स्मार्टफोन, शास्त्र और संवाद: दिशाहीन विरोध प्रदर्शनों के बीच क्या सोच रहा आज का भारतीय युवा? पढ़ें विशेष विश्लेषण
October 22, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Copy
    • Subscribe & Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Copy
    • Subscribe & Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम भारत

स्मार्टफोन, शास्त्र और संवाद: दिशाहीन विरोध प्रदर्शनों के बीच क्या सोच रहा आज का भारतीय युवा? पढ़ें विशेष विश्लेषण

Smartphone and Indian Youth: डिजिटल युग में विरोध प्रदर्शनों से लेकर शास्त्रों और संवाद तक, कैसा है आज के भारतीय युवा का चिंतन? पढ़ें स्वामी विशालानन्द का विश्लेषण।

Written byस्वामी विशालानन्दस्वामी विशालानन्द — edited by Shivam Dixit
Oct 1, 2026, 10:00 pm IST
inभारत, मत अभिमत
Smartphone Shastra and Gen Z Indian Youth Analysis Swami Vishalanand Panchjanya

आजकल भारत में एक शब्द बहुत तेजी से हमारी बातचीत का हिस्सा बन गया है, जेन ज़ी। दिल्ली की सड़कों से लेकर विश्वविद्यालयों के परिसरों तक जब भी युवा विरोध प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं, तुरंत एक सामान्य-सा निष्कर्ष सामने आता है कि यह जेन ज़ी  की आवाज है। हाल के महीनों में दिल्ली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से जुड़े प्रदर्शनों को भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने जेन ज़ी आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया। इन प्रदर्शनों का संबंध परीक्षा-पत्र लीक, परीक्षाओं में अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों से था।

लेकिन ठहरकर पूछने की आवश्यकता है कि आखिर जेन ज़ी है कौन? क्या भारत जैसे लगभग डेढ़ अरब लोगों वाले देश में कुछ सौ युवाओं का कोई प्रदर्शन पूरी एक पीढ़ी की आवाज हो सकता है? क्या सामाजिक माध्यमों पर दिखाई देने वाली कुछ आक्रामक तस्वीरें, नारे या वीडियो पूरी पीढ़ी का चरित्र तय कर सकते हैं? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत की युवा पीढ़ी को ऐसे नाम और खांचों में समझना उचित है, जो मूलतः हमारी अपनी सभ्यता और सामाजिक संरचना से निकले ही नहीं हैं?

जेन ज़ी नाम आया कहाँ से?

‘जेनरेशन एक्स’, ‘जेनरेशन वाई’ और ‘जेनरेशन ज़ी’ जैसे नाम भारतीय सभ्यता, भारतीय समाजशास्त्र या हमारी पारंपरिक ज्ञान-व्यवस्था से निकले हुए शब्द नहीं हैं। ये आधुनिक पश्चिमी समाज में विकसित हुए पीढ़ीगत वर्गीकरण हैं, जिनका उपयोग बाद में जनसांख्यिकी, मीडिया और बाजार की भाषा में व्यापक रूप से होने लगा। इनके पीछे किसी एक व्यक्ति द्वारा किया गया कोई एकमात्र नामकरण नहीं है, बल्कि अलग-अलग शोधकर्ताओं, लेखकों और संस्थानों के माध्यम से ये शब्द लोकप्रिय हुए।

इसके बाद आने वाली पीढ़ी के लिए ‘जेनरेशन अल्फा’ नाम को लोकप्रिय बनाने वाले ऑस्ट्रेलियाई सामाजिक शोधकर्ता मार्क मैक्रिंडल स्वयं बताते हैं कि वर्ष 2009 में उन्होंने अगली पीढ़ी के नाम को लेकर लोगों के बीच सर्वेक्षण कराया था। ‘जेनरेशन अल्फा’ नाम इसलिए चुना गया क्योंकि ‘जेड’ के बाद फिर से वर्णमाला के आरंभ पर लौटने के बजाय यूनानी वर्णमाला से एक नई शुरुआत का विचार उन्हें उपयुक्त लगा।

अर्थात जेन ज़ी , जेनरेशन अल्फा और अब जेनरेशन बीटा कोई सनातन या सार्वभौमिक सामाजिक सत्य नहीं हैं। ये आधुनिक वर्गीकरण हैं। समस्या तब पैदा होती है जब हम इन वर्गीकरणों को केवल जन्म-वर्ष के आधार पर बने आयु-वर्ग के रूप में समझने के बजाय चरित्र की परिभाषा बना देते हैं।

क्या जेन ज़ी का अर्थ केवल विरोध है?

