श्लोक-
स्वमङ्गलसमाशंसी यः स्वराष्ट्रमुपेक्षते।
स बुभुक्षानिवृत्यर्थं विषमेवात्ति केवलम्।।
भावार्थ-
“जो व्यक्ति केवल अपने मंगल (कल्याण) की कामना करता है, लेकिन अपने राष्ट्र की उपेक्षा करता है; वह मानो अपनी भूख मिटाने के लिए भोजन के स्थान पर केवल विष ही खा रहा है।”
वर्तमान में श्लोक की प्रासंगिकता-
यह श्लोक आज के आधुनिक और वैश्विक समाज में अत्यधिक प्रासंगिक है। यह व्यक्तिगत स्वार्थ और राष्ट्रीय कर्तव्य के बीच के संबंध को रेखांकित करता है: कोई भी व्यक्ति समाज या राष्ट्र से अलग होकर स्थायी रूप से सुखी या सुरक्षित नहीं रह सकता। यदि राष्ट्र संकट में है, असुरक्षित है या उसका सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है, तो व्यक्ति का व्यक्तिगत विकास और सुख भी अधिक समय तक टिक नहीं सकता।
नागरिक कर्तव्यों का बोध: आजकल लोग अपने अधिकारों (Rights) के प्रति तो सचेत रहते हैं, लेकिन कर्तव्यों (Duties) की उपेक्षा कर देते हैं। यह श्लोक स्मरण कराता है कि केवल अपने व्यक्तिगत लाभ (कर चोरी करना, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, कानून तोड़ना) की सोचना अंततः पूरे देश के साथ-साथ स्वयं के लिए भी आत्मघाती (विष के समान) सिद्ध होता है।
राष्ट्र-निर्माण में भागीदारी: यह श्लोक संदेश देता है कि राष्ट्र की प्रगति और सुरक्षा में ही व्यक्ति की अपनी प्रगति निहित है। जब राष्ट्र समृद्ध और सशक्त होगा, तभी नागरिक सुरक्षित और संपन्न रह सकेंगे।

















