फ्रांस में विद्यार्थियों की सहज मांगों से विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था। मांगें थीं कि विद्यार्थियों को गंदगी से छुटकारा मिले, शिक्षकों की कमी का सामना न करना पड़े और क्लास में बच्चों की संख्या कम की जाए। सरकार ने इस बार कटौती वाला बजट पेश किया, इसलिए विद्यार्थी गुस्सा थे। उन्हें लग रहा है कि पहले से ही अव्यवस्था का शिकार स्कूल और बर्बाद हो जाएंगे।
पश्चिमी या कहें कि औपनिवेशिक मीडिया ने हमेशा भारत को ही खराब आधारभूत संरचना को लेकर अपनी आलोचना के दायरे में रखा है। यदि एक भी सड़क का कुत्ता या बिल्ली स्कूल के परिसर में भी दिख जाते हैं, तो पश्चिमी मीडिया इसे ऐसे दिखाता है कि जैसे भारत के सभी स्कूलों में पशु विचरण करते हैं। मगर वही मीडिया फ्रांस जैसे देश में यह देखने में विफल रहा कि विद्यार्थियों के बैठने की जगह पर खटमल और चूहे हैं? वैसे खटमलों की समस्या से फ्रांस आज से नहीं जूझ रहा। कुछ समय पहले होटल और मेट्रो में भी खटमल मिलते थे। काफी आलोचना भी हुई थी, मगर छुटकारा नहीं मिला था।
कहां हो रहे दंगे और विरोध प्रदर्शन?
यह हिंसक विरोध प्रदर्शन पिछले एक सप्ताह से पूरे फ्रांस मे हो रहे हैं। यह पेरिस के कुछ स्कूलों से शुरू हुआ था। यहां कई विख्यात हाई स्कूल के बाहर छात्रों ने कचरे के डिब्बे रखकर रास्ते बंद कर दिए थे। इसके बाद पेरिस के उपनगर जैसे सीन सेंट डेनिस और वैले डी मार्ने में फैले यह फैला। ये क्षेत्र हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इसके बाद मर्सिले में हिंसा का रूप इतना भयानक रहा कि प्रदर्शनकारियों ने स्कूल की ही इमारतों को आग के हवाले कर दिया। एक फायर ट्रक को फूंक दिया। इसके साथ ही लियॉन और लील, तुलूज, और बोर्डों में भी हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। लगभग पूरे फ्रांस में स्कूलों को बंद कर दिया गया है।
दंगा विरोधी पुलिस तैनात
एक सप्ताह से फ्रांस जल रहा है और लोगों का कहना है कि इन दंगों की चर्चा कहीं नहीं है। पहले कूड़ेदान और बैरिकेड्स को तोड़ा गया, स्कूल के प्रवेश द्वार को नुकसान पहुंचाया गया और स्कूलों की इमारतों में आग लगाई गई। यह सब इतनी तेजी से फैला कि फ्रांस को दंगा विरोधी पुलिस की तैनाती करनी पड़ी।
डेलीमेल के अनुसार जब हिंसा बढ़ी तो स्कूल की इमारतों को ही नहीं बल्कि शिक्षकों को भी पीटा गया और उन पर पेट्रोल भी डाला गया। उन्होंने किसी तरह से अपनी जाना बचाई। शिक्षा के लिए शुरू हुआ यह आंदोलन हिंसा में बदल गया। डेली मेल के अनुसार 85 पुलिस कर्मियों के घायल होने के बाद जब 600 गिरफ्तारियां हुईं, तो उसके बाद अव्यवस्था फैलने लगी। जब सैंट डेनिस के वामपंथी मेयर बैली बगयोको ने प्रदर्शनकारियों से कहा कि हिंसा भी कानूनी या उचित हो सकती है, तो उसके बाद पूरे देश में प्रदर्शन हिंसक हो गया। उन्हें प्रदर्शनकारियों के साथ स्कूल के बाहर नाचते हुए भी देखा गया।
मर्सिले में विक्टर हयुगों हाई स्कूल में आगजनी की गई और सभी कर्मियों को बिल्डिंग के भीतर जान बचाने के लिए भागना पड़ा। नैनटेस में नेल्सन मंडेला हाई स्कूल के एन्ट्रन्स हॉल को 1 अक्टूबर को आग के हवाले कर दिया। इसके साथ ही पास-दे-कैले में, 1 अक्टूबर की सुबह ऑशेल के फर्नांड डेग्रुगिलियर वोकेशनल हाई स्कूल के हेडटीचर ‘मोर्टार’ आतिशबाजी से घायल हो गए।
पुलिस के अनुसार उपद्रवी तत्व शामिल
पुलिस का कहना है कि छात्र प्रदर्शनों में हिंसक तत्वों ने आगजनी और हिंसा की है। उसके अनुसार ब्लैक ब्लॉक अर्थात ऐसा समूह जो पूरी तरह से काले कपड़े और चेहरे पर नकाब पहनते हैं और इनका उद्देश्य ही यही होता है कि कैसे भी ये प्रदर्शनों में घुसकर उस पर कब्जा कर लें और हिंसा भड़का दें। फ्रांस की सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार इन हिंसक प्रदर्शनों को कट्टर वामपंथी लोग हवा दे रहे हैं। ये समूह सरकार और पूंजीवाद के खिलाफ आंदोलन करते हैं और चूंकि सरकार ने इस बार बजट में जो कटौती की है, उसका उत्तर केवल और केवल सड़कों पर हिंसक क्रांति से दिया जा सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि विद्यार्थियों पर कड़े कदम उठाने से यह हिंसा फैली।
सरकार का कहना है कि विपक्षी दल छात्रों के बहाने हिंसा कर रहे हैं और सरकार ने इन हिंसक प्रदर्शनों पर कड़ी कार्यवाही करते हुए 1949 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें बीबीसी के अनुसार 15 से 18 साल तक के किशोर शामिल हैं। बीबीसी के अनुसार अभी तक पैंसठ कर्मी घायल हो चुके हैं।











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