अहमदाबाद में आयोजित ‘साबरमती संवाद 2026’ में बदलती वैश्विक व्यवस्था, ब्रिक्स की बढ़ती भूमिका और ग्लोबल साउथ में भारत के प्रभाव को लेकर पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर जी और वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा जी ने भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रख्यात विचारक श्री राम माधव जी से विशेष बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल: ब्रिक्स के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति की अप्रत्याशित टिप्पणियों से अक्सर नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। ऐसे में भारत को इससे कैसे निपटना चाहिए? क्या ब्रिक्स सिर्फ अच्छी ऑप्टिक्स वाली ग्रुपिंग है, या वास्तव में इसकी कोई रणनीतिक और वैश्विक प्रासंगिकता भी है?
जवाब: यह केवल ऑप्टिक्स का सवाल नहीं है। मैं इसलिए शुरुआत में ही कह रहा था कि दुनिया एक नई संरचना की ओर बढ़ रही है। हम एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ जा रहे हैं। जो पुराना वर्ल्ड ऑर्डर था, वह एक तरह से अपनी समाप्ति की ओर बढ़ चुका है। आपने जैसा कहा, आज अमेरिका, खासकर ट्रंप के नेतृत्व में, दुनिया में अपनी कई पारंपरिक जिम्मेदारियों और प्रतिबद्धताओं से पीछे हट रहा है। जब अमेरिका पीछे हटता है, तो स्वाभाविक रूप से दूसरे देश अपनी-अपनी ग्रुपिंग बनाने की कोशिश करते हैं। आपने मेकॉसुर (MERCOSUR) जैसी क्षेत्रीय व्यवस्थाओं और विभिन्न छोटे समूहों के उभरने की बात सुनी होगी। कई देश इस समय इस सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि जब अमेरिका अपनी भूमिका सीमित कर रहा है, तो हमें अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए नए विकल्प तैयार करने चाहिए। एक मजेदार बात मैं बताता हूं। एंतोनियो ग्राम्शी नाम के एक इतालवी विचारक और राजनेता हुए थे। 1930 के दशक में भी दुनिया इसी तरह के एक संक्रमणकाल से गुजर रही थी। आर्थिक महामंदी के दौर में पुरानी व्यवस्था बिखर रही थी। उस समय ग्राम्शी ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही थी- “The old order is dead, and the new is yet to be born.” उन्होंने आगे कहा था कि जब पुरानी व्यवस्था समाप्त हो रही हो और नई व्यवस्था अभी बनी न हो, तो यह संक्रमणकाल होता है और इस दौरान तमाम प्रकार की शक्तियां उभरती हैं। आज भी कुछ वैसी ही स्थिति दिखाई दे रही है। कहीं अमेरिका किसी चीज का विरोध करता है, कहीं कोई दूसरा देश किसी और चीज का विरोध करता है। इसलिए कुछ समय के लिए अव्यवस्था दिखाई दे सकती है। लेकिन इसी अव्यवस्था के भीतर से आगे चलकर एक नई व्यवस्था का निर्माण होगा। इसीलिए भारत अपने आपको किसी एक गुट तक सीमित नहीं रखता। आपने बिल्कुल सही कहा—हम ब्रिक्स में हैं, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में हैं, जहां चीन का प्रभाव महत्वपूर्ण है। साथ ही हम क्वाड में भी हैं, जी-20 में भी हैं और जी-7 की बैठकों में आमंत्रित देशों के रूप में भी भारत की भागीदारी होती है।
इसका मतलब यह है कि भारत आज दुनिया की अलग-अलग व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह भारत के बढ़ते महत्व को दर्शाता है। दुनिया के अलग-अलग देश भारत को अपने साथ क्यों चाहते हैं? क्योंकि भारत आज एक महत्वपूर्ण स्थान पर खड़ा है और उसकी वैश्विक प्रासंगिकता तथा नेतृत्व को सम्मान मिल रहा है। लेकिन एक बात समझना जरूरी है कि नई विश्व व्यवस्था का निर्माण कोई एक गुट अकेले नहीं कर सकता। यह कई देशों और कई व्यवस्थाओं के परस्पर सहयोग से बनेगी। इसलिए भारत सभी मंचों पर अपनी भूमिका निभाएगा और अपने हितों के अनुरूप सभी पक्षों के साथ संबंध बनाए रखेगा।
सवाल : भारत की टेक्नोलॉजी, निवेश, व्यापार और रेमिटेंस के लिए पश्चिम पर निर्भरता है, जबकि दूसरी ओर ब्रिक्स एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभर रहा है। ऐसे में क्या भारत की जियोपॉलिटिक्स और इकोनॉमी अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ रही हैं, या दोनों एक-दूसरे की पूरक हैं?
जवाब: भारत का व्यापारिक निर्भरता केवल पश्चिमी देशों पर है। ऐसा नहीं है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 210 अरब डॉलर का है। वहीं चीन के साथ भारत का व्यापार लगभग 159 अरब डॉलर है। चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। तीसरे स्थान पर संयुक्त अरब अमीरात और चौथे बड़े ट्रेड पार्टनर्स में रूस जैसे देश आते हैं। इसलिए ब्रिक्स के देशों के साथ भी भारत के व्यापारिक संबंध काफी मजबूत हैं। अगर हम सर्विस सेक्टर, खासकर आईटी सर्विसेज को अलग कर दें, तो तस्वीर और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत का व्यापारिक संबंध दुनिया के तमाम देशों के साथ व्यापक है। बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद और दूसरे शहरों से होने वाला आईटी सर्विसेज का निर्यात हमारे व्यापार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार भी बहुत बड़ा है। ब्रिक्स का इंट्रा-ब्रिक्स ट्रेड लगभग 1.1 ट्रिलियन डॉलर का है। यह कोई छोटी राशि नहीं है। इसमें भारत की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। भारत ब्रिक्स के देशों के साथ लगभग 200 से 250 अरब डॉलर के स्तर का व्यापार करता है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि भारत केवल पश्चिम पर निर्भर है। हमारी अर्थव्यवस्था और हमारा व्यापार दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से जुड़ा हुआ है। हमारे लिए पश्चिम के साथ टेक्नोलॉजी, निवेश, व्यापार और वित्तीय संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उसी तरह ब्रिक्स के देशों के साथ हमारे व्यापार और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए भारत की रणनीति किसी एक पक्ष को चुनने की नहीं है। हम दोनों प्रकार के संबंधों को संतुलित तरीके से आगे बढ़ाना चाहेंगे। पश्चिम के साथ भी मजबूत संबंध और ब्रिक्स तथा ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी मजबूत संबंध- यही भारत के हित में है।