2026 में भारत में जेन ज़ी शब्द कई युवा आंदोलनों के कारण चर्चा में आया। दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से जुड़े आंदोलन ने शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था को लेकर युवाओं की नाराजगी को एक बड़े सामाजिक माध्यम अभियान में बदल दिया। बाद में यह आंदोलन कई सप्ताह तक चला और उसके केंद्र में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे तथा परीक्षा संबंधी शिकायतों पर कार्रवाई की मांग रही।

इसे समझना जरूरी है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि यही पूरी जेन ज़ी  की तस्वीर है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हाल ही में हुए युवाओं के एक अलग प्रदर्शन में महिला सुरक्षा, सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा और संस्थागत व्यवस्थाओं को लेकर प्रश्न उठाए गए। वहां भी छात्रों ने अपनी समस्याओं को सामने रखने और व्यावहारिक बदलाव की मांग करने की बात कही।

किसी आंदोलन में शामिल होना और पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधि होना दो अलग बातें हैं। जिस प्रकार किसी एक क्रिकेट मैच में कुछ खिलाड़ियों के प्रदर्शन से पूरे भारतीय क्रिकेट की पहचान तय नहीं की जा सकती, उसी प्रकार कुछ प्रदर्शनों में दिखाई देने वाले व्यवहार के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी की मानसिकता और संस्कार का निर्धारण नहीं किया जा सकता।

हमने जेन ज़ी की एक दूसरी तस्वीर देखना बंद कर दिया है

भारत में युवाओं की एक दूसरी दुनिया भी है, जो शायद उतनी सुर्खियां नहीं बटोरती। वह युवा है जो भजन-संगीत के नए प्रयोगों से जुड़ रहा है, तीर्थों की यात्रा कर रहा है, योग और ध्यान की ओर लौट रहा है, खेलों में भाग ले रहा है, मैराथन दौड़ रहा है और अपने शरीर तथा मन दोनों को मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है। वह युवा है जो भारतीय दर्शन और संस्कृति को केवल परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि अपने जीवन के अनुभव के रूप में समझना चाहता है। वह संस्कृत सीख रहा है, भगवद्गीता पढ़ रहा है, मंदिरों और भारतीय परंपराओं के अर्थ को नए दृष्टिकोण से समझ रहा है।

यही युवा नशे से दूर रहने के लिए फिटनेस का रास्ता चुन रहा है। यही युवा देश के अलग-अलग हिस्सों में पर्वतारोहण, साइकिलिंग, दौड़ और योग जैसी गतिविधियों में भाग ले रहा है। यही युवा भजन-संध्या को नए संगीत प्रारूपों के साथ जोड़ रहा है। यह भी जेन ज़ी  है। बल्कि यह कहना अधिक उचित होगा कि जेन ज़ी की वास्तविक तस्वीर इन सभी रंगों से मिलकर बनती है, केवल विरोध प्रदर्शन के दृश्यों से नहीं।

आज का भारतीय युवा आधुनिक जीवन और अपनी जड़ों के बीच अनिवार्य रूप से कोई संघर्ष नहीं देखता। वह आधुनिक परिधान पहन सकता है और मंदिर भी जा सकता है। वह सामाजिक माध्यमों पर सक्रिय हो सकता है और भगवद्गीता भी पढ़ सकता है। वह मैराथन में दौड़ सकता है और ध्यान भी कर सकता है। वह नए स्टार्ट-अप अथवा व्यवसाय की कल्पना कर सकता है और अपने दादा-दादी से मिली परंपराओं को भी सम्मान दे सकता है। फिर हमने उसकी तस्वीर को इतना छोटा क्यों कर दिया?

भारत की युवा पीढ़ी पश्चिमी खांचे से कहीं बड़ी है

भारत की सामाजिक संरचना को पश्चिमी समाज की दृष्टि से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। हमारे यहां परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों की इकाई नहीं रहा। भारतीय परिवार की संरचना में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है, जिसमें छोटे बच्चे से लेकर वृद्ध दादा-दादी तक एक ही सामाजिक और भावनात्मक व्यवस्था का हिस्सा होते हैं। यहां पीढ़ियां अलग-अलग द्वीप् नहीं होतीं, बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं।

ऐसे परिवार में यदि केवल एक आयु-वर्ग की आवश्यकताओं, विचारों और प्राथमिकताओं को पूरा परिवार मान लिया जाए तो यह परिवार को समझने के बजाय उसे खंडित करने जैसा होगा। बच्चे नई तकनीक लेकर आते हैं, युवा नई ऊर्जा और नए विचार लेकर आते हैं, माता-पिता अनुभव और जिम्मेदारी का संतुलन देते हैं और दादा-दादी स्मृति, परंपरा और जीवनानुभव का संसार साथ लाते हैं। ज्ञान केवल ऊपर से नीचे नहीं जाता; कई बार नई पीढ़ी भी पुरानी पीढ़ी को बदलती है और पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी को दिशा देती है।

इसीलिए भारतीय समाज में केवल जन्म-वर्ष के आधार पर किसी व्यक्ति की मानसिकता तय करना हमेशा अधूरा रहेगा। हमें युवा को केवल इस प्रश्न से नहीं समझना चाहिए कि “वह किस वर्ष पैदा हुआ है?” बल्कि यह भी पूछना चाहिए कि “वह किन मूल्यों के साथ अपना जीवन बनाना चाहता है?”

युवा की आवाज जरूरी है, लेकिन आवाज का अर्थ शोर नहीं

युवा असहमति व्यक्त करें, यह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। सरकार से प्रश्न पूछें, व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान दिलाएं और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएं, यह भी लोकतांत्रिक समाज की स्वस्थ प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन असहमति और अराजकता एक ही चीज नहीं हैं। विरोध और हिंसा एक ही चीज नहीं हैं। अभिव्यक्ति और अपशब्द एक ही चीज नहीं हैं।

हाल ही में पंजाब के लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में एक छात्रा के साथ कथित दुष्कर्म की अपुष्ट सूचना के बाद विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया। परिसर में तोड़फोड़, आगजनी और राष्ट्रीय राजमार्ग अवरुद्ध किए जाने की घटनाएं सामने आईं। पुलिस ने अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की और जांच के लिए विशेष जांच दल बनाया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उस समय कथित दुष्कर्म की घटना की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी।

ऐसी घटना को सीधे “जेन ज़ी  का स्वभाव” कह देना उतना ही गलत होगा, जितना किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को पूरी युवा पीढ़ी की सामूहिक मानसिकता मान लेना। हर घटना को उसके अपने तथ्यों, संदर्भ और प्रमाणों के आधार पर समझना होगा।

सवाल केवल विरोध का नहीं, उसके पीछे की डिजिटल दुनिया का भी है

यहीं से एक और गंभीर प्रश्न सामने आता है। आज का युवा जिस संसार में संवाद करता है, वह केवल सड़क, विश्वविद्यालय या परिवार तक सीमित नहीं है। उसका एक बड़ा हिस्सा सामाजिक माध्यमों पर निर्मित होता है। कोई विचार कुछ घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। कोई वीडियो अचानक आंदोलन का प्रतीक बन सकता है। कोई अफवाह वास्तविक घटनाओं से पहले लोगों की धारणाएं बना सकती है।

इसलिए यह पूछना अनुचित नहीं है कि भारत में तेजी से उभरने वाले युवा आंदोलनों के पीछे डिजिटल मंचों की भूमिका कितनी है? कौन-सी सामग्री कितनी तेजी से फैलती है? किन संदेशों को अधिक दृश्यता मिलती है? क्या किसी देश में सफल रहे डिजिटल आंदोलन की कार्यप्रणाली दूसरे देशों में भी दोहराई जा रही है? और क्या भारत को नेपाल, बांग्लादेश या श्रीलंका में हाल के युवा आंदोलनों से कोई सबक लेना चाहिए?

इन प्रश्नों को पूछना षड्यंत्र सिद्ध करना नहीं है। लेकिन इन्हें पूछना भी नहीं, शायद उससे बड़ी भूल होगी।

भारत सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों से जवाब-तलब किए जाने की घटनाएं इस चिंता की प्रासंगिकता को दिखाती हैं। जुलाई 2026 में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा के वैश्विक नीति अधिकारियों को प्रधानमंत्री के एक वीडियो को फेसबुक पर कुछ समय के लिए प्रतिबंधित किए जाने के मामले में तलब किया था। मेटा ने बाद में इसे अनजाने में हुई त्रुटि बताया और सामग्री बहाल कर दी। इसके बाद संसदीय समिति ने भी मेटा, गूगल, एक्स और स्नैपचैट सहित प्रमुख सामाजिक माध्यम मंचों के प्रतिनिधियों को मंचों के नियमन, प्राइवसी  और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े प्रश्नों पर चर्चा के लिए बुलाया।

यह अपने आप में किसी अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का प्रमाण नहीं है। लेकिन यह अवश्य बताता है कि सामाजिक माध्यमों की शक्ति और उनके प्रभाव को लेकर भारत सरकार और संस्थाएं भी गंभीर प्रश्न उठा रही हैं। इसलिए जब भारत में किसी बड़े युवा आंदोलन को केवल “जेन ज़ी  की स्वाभाविक आवाज” कहकर समझाने का प्रयास किया जाए, तो उसके डिजिटल प्रसार, संगठन, वित्त, संदेश और बाहरी प्रभावों की निष्पक्ष जांच करना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित प्रश्न है।

नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में युवाओं की भूमिका वाले आंदोलनों के संदर्भों को भारत की घटनाओं से सीधे जोड़ देना भी उचित नहीं होगा। प्रत्येक देश का अपना राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संदर्भ है। लेकिन यह भी विचारणीय है कि आज डिजिटल माध्यमों ने सीमाओं के पार आंदोलनों की भाषा, प्रतीकों और संगठन की तकनीकों को पहले की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पहुंचाना संभव बना दिया है। इसलिए भारत को न तो हर घटना में विदेशी हाथ देखने की आवश्यकता है और न ही हर घटना को स्वतःस्फूर्त मान लेने की।

प्रश्न पूछिए। प्रमाण खोजिए। जांच कीजिए। और निष्कर्ष तथ्यों पर छोड़िए।

यही जागरूक समाज की पहचान है।

भारत के युवा को केवल पश्चिमी नाम से क्यों पहचानें?

शायद अब समय आ गया है कि हम यह विचार करें कि भारत की युवा पीढ़ी को समझने के लिए क्या केवल पश्चिम से आए पीढ़ीगत नाम पर्याप्त हैं। जेन ज़ी  एक आयु-वर्ग का नाम हो सकता है, लेकिन वह भारतीय युवा की संपूर्ण पहचान नहीं हो सकता।

भारत में युवा एक साथ कई संसारों में जीता है। वह टेक्नॉलजी का उपयोग करता है, लेकिन परंपरा से संवाद भी करता है। वह स्वतंत्रता चाहता है, लेकिन परिवार से संबंध भी बनाए रखना चाहता है। वह सफलता चाहता है, लेकिन जीवन में अर्थ और मानसिक शांति की तलाश भी करता है। वह विश्व नागरिक बनना चाहता है, लेकिन अपनी सभ्यतागत पहचान से कटना नहीं चाहता।

इसलिए भारत की युवा पीढ़ी को केवल उसके आक्रोश से नहीं, उसकी आकांक्षाओं से भी समझना होगा।

उसे केवल उस समय मत देखिए जब वह सड़क पर नारे लगा रहा हो। उसे उस समय भी देखिए जब वह सुबह दौड़ने निकलता है। जब वह योग करता है। जब वह किसी तीर्थ पर जाता है। जब वह अपने माता-पिता के साथ बैठकर भोजन करता है। जब वह किसी भारतीय ग्रंथ का अर्थ समझने का प्रयास करता है। जब वह संगीत, विज्ञान, खेल, व्यवसाय या सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अपने लिए नई राह बना रहा होता है।

और शायद यहीं भारतीय युवा की एक ऐसी तस्वीर दिखाई देती है, जिसे पश्चिमी पीढ़ीगत वर्गीकरण पूरी तरह पकड़ नहीं पाते।

भारतीय परंपरा में प्रश्न पूछना कोई नई बात नहीं है। हमारे यहां ज्ञान संवाद से विकसित हुआ है। उपनिषदों के संवाद हों, जनक के दरबार में होने वाले शास्त्रार्थ हों या आदि शंकराचार्य की परंपरा में हुए दार्शनिक विमर्श, प्रश्न और प्रतिप्रश्न भारतीय ज्ञान-परंपरा का हिस्सा रहे हैं। आज का युवा भी प्रश्न पूछ रहा है। अंतर केवल इतना है कि उसके हाथ में अब शास्त्र के साथ स्मार्टफोन भी है।

इसलिए चुनौती यह नहीं है कि युवा प्रश्न क्यों पूछ रहा है। चुनौती यह है कि क्या हम उसे प्रश्न पूछने के लिए सही बौद्धिक और सांस्कृतिक आधार दे पा रहे हैं?

उसे केवल क्रोध देना आसान है। उसे विवेक देना कठिन है।

उसे केवल नारा देना आसान है। उसे तर्क देना कठिन है।

उसे केवल भीड़ का हिस्सा बनाना आसान है। उसे स्वतंत्र चिंतन करने वाला नागरिक बनाना कठिन है।

और शायद भारत के भविष्य की असली परीक्षा यहीं है।

हमें अपने युवाओं को किसी पश्चिमी पीढ़ीगत खांचे में बंद करने के बजाय उन्हें उनकी अपनी सभ्यता के संदर्भ में समझना होगा। उन्हें आधुनिकता से दूर नहीं करना है, बल्कि आधुनिकता और अपनी जड़ों के बीच एक सार्थक संवाद स्थापित करना है।

क्योंकि भारत का युवा केवल जेन ज़ी  नहीं है।

वह एक ऐसी सभ्यता का उत्तराधिकारी भी है जिसने हजारों वर्षों से प्रश्न पूछे हैं, तर्क किए हैं, शास्त्रार्थ किए हैं, साधना की है, सृजन किया है और समय के साथ स्वयं को पुनः गढ़ा है।

इसलिए शायद भारत के लिए अगला बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “जेन ज़ी क्या चाहती है?”

प्रश्न यह होना चाहिए कि भारत की युवा पीढ़ी वास्तव में बनना क्या चाहती है?

और उस प्रश्न का उत्तर किसी विदेशी पीढ़ीगत नाम में नहीं, बल्कि भारत के अपने सामाजिक अनुभव, अपनी सभ्यता और अपने युवाओं के वास्तविक जीवन में खोजने की आवश्यकता है।

हो सकता है कि आने वाले समय में भारत अपनी युवा पीढ़ी को किसी नए नाम से पुकारे। ऐसा नाम जिसमें केवल जन्म-वर्ष की पहचान न हो, बल्कि संस्कार, संवाद, साधना, सृजन और राष्ट्रबोध की भी झलक हो।

क्योंकि किसी पीढ़ी की पहचान उसके सबसे अधिक शोर करने वाले लोगों से नहीं होती।

किसी पीढ़ी की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने समय की चुनौतियों के बीच आने वाले समय के लिए क्या निर्मित करती है।

Topics: Indian YouthOpinion NewsPanchjanya newsपाञ्चजन्य विशेषGen Z
Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

मणिपुर में भाजपा की महिला कार्यकर्ता अंगोमचा बिमोल अकोइजम के विरुद्ध प्रदर्शन करती हुईं। बिमोल अकोइजम मणिपुर की इनर मणिपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद हैं।

गिराई ‘गुरु’ की गरिमा

निवेश की पहली पसंद बना भारत

सिवरासा अनोजन, जिनकी चिंता दुनिया के हर मानवाधिकारी को हो रही है

वैश्विक विरोध से बची जान

सर्वोच्च न्यायालय

मुस्लिम आरक्षण : इस्लाम अपनाने पर आरक्षण नहीं

जल : संसाधन से संस्कार तक

वीर सावरकर

बहुआयामी वीर सावरकर : राष्ट्रध्वज के स्वप्नद्रष्टा!

Load More

ताज़ा समाचार

Fact Check: कर्नाटक विधानसौधा में विस्फोट का फर्जी वीडियो हजरत अली ने किया वायरल, क्या है सच्चाई?

उत्तराखंड की लोकभाषाओं को एआई से जोड़ेगा ‘भाषा एआई’ पोर्टल, सीएम धामी ने किया उद्घाटन

कभी नक्सलियों का एरिया कमांडर था, हथियार छोड़ अब परिवार के साथ बिता रहा सामान्य जिंदगी

India Waterways

भारत में जलमार्गों का विकास: भारत सरकार की शांतिपूर्ण क्रांति

Gold Silver Price Today

Gold Silver Price Today: सोने-चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, खरीदारी से पहले जानें आज के ताजा भाव

फ्रांस में कर्फ्यू के बीच भारतीय दूतावास की एडवाइजरी- सतर्क रहें और भीड़भाड़ वाली जगहों से बचें

Karakoram Exercise 2026

काराकोरम अभ्यास 2026 से भारत को क्या सबक? चीन-पाकिस्तान जमीनी सहयोग का मतलब

सुवर्णा राज

Asian Para Games 2026: सुवर्णा राज ने डिस्कस थ्रो में जीता गोल्ड, बढ़ाया देश का मान

मणिपुर में भाजपा की महिला कार्यकर्ता अंगोमचा बिमोल अकोइजम के विरुद्ध प्रदर्शन करती हुईं। बिमोल अकोइजम मणिपुर की इनर मणिपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद हैं।

गिराई ‘गुरु’ की गरिमा

आशुतोष और सौरव दास को क्राइम ब्रांच ने दिया नोटिस

तिहाड़ से रिहा होते ही सौरभ दास और आशुतोष रांका को नोटिस! CJP के तीन नेताओं को क्राइम ब्रांच ने क्यों बुलाया?

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies