मुंबई के प्रतिष्ठित ताज होटल में पाञ्चजन्य की ओर से आयोजित ‘सुशासन संवाद-मुंबई संकल्प’ में महाराष्ट्र के राज्यपाल महामहिम श्री जिष्णु देव वर्मा जी ने सुशासन और समाज की भागीदारी से विकास को लेकर अपने विचार साझा किए। अपने संबोधन में उन्होंने पाञ्चजन्य की लंबी पत्रकारिता यात्रा का उल्लेख करते हुए भारत के विकास की उस व्यापक दृष्टि पर बात की, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पाञ्चजन्य भारतीय पत्रकारिता की एक लंबी और विशिष्ट यात्रा का साक्षी रहा है। इसकी शुरुआत वर्ष 1948 में लखनऊ से एक साप्ताहिक पत्र के रूप में हुई थी और अटल जी इसके प्रथम संपादक थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी इसके शुरुआती विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
दशकों की इस यात्रा में पाञ्चजन्य ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के विषयों पर अपनी अलग पहचान बनाई है। भारत, समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, शासन और राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक विमर्श को आगे बढ़ाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह केवल घटनाओं की रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नागरिकों को जागरूक करने और स्वस्थ एवं सार्थक बहस को बढ़ावा देने का माध्यम भी बना है। सुशासन जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक मंच पर लाने के इस प्रयास के लिए मैं आपको बधाई देता हूं।
सुशासन की असली कसौटी अंतिम व्यक्ति तक विकास की पहुंच
भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का लक्ष्य हमारे सामने रखा है। यह लक्ष्य केवल आर्थिक विकास या ऊंची जीडीपी तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसे भारत का निर्माण करना है, जो समृद्ध, सक्षम, समावेशी और तकनीकी रूप से मजबूत हो तथा अपनी सभ्यतागत विरासत के प्रति आत्मविश्वास से भरा हो। मैं अक्सर कहता हूं कि भारत का अर्थ केवल ऊंची जीडीपी या अधिक आय नहीं है। विकास का वास्तविक अर्थ तब है, जब सरकार की योजनाओं और नीतियों का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। केवल बैंक खाते में पैसा पहुंच जाना पर्याप्त नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि सरकारी योजनाओं और फैसलों का लाभ जरूरतमंद व्यक्ति तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है। यही सुशासन की वास्तविक कसौटी है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने ‘अंत्योदय’ के विचार के माध्यम से इसी सोच को सामने रखा था। इसका अर्थ है समाज के अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देना, उसे सशक्त बनाना और विकास की मुख्यधारा से जोड़ना। मेरे विचार से यही सुशासन है। योजनाएं तभी सफल हैं, जब उनका लाभ उस व्यक्ति तक पहुंचे, जो समाज में सबसे पीछे खड़ा है और जिसे यह महसूस हो कि शासन उसके साथ खड़ा है। मैं ग्रामीण विकास विभाग का मंत्री रहा हूं और वित्त विभाग की जिम्मेदारी भी संभाली है। पूर्वोत्तर भारत में विकास की चुनौतियां और भी कठिन हैं। वहां भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं और अनेक जनजातीय समुदाय रहते हैं। ऐसे क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना आसान नहीं है। इसलिए शासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि योजनाओं का लाभ वास्तव में उन लोगों तक पहुंच रहा है, जिनके लिए वे बनाई गई हैं।
इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री जी का मंत्र है-“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास।” हमारी सभ्यता और संस्कृति में सबको साथ लेकर चलने की भावना बहुत पुरानी है। हमारी परंपरा में कहा गया है-
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।”
अर्थात सभी सुखी हों, सभी निरोग रहें, सभी का कल्याण हो और किसी को भी दुख का भागी न बनना पड़े। आज इसी भावना को हम “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के रूप में देखते हैं। यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर आगे बढ़ने की सोच है। हमें समाज और सरकार को मिलकर काम करना होगा। इसका एक उदाहरण स्वयं सहायता समूह हैं। जब समाज ने आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभाई और सरकार ने उसे सहयोग दिया, तो स्वयं सहायता समूह सामाजिक और आर्थिक बदलाव का माध्यम बन गए। यह केवल कोई सरकारी योजना नहीं है, बल्कि समाज की भागीदारी से आगे बढ़ने वाला एक प्रयास है, जिसने लोगों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया है। जब मैं त्रिपुरा में था, तब वहां स्वयं सहायता समूहों की संख्या लगभग 3,000 से 6,000 के आसपास थी। कुछ वर्षों में हमने इसे बढ़ाकर लगभग 56,000 तक पहुंचाया। शुरुआत में बैंक इन समूहों को ऋण देने में हिचकिचाते थे। उनका सवाल था कि क्या ये समूह ऋण वापस कर पाएंगे और क्या इन पर भरोसा किया जा सकता है। तब मैंने बैंक अधिकारियों से कहा—आप चिंता मत कीजिए, हम गारंटर हैं। आप इन्हें ऋण दीजिए। इसके बाद स्वयं सहायता समूहों के ऋणों में डिफॉल्ट की दर एक प्रतिशत से भी कम रही। यह दिखाता है कि जब सरकार समाज पर विश्वास करती है और समाज उस विश्वास को जिम्मेदारी के साथ निभाता है, तो बड़े बदलाव संभव होते हैं।
सहभागिता से सुशासन का मार्ग
आज ही मेरी कई विद्यार्थियों से मुलाकात हुई। उनसे मैंने कहा कि क्रांति केवल सड़कों पर नहीं होती। क्रांति का दूसरा नाम परिवर्तन है और सकारात्मक परिवर्तन भी एक क्रांति है। परिवर्तन केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि चर्चा, बहस, विचार-विमर्श और उसके बाद उस विचार को कार्य में बदलने से आता है। चर्चा, बहस, सहमति, निर्णय और फिर कार्रवाई- यही परिवर्तन का रास्ता है। इसलिए शासन को नागरिकों पर विश्वास करना होगा और नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। स्वयं सहायता समूह इसका अच्छा उदाहरण हैं। महिलाओं को जब अवसर, संसाधन और विश्वास मिला, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ीं। आज देश में स्वयं सहायता समूहों का बड़ा नेटवर्क खड़ा हो चुका है। यह केवल आर्थिक गतिविधि नहीं है, बल्कि महिलाओं के सशक्तीकरण, आत्मनिर्भरता और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी बन रहा है। सरकार का काम केवल योजनाएं बनाना नहीं है। उसका वास्तविक काम यह सुनिश्चित करना है कि योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे, नागरिकों को आगे बढ़ने के अवसर मिलें और समाज विकास में भागीदार बने। शासन ऐसा होना चाहिए, जो लोगों के जीवन को सरल बनाए और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दे।
यही सुशासन का सार है- विश्वास, सहभागिता, समावेशिता और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की पहुंच।














