21वीं शताब्दी में भारतीय खेल जगत जब भी भारोत्तोलन में किसी की राह तकता रहा, तो वो नाम है मणिपुर की मीराबाई चानू। पिछली सदी के अंतिम दशक में सिडनी ओलंपिक की पदक विजेता कर्णम मल्लेश्वरी और विश्व चैंपियनशिप व एशियाई खेलों की पदक विजेता कुंजरानी देवी का जलवा रहा। अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में इन दोनों ने देश का नाम खूब रोशन किया। लेकिन उनके बाद देश एक अदद अंतरराष्ट्रीय स्तर के भारोत्तोलक के लिए तरसता रहा। लेकिन मणिपुर राज्य के नोंगपोक काकचिंग गांव में वर्ष 1994 में मीराबाई सूर्य की एक नयी किरण बनकर पैदा हुई। फिर 2014 ग्लासगो राष्ट्रकुल खेलों में रजत पदक जीतने के बाद मीराबाई जो सुर्खियों में आयीं, जापान में 2026 एशियाई खेलों में रजत पदक जीत चमक बिखेरने का सिलसिला आज भी जारी रखा है।
भार उठाने की जिद
मीराबाई एक बेहद साधारण मैतेई परिवार से हैं। शुरुआती दौर में गांव में उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन एक 10-11 साल की बच्ची में कुछ विशेष करने का जज्बा शुरू से ही था। साथी खिलाड़ियों का रुझान तीरंदाजी में था इसलिए मीराबाई भी उसी खेल में रम गयीं। लेकिन उसी दौरान मीराबाई को पता चला कि मणिपुर राज्य की ही कुंजरानी देवी सिर्फ वजन उठाकर दुनिया भर में देश का परचम लहरा रही हैं तो उन्होंने भी भारोत्तोलन को ही अपनाने की जिद ठान ली। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। उनके माता-पिता ने भी सोचा कि इस खेल में ज्यादा पैसे नहीं लगते हैं तो भारोत्तोलन सीखने में कोई हर्ज नहीं है। इस बीच, उनके अभिभावकों को आभास हो चुका था कि उनकी बिटिया में वजन उठाने का जुनून ही नहीं, अद्भुत प्रतिभा भी है। दरअसल, इस धारणा के पीछ एक रोचक कहानी है – घर की रसोई के जलावन के लिए मीराबाई और उससे चार साल बड़े भाई को अक्सर पहाड़ी जंगलों से लकड़ी लानी पड़ती थी। इस दौरान, कुछ भाई की कमजोरी कहें या फिर मीराबाई का अति उत्साह – नन्हीं बिटिया मीराबाई लकड़ी का भारी बोझ लेकर तेजी से दौड़ती हुई घर पहुंच जाती थी। मीराबाई की यही काबिलियत उनके लिए एक नयी राह खोल गयी जो आज उन्हें भारतीय भारोत्तोलन जगत की सबसे चर्चित, सबसे सफल और शिखर पर पहुंचाने में सफल रही।
हर सपना हुआ पूरा
एक खिलाड़ी के जीवन का सपना होता है – विश्व स्तर पर भारतीय परचम लहराना। मीराबाई ने 2014 ग्लासगो राष्ट्रकुल खेलों में जो रजत पदक जीता उसके बाद विश्व स्तर पर कोई तो ऐसी स्पर्धा नहीं छोड़ी, जहां विजेताओं की सूची में उनका नाम न हो। वह आज जीत की जिजीविषा और पूर्ण समर्पण के बल पर ओलंपिक खेलों (2020 टोक्यो) में रजत पदक जीतने वाली देश की पहली और एकमात्र भारोत्तोलक हैं। अब तक चार बार राष्ट्रकुल खेलों में भाग लेते हुए तीन स्वर्ण व एक रजत पदक जीतने वाली देश की एकमात्र भारोत्तोलक हैं। उत्कृष्ट प्रतिभा का परिचय देते हुए न केवल विश्व कीर्तिमान बनाया, बल्कि कई बार की विश्व चैंपियनशिप के स्वर्ण सहित कई पदक भी जीते। हालांकि इस दौरान उन्हें अनुभवहीनता व चोटों की वजह से कई बार भारी असफलताएं भी झेलनी पड़ीं और वह भारोत्तोलन खेल को त्याग देने की भी सोचने लगीं। लेकिन मीराबाई के प्रशिक्षक विजय शर्मा और भारत सरकार के प्रोत्साहन की बदौलत वह इस खेल को जारी रखने को सहमत हुईं। इस बीच, एकमात्र एशियाई खेलों का एक मंच था जहां मीराबाई को अब तक कोई पदक नहीं मिला था। बुधवार को जापान में उनका यह अंतिम सपना भी पूरा हो गया। मीराबाई शान के साथ भारतीय भारोत्तोलन के शिखर पर विराजमान हैं। हर सपना पूरा होने के बावजूद मीराबाई 2028 लास एंजिल्स ओलंपिक खेलों में भी भारतीय तिरंगा लहराती दिखीं तो कोई हैरत की बात नहीं होगी।













