जापान में चल रहे एशियाई खेलों में इससे बेहतर दिन और कोई साबित नहीं हो सकता था। भारतीय दल ने शुक्रवार को छह स्वर्ण सहित कुल 12 पदक जीत एशियाई खेलों के इस संस्करण में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। यही नहीं, सबसे शानदार- सबसे यादगार और ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल करते हुए भारतीय महिला एथलीटों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय तिरंगा के शान से लहराने में वो अग्रणी भूमिका निभाएंगी।
मुकाबले के 13वें दिन भारत ने जो छह स्वर्ण जीते उनमें से चार महिला खिलाड़ियों ने जीते। इन स्वर्णिम सफलताओं के बीच सबसे बड़ी बात यह रही कि इस दिन जितने भी पदक जीते गए, उनमें से ज्यादा इतिहास भी रचा गया। देश में खेल परंपरा को सशक्त करने की दिशा में यह बड़ी महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
आए दिन सवाल उठ रहा था कि भारत इस बार पिछली बार एशियाई खेलों में जीते गए कुल पदकों की बराबरी कर पाएगा या नहीं? क्या भारतीय खेल जगत गर्त की ओर जा रहा है? क्या हम इसी प्रदर्शन के आधार पर खेल की महाशक्ति बन पाएंगे आदि-आदि…।
अब इन बकवास सवालों के लिए कोई जगह नहीं रह गयी है। उन सभी खेल विशेषज्ञों को जवाब दिया है 44 वर्षों बाद भारत को एशियाई ह़ॉकी के शिखर पर बिठाने वाली महिला हॉकी टीम ने, ओलंपिक पदक विजेता लवलीना बोर्गोहेन (महिला मुक्केबाजी-75 किग्रा) ने, महिला मुक्केबाजी-65 किग्रा वर्ग की स्वर्ण पदक विजेता परवीन हुडा ने और इतिहास रचते हुए स्वर्ण पदक जीतने वाली महिला तीरंदाजी रिकर्व टीम ने, जिसने पहली बार एशियाई खेलों में इस स्पर्धा का स्वर्ण जीत शान से भारतीय परचम लहराया।
इस दौरान भारतीय टीम या खिलाड़ियों ने चीन और दक्षिण कोरिया जैसे सुपर पावर को मात देते हुए अगले 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए भी क्वालीफाई कर लिया।
लॉस एंजिल्स का टिकट पक्का
मुकाबले के 13वें दिन की समाप्ति के ठीक पहले महिला हॉकी टीम ने न सिर्फ गत विजेता चीन को 1-0 से हरा 44 वर्षों बाद स्वर्ण पदक जीता, बल्कि लॉस एंजिल्स ओलंपिक के लिए भी अपना टिकट पक्का कर लिया।
विश्व की नंबर चार चीन की टीम बेहतर नजर आय़ी, लेकिन भारतीय टीम जीत के प्रति कहीं ज्यादा दृढ़ संकल्प और बेहतर रणनीति के साथ खेली। फाइनल का एकमात्र गोल लालरेमसियामी ने किया, जबकि भारत की दीपिका 21 और नवनीत कौर 10 गोल कर टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा स्कोर करने वाली शीर्ष दो स्थानों पर रही।
ये भारतीय टीम की तैयारी और आत्मविश्वास का एक बेहतरीन उदाहरण है।
स्वर्णिम पंचों की लगी झड़ी
एशियाई खेलों में भारत को हमेशा से कड़ी चुनौती मिलती रही है। विशेषकर महिला मुक्केबाजी में तो 2014 इंचियन एशियाई खेलों में एम सी मैरीकॉम के स्वर्ण जीतने के बाद भारतीय मुक्केबाज बेहतर प्रदर्शन करने को तरस रही थी।
लेकिन ओलंपिक पदक विजेता और बर्थडे गर्ल लवलीना बोर्गोहेन ने 75 किग्रा भारवर्ग में ताबड़तोड़ अंदाज में चीन की जी बाओ को 5-0 से हराकर स्वर्ण पदक क्या जीता, उसके बाद तो पदकों की झड़ी सी लग गयी।
इसके बाद दोपहर में करीबन आधे घंटे के अंदर परवीन हुडा (महिला -65 किग्रा) और अंकुश पंघाल (पुरुष- 80 किग्रा) ने भी लगातार दो स्वर्ण पदक जीत बॉक्सिंग रिंग में खलबली मचा दी।
गौरतलब है कि मैरीकॉम के बाद एशियाई खेलों में महिला मुक्केबाजी का स्वर्ण पदक जीतने वाली लवलीना दूसरी और परवीन हुडा तीसरी खिलाड़ी है।
भारतीय खिलाड़ियों का जलवा मुक्केबाजी से कुश्ती मैट तक पहुंच गयी और सुजीत कलकल ने पुरुषों की 65 किग्रा वर्ग कुश्ती में ओलंपिक चैंपियन ताजिकिस्तान के अब्दुलमाजिद कुदीव के जबड़े से जीत छीन स्वर्ण पदक जीत लिया।
दरअसल, सुजीत मुकाबले में 2-9 से पिछड़ चुके थे और विपक्षी पहलवान की जीत लगभग तय दिख रही थी। लेकिन सुजीत ने धैर्य और बेहतर सूझबूझ का परिचय देते हुए तीसरे व अंतिम दौर तक मुकाबला 10-9 से अपने नाम कर तहलका मचा दिया।
2026 एशियाई खेलों में भारत के लिए कुश्ती मैट से निकला यह पहला स्वर्ण पदक है।
खेलप्रेमियों को याद दिलाने के लिए बता दें कि पुरुष कुश्ती का यह वही भारवर्ग है जिसमें स्टार पहलवान योगेश्वर दत्त (2014) और बजरंग पूनिया (2018) में स्वर्ण पदक जीत चुके हैं।



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