सुखदुःखे समे कृत्वा समौ जयपराजयौ।
संघयोगे प्रवर्तेत स्वराष्ट्रोत्कर्षकांक्षया।।
भावार्थ :
सुख और दुःख में सम होकर, जय और पराजय में भी सम व्यवहार करके, अपने ‘राष्ट्र’ के उत्कर्ष की आकांक्षावाले संघयोग (टीम वर्क और संगठन) में प्रवृत्त होवें।
आज के संदर्भ में प्रासंगिकता
समत्व की भावना : व्यक्तिगत जीवन में सफलता (जय) या असफलता (पराजय) और अनुकूलता (सुख) या प्रतिकूलता (दुःख) आने पर विचलित हुए बिना एकसमान (स्थिरचित्त) रहना सिखाता है।
सामूहिक शक्ति और संगठन : आज की जटिल दुनिया में अकेला व्यक्ति बड़ा परिवर्तन नहीं ला सकता। किसी भी राष्ट्रीय या सामाजिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ‘संघयोग’ (टीम वर्क और संगठन) अनिवार्य है।
राष्ट्र-प्रथम का भाव : व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, निजी लाभ-हानि और अहंकार को पीछे छोड़कर समाज और देश के उत्थान (स्वराष्ट्रोत्कर्ष) के लिए मिलकर काम करने की प्रेरणा देता है।

















