'100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज' : डॉ. मोहन भागवत जी ने बताया 'हिंदू शब्द का अर्थ और जिम्मेदारी'
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‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ : डॉ. मोहन भागवत जी ने बताया ‘हिंदू शब्द का अर्थ और जिम्मेदारी’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने विज्ञान भवन में ‘100 वर्ष की संघ यात्रा’ कार्यक्रम में कहा कि ‘हिंदू’ शब्द केवल नाम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और जिम्मेदारी का प्रतीक है। जानिए हिंदू शब्द की उत्पत्ति, इतिहास और वास्तविक परिभाषा।

Written byShivam DixitShivam Dixit
Aug 26, 2025, 09:43 pm IST
inभारत, संघ @100, दिल्ली
हिंदू शब्द का अर्थ और उत्पत्ति

100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ कार्यक्रम में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

नई दिल्ली । दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का तीन दिवसीय संवाद कार्यक्रम ‘100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ के प्रथम दिवस पर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने स्पष्ट किया कि यदि कोई स्वयं को हिंदू कहता है, तो उसे इस देश के प्रति जिम्मेदार रहना ही पड़ेगा। यह नाम केवल पहचान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक है।

‘हिंदू’ नाम की उत्पत्ति

उन्होंने कहा-  महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि जरथुस्त्र के काल में बाहर के लोगों ने भारतीयों को ‘हिंदू’ कहा। वास्तव में हमें अलग नाम की आवश्यकता नहीं थी। हमारे धर्मशास्त्र का नाम ‘मानव धर्मशास्त्र’ था क्योंकि भारतीय परंपरा का मूल विचार ही था—वसुधैव कुटुम्बकम्।

विदेशियों से जुड़ी कथाएं

उन्होंने बताया कि एक कथा के अनुसार, ईरान के लोग सिंधु नदी के पार रहने वालों को ‘सिंदु’ कहते थे, जो बाद में ‘हिंदू’ बना। दूसरी कथा के अनुसार, ईरानियों ने इस्राएलियों से कहा कि उनका एक हिंदू गुरु है। यह शब्द व्यापार के जरिए पश्चिमी तट पर पहुंचा और धीरे-धीरे लोकप्रचलन में आया।

लोकभाषा में ‘हिंदू’ शब्द का प्रवेश

उन्होंने बताया कि ‘हिंदू’ शब्द लोकभाषा में बहुत बाद में आया। संतों की वाणी में यह शब्द पहली बार मिलता है। गुरु नानक देव जी की वाणी में बाबर के अत्याचारों का उल्लेख करते हुए ‘हिंदुस्थान’ शब्द प्रयुक्त हुआ। उस समय ‘मुसलमान’ का अर्थ था—अल्लाह, कुरान और पैगंबर को मानने वाले। जबकि ‘हिंदू’ शब्द किसी एक आस्था या ग्रंथ से बंधा नहीं था। इसमें बौद्ध, जैन, शैव, शाक्त, वैष्णव सभी पंथ सम्मिलित थे।

विविधता में एकता : हिंदू समाज की विशिष्टता

आरएसएस सरसंघचालक जी ने कहा- हिंदू समाज की विशेषता यह रही कि वह सबको स्वीकार करता है। सभी पंथ और पूजा पद्धतियों को मान्यता दी गई। विश्वास था कि सभी मार्ग अंततः ईश्वर तक ही ले जाते हैं—चाहे कोई सरल मार्ग हो या कठिन। मनुष्य की बुद्धि और रुचि अलग-अलग होती है, इसलिए अनेक रास्ते बने। जैसे किसी सभागृह में आने के लिए कई रास्ते हो सकते हैं, वैसे ही आध्यात्मिक साधना के अनेक पथ हैं। अंत में सब ईश्वर तक पहुंचते हैं।

हिंदू संस्कृति का सार

उन्होंने बताया कि ऋषियों ने कहा—‘ऋजु कुटिल नाना पन्थाः, परं गत्येकम्’। अर्थात सब पंथ भिन्न हो सकते हैं, पर लक्ष्य एक ही है। जैसे वर्षा का जल अंततः समुद्र में जाता है, वैसे ही सभी साधनाएं परमात्मा तक ले जाती हैं।

उन्होंने कहा- हिंदू वह है जो अपने मार्ग पर श्रद्धा रखता है, दूसरों का सम्मान करता है, उनके पथ को लेकर विवाद नहीं करता और मिलजुलकर चलता है। यही परंपरा और संस्कृति भारतवर्ष की आत्मा है।

