीछे हटना समाधान माना गया।

इतिहास बताता है कि 1937 में पहले दो पद स्वीकार कर लेने के बाद विरोध समाप्त नहीं हुआ। मुस्लिम लीग के नेतृत्व ने संशोधित रूप को भी स्वीकार नहीं किया। मोहम्मद अली जिन्ना और लीग की राजनीति आगे चलकर वंदे मातरम से बहुत बड़े प्रश्न पर पहुंची-क्या भारत एक राष्ट्र है या दो राजनीतिक टकराहटों का निवास स्थान? इसलिए 1937 को केवल आस्था से जुड़ी संवेदनशीलता का सफल उदाहरण बताना अधूरा इतिहास है। समझौते के बाद सांप्रदायिक राजनीति शांत नहीं हुई, अधिक आक्रामक हुई। यह तथ्य आज की राजनीति के लिए भी शिक्षा है। तुष्टीकरण और संवाद एक ही चीज नहीं होते। संवाद में दोनों पक्ष राष्ट्रीय धरातल पर आगे बढ़ते हैं, तुष्टीकरण में राष्ट्रीय धरातल ही पीछे हटता जाता है।

स्वतंत्र भारत ने अंततः अपना निर्णय स्वयं किया। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान होगा और ‘वंदे मातरम्’ को उसके समान सम्मान और समान दर्जा प्राप्त होगा। यह अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु है। 1937 के बाद 1950 आया। पार्टी के निर्णय के बाद संविधान सभा की राष्ट्रीय व्यवस्था आई। देश अपनी एकता के सूत्र-वंदे मातरम् को भूला नहीं, सम्मानित किया।

2026 में इस यात्रा का नया अध्याय जुड़ा। गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय गीत के लिए पहली विस्तृत आधिकारिक व्यवस्था जारी की और सरकारी आयोजनों में सभी छह पदों वाले पूर्ण स्वरूप के गायन का प्रावधान किया। इसके बाद संसद ने राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम में संशोधन पारित किया। 6 अगस्त, 2026 को राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह कानून बना और अब जानबूझकर राष्ट्रगीत का गायन रोकना या बाधित करना भी उसी कानूनी संरक्षण के दायरे में आया जिसमें राष्ट्रगान पहले से था। कानून का अपराध गायन रोकना या बाधा उत्पन्न करना है। किसी राजनीतिक दल द्वारा अपने निजी कार्यक्रम में दो पद गाना अपने आप आपराधिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं बन जाता। लेकिन राष्ट्रीय नीति, आधिकारिक प्रोटोकॉल और 1937 की दलगत नीति के बीच वैचारिक टकराव निश्चित रूप से सामने आता है।

इसलिए प्रश्न संविधान के सम्मान का भी है। लोकतंत्र में संसद के बनाए कानून की आलोचना करना संविधान का अपमान नहीं है। सरकार की आलोचना करना असंवैधानिक नहीं है। चुनाव आयोग, राज्यपाल, जांच एजेंसियों या किसी अन्य संस्था के निर्णय पर प्रश्न उठाना भी नागरिक और राजनीतिक अधिकार है। संविधान स्वयं असहमति की जगह देता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संविधान को केवल राजनीतिक प्रतीक बना दिया जाए। हाथ में संविधान की छोटी प्रति हो, भाषण में संवैधानिक संस्थाओं की दुहाई हो, लेकिन जिस निर्णय से राजनीतिक सहमति न हो, उसे तुरंत अवैध, पक्षपाती या अस्वीकार्य घोषित किया जाए। संवैधानिकता का अर्थ संस्थाओं की पूजा नहीं, पर अपनी सुविधा के अनुसार उनकी वैधता तय करना भी संवैधानिकता नहीं है।

कांग्रेस ने हाल के वर्षों में संविधान को अपनी राजनीति का प्रमुख प्रतीक बनाया है। यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु तब उससे मानक भी ऊंचा अपेक्षित होगा। उसे यह बताना होगा कि 1937 की एक पार्टी कार्यसमिति का निर्णय 1950 की संविधान सभा की राष्ट्रीय भावना और 2026 की वर्तमान वैधानिक व्यवस्था से ऊपर कैसे हो सकता है? यदि उसका तर्क केवल इतना है कि वह अपने कार्यक्रम में दो पद ही गाएगी, तो वह दलगत निर्णय है। लेकिन यदि तर्क यह हो कि पूरा ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय रूप से स्वीकार्य ही नहीं होना चाहिए, तो बहस का स्वरूप बदल जाता है।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पूरे देश को एकजुट करने में वंदे मातरम् गीत के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता

यहां महात्मा गांधी का प्रसंग और अधिक रोचक है। गांधी ने वंदे ‘मातरम्’ में देशभक्ति की प्रेरणा देखी। उन्होंने रामराज्य कहा, लेकिन उसका अर्थ किसी धार्मिक राज्य से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण नैतिक शासन से जोड़ा। उन्होंने भारतीय भाषाओं और हिंदुस्तानी के प्रश्न को राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ा। गोसेवा उनके लिए हिंदू धर्म की गहरी आस्था थी, लेकिन उन्होंने दूसरे समुदाय पर बल प्रयोग का विरोध किया। गांधी को समझना हो तो पूरा गांधी पढ़ना होगा। समस्या तब होती है जब राजनीतिक दल गांधी के विचारों में से केवल सुविधाजनक अंश चुनते हैं।

इसीलिए कांग्रेस के सामने कठोर प्रश्न है-क्या गांधी उसके लिए विचार हैं या केवल राजनीतिक पूंजी? ‘वंदे मातरम’ पर वह गांधी की बाद की सावधानी याद करती है तो 1905 में उसी गीत के प्रति गांधी की गहरी प्रशंसा भी याद करनी चाहिए। किसी महापुरुष की तस्वीर कार्यालय में टांग देना आसान है, उसके विचारों की संपूर्णता स्वीकार करना कठिन।

कहीं कांग्रेस को जीवित विचार वाले गांधी से अधिक नोटों पर छपे गांधी तो प्रिय नहीं। यह वाक्य केवल कटाक्ष बनकर न रह जाए, इसलिए आशय समझना चाहिए। महापुरुष राजनीतिक मुद्रा नहीं होते। उन्हें जरूरत के अनुसार भुनाया नहीं जा सकता। यदि गांधी कांग्रेस की विरासत हैं तो उनके विचार प्रश्न भी पूछेंगे-‘वंदे मातरम्’ पर भी, स्वदेशी पर भी, सत्ता की नैतिकता पर भी और भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर भी।

आज ‘वंदे मातरम्’ के डेढ़ सौ वर्ष पूरे होने का अवसर इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह केवल पुराने विवाद को दोहराने का समय नहीं है। भारत ने 2025-26 में देशव्यापी कार्यक्रम आरंभ किए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, स्थानीय निकायों, सांस्कृतिक संस्थाओं, सुरक्षा बलों और नागरिक संगठनों को इससे जोड़ा गया। अगस्त 2026 में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले में पहली बार पूरे छह पदों का ‘वंदे मातरम्’ गाया गया। देश भर के 343 प्रमुख स्थानों पर सैन्य और सुरक्षा बलों के बैंड कार्यक्रम हुए। यह केवल सरकार का आयोजन नहीं, राष्ट्रीय स्मृति को नई पीढ़ी तक ले जाने का प्रयास भी था।

इस परिवर्तन के प्रतीक दिल्ली तक सीमित नहीं हैं। श्रीनगर में विद्यार्थियों के साथ कार्यक्रम हुए। अगस्त 2026 में लाल चौक पर सीआरपीएफ और स्कूली छात्रों की तिरंगा यात्रा निकली। वही लाल चौक जहां 1992 की एकता यात्रा के समय तिरंगा फहराना सुरक्षा और आतंकवाद की चुनौती से जुड़ा राष्ट्रीय प्रसंग बन गया था और जिसकी व्यवस्था में नरेंद्र मोदी सक्रिय भूमिका में थे। आज वहां स्कूली बच्चे तिरंगे के साथ निकलते हैं तो यह दृश्य राजनीति से बड़ा प्रतीक बन जाता है। इतिहास का पहिया किस दिशा में घूम सकता है, इसे समझने के लिए कभी-कभी एक तस्वीर ही पर्याप्त होती है।

अरुणाचल प्रदेश के विद्यालयों में ‘वंदे मातरम्’ के डेढ़ सौ वर्ष मनाए गए। लद्दाख के चुशूल में रेजांग ला युद्ध स्मारक पर विद्यार्थियों और नागरिकों ने इसका सामूहिक गायन किया। जम्मू-कश्मीर के शिक्षण संस्थानों में कार्यक्रम हुए। जिन सीमांत और दूरस्थ क्षेत्रों को दिल्ली की राष्ट्रीय बहस में कभी केवल सुरक्षा समस्या या अलगाव की दृष्टि से देखा जाता था, वहां जब विद्यार्थी राष्ट्रीय गीत के इतिहास पर निबंध लिखते हैं और उसे गाते हैं तो राष्ट्र केवल नक्शे पर नहीं, अनुभव में जुड़ता है।

