केंद्र सरकार ने 1 अक्टूबर को ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC) के तीसरे फेज को मंजूरी दी है। इसकी कुल लागत करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये है। इसका मकसद 135 गीगावॉट तक अक्षय ऊर्जा (सोलर और विंड) को पावर ग्रिड तक पहुंचाना है। इसे एवैक्यूएशन कहते हैं, यानी जहां बिजली बनती है वहां से उपभोक्ताओं तक पहुंचाना।
भारत में अक्षय ऊर्जा की क्षमता तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उसे सही समय और जगह पर ग्रिड में समाहित करने की चुनौती भी बढ़ रही है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर क्या है?
यह सरकार का एक बड़ा कार्यक्रम है। इसमें सोलर और विंड जैसी अक्षय ऊर्जा को राष्ट्रीय पावर ग्रिड से जोड़ने के लिए खास ट्रांसमिशन लाइनें बनाई जाती हैं। पहली बार इसमें बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) भी शामिल किया गया है। योजना में 50 गीगावॉट-आवर (GWh) की बैटरी स्टोरेज लगाने का प्रावधान है। बैटरी स्टोरेज वह सिस्टम है जो ज्यादा बिजली बनने पर उसे स्टोर कर लेता है और जब जरूरत हो तब छोड़ देता है। GWh ऊर्जा मापने की इकाई है।
इस योजना की कुल राशि में से 1.36 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (राज्यों के अंदर की लाइनें) के लिए है। 50,000 करोड़ रुपये बैटरी स्टोरेज के लिए रखे गए हैं। केंद्र की ओर से कुल 54,082 करोड़ रुपये का वित्तीय समर्थन मिलेगा। इससे राज्यों के ट्रांसमिशन चार्ज कम रखने और बिजली की कीमत नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी।
नए प्रोजेक्ट्स टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग (TBCB) से होंगे, जिसमें प्राइवेट कंपनियां प्रतिस्पर्धा करके काम करेंगी। पुराने नेटवर्क को मजबूत करने का काम कॉस्ट-प्लस बेसिस पर होगा। राज्य ट्रांसमिशन यूटिलिटीज इसे लागू करेंगी। योजना का लक्ष्य वित्त वर्ष 2032-33 तक पूरा करना है।
इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सचिव संतोष कुमार सारंगी ने बताया कि 2030 से 2035-36 के बीच भारत करीब 400 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता जोड़ने वाला है। इसके लिए करीब 160 गीगावॉट अतिरिक्त इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए। इसमें से GEC-III करीब 135 गीगावॉट का समर्थन करेगा।
अभी तक अक्षय ऊर्जा ज्यादातर पांच राज्यों में केंद्रित है। इस योजना से इसे और राज्यों में फैलाने में मदद मिलेगी। अभी तक कम से कम 13 राज्यों से प्रस्ताव आए हैं। पहले फेज आठ राज्यों में और दूसरे फेज सात राज्यों में लागू हुआ था। नए ग्रीनफील्ड प्रोजेक्ट्स अब प्राइवेट कंपनियों के लिए भी खुले रहेंगे। इससे प्राइवेट पूंजी आएगी और प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
चुनौतियां क्या हैं?
GEC के पहले दो फेज में ट्रांसमिशन लाइनें बढ़ाने का काम चल रहा है, लेकिन देरी हो रही है। पहला फेज मार्च 2027 तक और दूसरा 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है। तीसरे फेज और दूसरे फेज की निगरानी के लिए कैबिनेट सचिव स्तर की कमेटी साल में दो बार समीक्षा करेगी।
ट्रांसमिशन की कमी अक्षय ऊर्जा निकालने में बड़ी रुकावट है। वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 6,900 गीगावॉट-आवर स्वच्छ बिजली पर प्रतिबंध लगा क्योंकि ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर उतनी तेजी से नहीं बना जितनी तेजी से अक्षय ऊर्जा क्षमता बढ़ी।
दिन के समय जब सोलर बिजली चरम पर होती है तब ग्रिड उसे पूरी तरह समाहित नहीं कर पाता। ऐसे में कर्टेल्मेंट होता है, यानी प्लांट्स को बिजली कम बनाने या बंद करने को कहा जाता है। इसकी मुख्य वजह स्टोरेज की कमी है।
भारत में अभी बैटरी स्टोरेज क्षमता करीब 2.9 गीगावॉट और पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज करीब 7.2 गीगावॉट है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के अनुमान के अनुसार 2035-36 तक कुल एनर्जी स्टोरेज क्षमता 174 गीगावॉट या 888 गीगावॉट-आवर तक पहुंच सकती है। इसमें बैटरी 80 गीगावॉट (321 गीगावॉट-आवर) और पंप्ड हाइड्रो 94 गीगावॉट (567 गीगावॉट-आवर) का हिस्सा होगा।