भारत का भूगोल और सुरक्षित जीवन

उन्होंने बताया कि भारत का भूगोल ऐसा था कि चारों तरफ से आक्रमण लगभग असंभव थे। समुद्र लांघकर आना कठिन था और उत्तरी बर्फ़ीली चोटियाँ पार करना असंभव। इसलिए भारत सुरक्षित रहा और यहाँ जीवन सहज और समृद्ध था। पश्चिमी दुनिया में ‘स्ट्रगल फॉर एग्ज़िस्टेंस’ और ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की स्थिति रही, लेकिन प्राचीन भारत में संघर्ष की आवश्यकता नहीं थी। यहाँ संयम और सहयोग की परंपरा थी, इसलिए झगड़े का कारण ही नहीं था।

भारतवासियों ने अपनी दृष्टि भीतर की ओर मोड़ी और आत्मचिंतन किया। परिणामस्वरूप यह सत्य जाना गया कि सर्वत्र एक ही सत्ता है, भले ही वह अलग-अलग रूप में दिखे। इसलिए भारतीय संस्कृति का स्वभाव संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय है।

भारत माता और पूर्वजों का योगदान

सरसंघचालक जी ने कहा- भारत माता केवल पोषण देने वाली नहीं, बल्कि संस्कार देने वाली माता है। हमारे पूर्वजों ने इस भूमि के संरक्षण और संवर्धन के लिए बलिदान दिया। यही इतिहास हमें प्रेरणा देता है और यही पूर्वज हमारे आदर्श हैं।

हिंदू होने के विभिन्न प्रकार

सरसंघचालक जी ने हिंदू समाज के चार प्रकार बताए—
1. जो जानते हैं कि वे हिंदू हैं और गौरव भी मानते हैं।
2. जो जानते हैं कि वे हिंदू हैं, लेकिन गौरव नहीं मानते।
3. जो जानते हैं लेकिन कहते नहीं।
4. जो जानते ही नहीं कि वे हिंदू हैं।
ऐसे लोगों को भारतीय, सनातनी या हिंदवी कहने से आपत्ति नहीं होती।

हिंदू शब्द का वास्तविक अर्थ

सरसंघचालक जी ने कहा- ‘हिंदू’ शब्द केवल नाम नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक कंटेंट है। इसमें भारत माता की भक्ति, पूर्वजों की परंपरा और साझा डीएनए का इतिहास निहित है। यह शब्द पूर्णता से हमारी संस्कृति और जीवनशैली को अभिव्यक्त करता है।

अखंड भारत और संगठन की प्राथमिकता

उन्होंने कहा- भारत की संस्कृति विविधता में एकता पर आधारित है। यहाँ यह मान्यता है कि एकरूपता के बिना भी एकता संभव है। विभिन्न रूप और परंपराएं होते हुए भी अलगाव की भावना नहीं है। जैसे परीक्षा में आसान प्रश्न पहले हल किए जाते हैं, वैसे ही पहले उन हिंदुओं को संगठित करना चाहिए जो स्वयं को हिंदू कहते हैं। उसके बाद बाकी समाज भी सहज ही जुड़ जाएगा। यही संपूर्ण हिंदू समाज के संगठन का मार्ग है।

हिंदू शब्द का आग्रह और विश्वमानवता

सरसंघचालक भागवत जी ने बताया कि ‘हिंदू’ शब्द का आग्रह इसलिए है क्योंकि यही शब्द हमारी संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों को पूर्णता से व्यक्त करता है। यह किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको जोड़ने वाला है। हिंदू का अर्थ है—समावेशी और सार्वभौमिक दृष्टिकोण वाला।

हिंदू संस्कृति की मर्यादा केवल भारत तक सीमित नहीं है। यह परिवार से गाँव, गाँव से जनपद, प्रांत और देश होते हुए संपूर्ण विश्वमानवता तक फैलती है। यही इसकी वैश्विकता है।

इससे पहले का वक्तव्य : 100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज’ : डॉ. हेडगेवार और RSS स्थापना पर सरसंघचालक भागवत जी ने बताईं अनसुनी बातें
Topics: हिंदू शब्द की उत्पत्तिRSS संवाद कार्यक्रमहिंदू शब्द का इतिहासहिंदू और भारतीय संस्कृतिRSS 100 Yearsहिंदू समाज की विशेषता100 years of RSS100 years of sangh yatrarss vision for futurerss 3 days lecture series in delhiहिंदू संस्कृतिmohan bhagwat lecture seriesहिंदू शब्द का अर्थmohan bhagwat lecture series 2025Sarsanghchalak Mohan Bhagwatमोहन भागवत RSSRSS chief Mohan Bhagwatहिंदू समाज की परिभाषा
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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