यही ‘वंदे मातरम्’ का वास्तविक अर्थ है। यह किसी मुसलमान के विरुद्ध गीत नहीं, किसी हिंदू राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं, कांग्रेस की जागीर नहीं और भाजपा या किसी भी दल की निजी धरोहर भी नहीं। इसकी जड़ उस भारत में है, जिसमें भूमि को माता माना गया और राष्ट्र को केवल शासन तंत्र नहीं। इसे सांप्रदायिक हथियार बनाना भी गलत होगा और सांप्रदायिक दबाव के कारण इससे संकोच करना भी।

भारत को अपनी विविधता बचानी है तो उसे अपनी सांस्कृतिक स्मृति से भागना नहीं, उसका व्यापक अर्थ समझाना होगा। मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता का भाव भारत में घोर विरोधियों के बीच साझा धरातल बन सकता है। राष्ट्रभाव की भारतीय कल्पना की सफलता का सूत्र ही यह है कि वह पूजा पद्धति की समानता नहीं मांगती, पर मातृभूमि के प्रति निष्ठा की समानता अवश्य चाहती है।

कांग्रेस के लिए भी इस पूरे विवाद में अवसर है। वह चाहे तो 1937 की अपनी भूमिका को ऐतिहासिक परिस्थिति के संदर्भ में समझाकर आज के भारत के साथ नया संवाद आरंभ कर सकती है। या फिर वह 1937 के प्रस्ताव को राजनीतिक शास्त्र का अपरिवर्तनीय वचन बनाकर बैठी रह सकती है। पहला रास्ता राष्ट्रीय दल का है, दूसरा रास्ता अतीत की दलगत खाई में रहने का।

भारत 1937 में नहीं जी रहा। वह विभाजन से गुजर चुका है, संविधान बना चुका है, युद्ध देख चुका है, आतंकवाद से लड़ा है, कश्मीर में कठिन दशक देख चुका है, पूर्वोत्तर में उग्रवाद और शांति प्रक्रियाओं के अनेक चरण देख चुका है, चंद्रमा पर अपना यान उतार चुका है और डिजिटल युग में प्रवेश कर चुका है। ऐसे भारत से यह कहना कि वह अपनी राष्ट्रीय स्मृति का अर्थ आज भी औपनिवेशिक काल की सांप्रदायिक सौदेबाजी से तय करे, इतिहास को वर्तमान पर शासन करने देना होगा। किसी की आस्था, स्वतंत्रता का सम्मान और राष्ट्र की सांस्कृतिक स्मृति का सम्मान परस्पर विरोधी नहीं हैं। राजनीति का काम इनके बीच पुल बनाना है, स्थायी खाई बनाना नहीं।

डेढ़ सौ वर्ष बाद ‘वंदे मातरम्’ फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। यह संयोग नहीं, भारत में चल रहे गहरे सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत है। एक भारत ऐसा है जो अपनी आधुनिकता को अपनी स्मृति मिटाकर नहीं बनाना चाहता। वह विज्ञान चाहता है और संस्कृति भी, विकास चाहता है और विरासत भी, संविधान चाहता है और सभ्यता का आत्मबोध भी, तिरंगा चाहता है और उस धरती के प्रति कृतज्ञता भी जिस पर तिरंगा फहरता है।

‘वंदे मातरम्’ का मान किसी सरकार के आने से पैदा नहीं हुआ। सरकारें केवल उस मान को संस्थागत स्वर दे सकती हैं जो जन के मन में पहले से जीवित है। वर्तमान शासन ने उसके डेढ़ सौ वर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर मनाकर, पूर्ण आधिकारिक स्वरूप निर्धारित कर और उसे कानूनी संरक्षण देकर उस स्मृति को एक नया सार्वजनिक स्थान दिया है। इस पर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह तथ्य अब इतिहास का हिस्सा है।

अंततः विवाद कांग्रेस और भाजपा का नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि भारत अपने राष्ट्रीय प्रतीकों को किस दृष्टि से देखेगा? क्या हर प्रतीक को वोट बैंक की गणना में बांटा जाएगा? क्या हर सांस्कृतिक स्मृति से पहले पूछा जाएगा कि उससे कौन नाराज होगा? या फिर राष्ट्र इतना आत्मविश्वासी होगा कि अपनी विरासत का सम्मान करते हुए हर नागरिक की आस्था और स्वतंत्रता की भी रक्षा कर सके? राजनीतिक दल आएंगे और जाएंगे। प्रस्ताव बनेंगे और बदलेंगे। सत्ता बदलेगी। पीढ़ियां बदलेंगी। किंतु यदि भारत अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञ होना भूल जाएगा तो उसकी सांस्कृतिक पहचान कहां रहेगी?

इसलिए ‘वंदे मातरम्’ को केवल गाना पर्याप्त नहीं है। उसे समझना होगा। उसे बांटना नहीं, जीना होगा। उसकी मातृभूमि के जल को बचाना होगा, जंगल को बचाना होगा, सीमा को सुरक्षित रखना होगा, समाज को जोड़ना होगा और आने वाली पीढ़ी को ऐसा भारत देना होगा जिस पर वह गर्व से कह सके कि यह भूमि केवल हमारा निवास नहीं, हमारी उत्तरदायित्वपूर्ण विरासत है।
वंदे मातरम्!

X@hiteshshankar

Topics: वंदे मातरम्लाल चौक तिरंगा यात्रासंविधान सभापाञ्चजन्य संपादकीयपाञ्चजन्य विशेषबंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायसांस्कृतिक राष्ट्रवादभारत की राष्ट्रीय दृष्टिकांग्रेशनल राजनीतिऑपरेशन सिंदूर एवं राष्ट्रीय सुरक्षामुस्लिम स्वतंत्रता सेनानीसांप्रदायिक राजनीति और तुष्टीकरणहितेश शंकर2026 राष्ट्रीय गीत
हितेश शंकर
हितेश शंकर
हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

वंदे मातरम्’ की 150 वर्ष की यात्रा पर पाञ्चजन्य पत्रिका का विशेष आयोजन

दुनिया को विविधता में एकता का संदेश देना ही भारत की नियति : न्यूयॉर्क में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत

बाढ़ से बर्बाद हुआ एक शहर

नेपाल के साथ खड़ा हुआ भारत

श्री मोहन भागवत, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्र सिर्फ भौगोलिक टुकड़े नहीं : डॉ. भागवत ने स्वामी विवेकानंद को याद कर बताया भारत का असली फर्ज

स्त्री अस्मिता की भारतीय दृष्टि

न्यूयॉर्क में सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का स्वागत करते भारतीय समुदाय के लोग

‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ : संवाद और सवाल!

Load More

ताज़ा समाचार

वन्दे मातरम् गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय

वंदे मातरम्! प्रश्न केवल गीत का नहीं, भारत की राष्ट्रीय दृष्टि का है

प्रतीकात्मक तस्वीर

क्या आतंकी संगठन ISIS ने भारतीय युवाओं के लिए बदल दिया है तरीका? अब ऑनलाइन पर जोर?

किरेन रिजिजू, संसदीय कार्य मंत्री

तिरंगे के अपमान पर भड़के किरेन रिजिजू, खालिस्तानी समर्थकों को दी कड़ी चेतावनी- ‘महंगा पड़ेगा देश का अपमान’

देहरादून: घंटाघर के पास नकाबपोशों ने मजार तोड़ी, CCTV में कैद हुई वारदात; मुस्लिम संगठनों में आक्रोश

फोटो साभार: ऑर्गनाइजर

‘अगर हिंदू जागेगा तो दुनिया जागेगी’ – टोरंटो में सरसंघचालक मोहन भागवत का शक्तिशाली संदेश

अमित शाह, केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री

NSSC-2026 : भारत की आंतरिक सुरक्षा रणनीति में आमूलचूल बदलाव

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट में आज राजनीतिक दलों के गुमनाम नकद चंदे पर सुनवाई, आयकर अधिनियम की धारा 13ए को चुनौती

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की बिश्केक में आज द्विपक्षीय बैठक, इन मुद्दों पर रहेगा फोकस

नेपाल बाढ़: जलविद्युत परियोजनाओं में 900 से ज्यादा मजदूर लापता, त्रिशूली-3ए में बचाव तेज

होर्मुज जलडमरूमध्य बंद, अमेरिका ने लारक द्वीप पर किया हमला; ईरान ने जॉर्डन में जवाबी हमला किया

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies