मुंबई के प्रतिष्ठित ताज होटल में पाञ्चजन्य की ओर से आयोजित ‘सुशासन संवाद-मुंबई संकल्प’ में देश की अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार, निवेश, सामाजिक उद्यमिता और बदलती आर्थिक व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा हुई। इस विशेष संवाद में राष्ट्रीय शेयर बाजार के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री आशीष कुमार चौहान और सामाजिक कार्यकर्ता एवं उद्यमी श्रीमती छाया नंजप्पा ने वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा जी के साथ विस्तार से बातचीत की।
प्रश्न 1: क्या शेयर बाजार किसी देश की आर्थिक सेहत और प्रगति का वास्तविक संकेतक हो सकता है?
उत्तर: किसी भी अर्थव्यवस्था के कई आयाम और प्राथमिकताएँ होती हैं। उनमें से शेयर बाजार भी एक महत्वपूर्ण आयाम है। लेकिन किसी भी एक संकेतक को पूरी अर्थव्यवस्था का पूर्ण प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा। हमें विकसित राष्ट्र बनना है। हमें समृद्ध राष्ट्र बनना है। किसी भी समाज के लिए समृद्ध होना बहुत जरूरी है, क्योंकि उसके बाद आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर मार्ग तैयार होता है और विश्व में उस देश की अपनी पहचान बनती है। अब सवाल आता है कि किसी देश की समृद्धि में शेयर बाजार की भूमिका क्या है? इसे समझने के लिए शेयर बाजार के मूल ढाँचे को समझना होगा।
किसी भी अर्थव्यवस्था में बचत मुख्य रूप से परिवारों और आम लोगों से आती है। लोग अपनी छोटी-छोटी बचत करते हैं। वह पैसा बैंक में जमा हो सकता है, सोने में लगाया जा सकता है, अचल संपत्ति में लगाया जा सकता है या उद्योगों में निवेश किया जा सकता है। यदि पैसा सोने में चला गया और वह तिजोरी में पड़ा है, तो उससे सीधे कोई नई आर्थिक गतिविधि पैदा नहीं होती। इसी तरह, यदि पैसा किसी ऐसी संपत्ति में लगा है जो केवल मूल्य बढ़ने की प्रतीक्षा कर रही है, तो उसका उत्पादक उपयोग सीमित हो सकता है। लेकिन जब वही बचत बैंक के माध्यम से उद्योगों तक पहुँचती है या शेयर बाजार के माध्यम से किसी कंपनी में निवेश होती है, तो वह पैसा व्यवसाय को बढ़ाने में इस्तेमाल होता है। कंपनी अपना कारोबार बढ़ाती है, उत्पादन करती है, रोजगार पैदा करती है और लाभ कमाती है। जब आप किसी कंपनी का शेयर खरीदते हैं तो आप उस कंपनी में एक छोटे भागीदार बन जाते हैं। कंपनी का कारोबार बढ़ता है और लाभ होता है तो उस लाभ में आपकी हिस्सेदारी भी बनती है। यही शेयर बाजार का मूल सिद्धांत है।
प्रश्न 2: भारत के आर्थिक विकास में शेयर बाजार की भूमिका को आँकड़ों के माध्यम से कैसे समझा जा सकता है?
उत्तर: यदि हम पिछले तीन-चार दशकों को देखें तो बहुत बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है। उदारीकरण के शुरुआती दौर में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 250 से 270 अरब डॉलर के आसपास था और शेयर बाजार का कुल बाजार पूँजीकरण लगभग 50 से 70 अरब डॉलर के आसपास था। आज भारत की अर्थव्यवस्था कई ट्रिलियन डॉलर की हो चुकी है और शेयर बाजार का बाजार पूँजीकरण भी कई ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच चुका है। इस परिवर्तन को केवल संख्याओं के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण चीज है- विश्वास। पहले शेयर बाजार में निवेश करने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी। जब राष्ट्रीय शेयर बाजार की शुरुआत हुई, तब लगभग 10 लाख लोग शेयर बाजार में निवेश करते थे। समय के साथ यह संख्या बढ़ती गई। वर्ष 2014 के आसपास यह संख्या करोड़ों में पहुँच चुकी थी और आज निवेशकों की संख्या 13 करोड़ से अधिक हो चुकी है। इसका अर्थ है कि देश के करोड़ों लोगों ने अपने उद्यमियों और कंपनियों पर भरोसा किया है। मान लीजिए आप मुंबई में बैठे हैं और किसी कंपनी का व्यवसाय असम, तमिलनाडु या देश के किसी दूसरे हिस्से में है। आपने उस कंपनी को कभी देखा भी नहीं है। फिर भी आप अपनी मेहनत की कमाई में से ₹1,000, ₹2,000 या ₹5,000 उस कंपनी में लगा देते हैं।
प्रश्न 3: जब निवेशकों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ी है तो क्या इसका अर्थ यह है कि सभी निवेशक शेयर बाजार के बारे में शिक्षित भी हैं?
उत्तर: यह जरूरी नहीं है कि निवेशकों की संख्या बढ़ने का अर्थ यह हो कि हर निवेशक शेयर बाजार के बारे में पूरी तरह शिक्षित है। निवेश में सबसे महत्वपूर्ण चीजों में से एक है- विश्वास। आप कितना भी पढ़ लें, अंततः निवेश करते समय यह विश्वास करना पड़ता है कि जिस कंपनी में आप पैसा लगा रहे हैं, वह आगे बढ़ेगी। लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि निवेश में जोखिम होता है। कंपनी का शेयर ऊपर भी जा सकता है और नीचे भी। इसीलिए व्यवस्था में निवेशकों को अधिक से अधिक जानकारी उपलब्ध कराने की कोशिश की गई है। जब हमने अपने काम की शुरुआत की थी, तब कंपनियों के तिमाही परिणाम नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होते थे। कई बार कंपनियाँ वर्षों का परिणाम एक साथ प्रस्तुत करती थीं।
आज स्थिति बहुत अलग है। अब कंपनियों को अपने तिमाही परिणामों के साथ-साथ महत्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी भी देनी होती है। उदाहरण के लिए, कोई बड़ा अनुबंध मिला, कोई महत्वपूर्ण अधिकारी कंपनी छोड़कर गया, किसी संयंत्र में बड़ी दुर्घटना हुई, नया संयंत्र लगा या कोई महत्वपूर्ण अनुमति मिली तो ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी निवेशकों तक पहुँचाना आवश्यक है। यही पारदर्शिता निवेशकों के विश्वास को मजबूत करती है।
प्रश्न 4: निवेशकों की सुरक्षा के लिए शेयर बाजार की व्यवस्था में क्या बदलाव हुए हैं?
उत्तर: पिछले तीन-चार दशकों में निवेशकों की सुरक्षा के लिए व्यवस्था लगातार मजबूत हुई है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड को 1990 के दशक में अधिक अधिकार मिले और उसके बाद राष्ट्रीय शेयर बाजार की स्थापना हुई। यदि कोई सूचीबद्ध कंपनी आवश्यक जानकारी उपलब्ध नहीं कराती है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई की व्यवस्था है। लगातार नियमों का पालन नहीं करने पर उसके कारोबार पर रोक लग सकती है और आगे चलकर उसे शेयर बाजार से बाहर भी किया जा सकता है। हमारी भूमिका मुख्य रूप से पारदर्शिता और सूचना सुनिश्चित करने की है। आज निवेशक के पास पहले की तुलना में कहीं अधिक जानकारी उपलब्ध है। लेकिन जानकारी उपलब्ध कराना एक बात है और उस जानकारी को समझकर निर्णय लेना दूसरी बात।
प्रश्न 5: क्या हर व्यक्ति को स्वयं शेयर बाजार में निवेश करना चाहिए?
उत्तर: जिस तरह हर व्यक्ति अपना इलाज स्वयं नहीं करता और आवश्यकता पड़ने पर डॉक्टर की मदद लेता है, उसी तरह निवेश के मामले में भी विशेषज्ञों की सहायता ली जा सकती है। यदि किसी व्यक्ति के पास समय नहीं है या वह कंपनियों का विश्लेषण नहीं कर सकता, तो वह म्यूचुअल फंड के माध्यम से निवेश कर सकता है। इसके अलावा वित्तीय सलाहकार, पोर्टफोलियो प्रबंधक और अन्य विनियमित मध्यस्थ भी मौजूद हैं। इन क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के लिए निर्धारित परीक्षाएँ और नियम हैं। इसलिए यदि किसी व्यक्ति को स्वयं कंपनियों का अध्ययन करने में कठिनाई होती है तो उसके पास पेशेवर सहायता लेने के विकल्प मौजूद हैं।
प्रश्न 6: आज शेयर बाजार में निवेश की पहुँच कितनी व्यापक हो चुकी है?
उत्तर: आज शेयर बाजार की पहुँच देश के लगभग हर हिस्से तक हो चुकी है। निवेशकों की संख्या 13 करोड़ से अधिक हो चुकी है और इनके नाम पर करोड़ों निवेश खाते हैं। देश के हजारों पिन कोड क्षेत्रों में शेयर बाजार के निवेशक मौजूद हैं। देश के दूर-दराज के क्षेत्रों, पहाड़ी इलाकों और सीमावर्ती क्षेत्रों तक भी लोग निवेश कर रहे हैं। यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। आज निवेश केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। कोई व्यक्ति ₹1,000 निवेश कर रहा है तो किसी के पास करोड़ों रुपये हो सकते हैं। लेकिन ₹1,000 निवेश करने वाले व्यक्ति के लिए भी उसके ₹1,000 उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए व्यवस्था की जिम्मेदारी है कि छोटे-बड़े सभी निवेशकों के पैसे और अधिकारों की सुरक्षा के लिए पारदर्शी व्यवस्था बनाई जाए।
प्रश्न 7: क्या भारत का शेयर बाजार कम आय वाली अर्थव्यवस्था में एक असाधारण उदाहरण है?
उत्तर: भारत का अनुभव निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। आर्थिक सिद्धांतों में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि कम आय वाले देशों में विकसित शेयर बाजार का निर्माण कठिन होता है। इसका एक कारण यह है कि कम आय वाले परिवार अपनी अधिकांश आय जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं पर खर्च कर देते हैं और उनके पास निवेश के लिए बहुत कम बचत बचती है। दूसरी बड़ी समस्या विश्वास की होती है। यदि कोई व्यक्ति अपने से हजारों किलोमीटर दूर बैठे किसी उद्यमी पर अपनी मेहनत की कमाई का पैसा लगाता है तो उसके मन में यह विश्वास होना चाहिए कि उद्यमी मेहनत करेगा, व्यवसाय बढ़ाएगा और निवेशक के हितों का ध्यान रखेगा। भारत में पिछले दशकों में यही विश्वास विकसित हुआ है।
लोगों का भरोसा उद्यमियों पर है, नियामकों पर है, न्याय व्यवस्था पर है, भारतीय रिजर्व बैंक जैसी संस्थाओं पर है और शेयर बाजार की व्यवस्था पर भी है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण विश्वास उस उद्यमी पर है जो मेहनत करके व्यवसाय को आगे बढ़ाता है। कुछ व्यवसाय सफल होते हैं और कुछ असफल भी होते हैं। निवेश में यह स्वाभाविक जोखिम है। लेकिन लंबे समय में लोगों का विश्वास और भागीदारी ही पूँजी निर्माण की प्रक्रिया को मजबूत बनाती है।
प्रश्न 8: सामाजिक उद्यमों और सामाजिक क्षेत्र के लिए शेयर बाजार किस तरह मदद कर सकता है?
उत्तर: सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले संस्थानों को पूँजी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सामाजिक शेयर बाजार की अवधारणा सामने आई। वर्ष 2019 में केंद्रीय बजट में सामाजिक शेयर बाजार की स्थापना की घोषणा की गई। इसके बाद नियामक के सामने यह सवाल आया कि दान और सामाजिक कार्यों को शेयर बाजार की व्यवस्था में किस प्रकार लाया जाए। इस दिशा में विचार-विमर्श के बाद एक ऐसी व्यवस्था बनाई गई जिसमें सामाजिक संस्थाएँ पंजीकरण करा सकती हैं और सामाजिक कार्यों के लिए धन जुटा सकती हैं। इसके लिए शून्य कूपन, शून्य मूलधन जैसी संरचना बनाई गई, जिसे सामाजिक क्षेत्र के लिए विशेष वित्तीय साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक गैर-सरकारी संगठन सामाजिक शेयर बाजार से जुड़े हैं। कुछ संस्थाओं ने इसके माध्यम से करोड़ों रुपये जुटाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में काम किया है। इसका उद्देश्य केवल पैसा जुटाना नहीं है। इसका उद्देश्य सामाजिक क्षेत्र में भी पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणाम आधारित व्यवस्था विकसित करना है।
प्रश्न 9: क्या सामाजिक क्षेत्र में सरकार द्वारा खर्च किए जाने वाले धन को भी परिणाम से जोड़ा जा सकता है?
उत्तर: हाँ, इसके लिए परिणाम आधारित वित्तीय साधनों की अवधारणा पर काम किया जा सकता है। केंद्र और राज्य सरकारें सामाजिक क्षेत्र में हर वर्ष बहुत बड़ी राशि खर्च करती हैं। लेकिन केवल पैसा खर्च कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उस पैसे से वास्तविक परिणाम क्या निकला। कल्पना कीजिए कि किसी राज्य सरकार को किसी सामाजिक क्षेत्र में एक विशेष परियोजना पूरी करनी है। इसके लिए एक गैर-सरकारी संस्था काम करती है। वह संस्था परियोजना को पूरा करती है और किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा उसके परिणाम का मूल्यांकन किया जाता है। यदि निर्धारित परिणाम हासिल होते हैं तभी भुगतान किया जाता है। इस प्रकार की व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों बढ़ सकती हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सामाजिक क्षेत्र में खर्च होने वाला पैसा वास्तविक परिणाम पैदा करे।
प्रश्न 10: ग्रामीण क्षेत्र और महिला उद्यमियों को बढ़ावा देने में सरकारी नीतियों की क्या भूमिका रही है?
उत्तर: मैंने पिछले 20 वर्षों में सब्सिडी या सरकारी योजनाओं पर बहुत अधिक निर्भरता नहीं रखी। मुझे कभी-कभार कुछ योजनाओं के माध्यम से सहायता मिली, लेकिन व्यवसाय के विकास के लिए हमने मुख्य रूप से अपने प्रयासों और ऋण का सहारा लिया। कई बार हमने 12 से 13 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण लेकर भी कारोबार को आगे बढ़ाया। लगातार मेहनत और सही दिशा में काम करने से आज हमारा संगठन उस स्तर तक पहुँचा है जहाँ हमने बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के सामने अपनी जगह बनाई है। लगभग 20 वर्ष पहले हमने करीब 50 किलोग्राम शहद से शुरुआत की थी। आज हमारा संगठन हर महीने लगभग 200 टन शहद खरीदने वाली संस्थाओं में शामिल है। इससे यह साबित होता है कि ग्रामीण भारत में भी बड़े स्तर का सामाजिक उद्यम खड़ा किया जा सकता है। इसके लिए केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। अवसरों को पहचानना, नवाचार करना और लगातार प्रयास करते रहना जरूरी है।
प्रश्न 11: क्या सरकार की योजनाएँ और नीतियाँ पर्याप्त रूप से सही लोगों तक पहुँच रही हैं?
उत्तर: सरकार की कई योजनाएँ अच्छी तरह बनाई गई हैं और उनके लिए पर्याप्त बजट भी रखा गया है। पिछले कुछ वर्षों में बहुत बड़े परिवर्तन हुए हैं। लेकिन समस्या कई बार योजनाओं के क्रियान्वयन में होती है। हर योजना का लाभ उस व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए जिसके लिए वह बनाई गई है। महिला आरक्षण और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की तरह ही यह भी जरूरी है कि महिलाओं को वास्तविक जिम्मेदारियाँ और निर्णय लेने की भूमिकाएँ मिलें। जिन महिलाओं ने जमीनी स्तर पर वर्षों तक काम किया है, उनके अनुभव का उपयोग सरकारी समितियों, बोर्डों और विभिन्न संस्थागत व्यवस्थाओं में किया जाना चाहिए। इससे सरकार और जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक उद्यमियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो सकता है।
प्रश्न 12: युद्ध, व्यापार शुल्क और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं से शेयर बाजार पर पड़ने वाले झटकों को कैसे कम किया जा सकता है?
उत्तर: जैसे-जैसे तकनीक और वैश्विक संपर्क बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे घटनाओं का प्रभाव भी तेजी से पूरी दुनिया में फैलता है। जो घटनाएँ पहले हजारों वर्षों में कभी-कभार होती थीं, उनका प्रभाव आज कुछ ही दिनों में दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुँच सकता है। इससे बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। लेकिन इस जोखिम को कम करने की एक महत्वपूर्ण कुंजी निवेशक के अपने हाथ में है- विविधीकरण। किसी एक कंपनी या एक ही उद्योग में अपना पूरा पैसा नहीं लगाना चाहिए। अलग-अलग कंपनियों और अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश करने से जोखिम को फैलाया जा सकता है। यदि एक उद्योग में गिरावट आती है तो संभव है कि दूसरे उद्योग बेहतर प्रदर्शन करें। यही सिद्धांत म्यूचुअल फंड में भी लागू होता है, जहाँ निवेश को कई कंपनियों में फैलाया जाता है। यदि किसी व्यक्ति को फंड प्रबंधक के निर्णय पर भी भरोसा नहीं है तो वह सूचकांक आधारित कोष में निवेश कर सकता है। ऐसे कोष किसी निर्धारित सूचकांक में शामिल कंपनियों के अनुसार निवेश करते हैं। इस तरह निवेशक अपने जोखिम को अलग-अलग स्तरों पर बाँट सकता है।
प्रश्न 13: क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सामाजिक माध्यम निवेशकों को बेहतर जानकारी देने में मदद कर सकते हैं?
उत्तर: कृत्रिम बुद्धिमत्ता भविष्य में बहुत उपयोगी हो सकती है। वह अलग-अलग परिस्थितियों के संभावित परिदृश्य समझाने में मदद कर सकती है और बड़ी मात्रा में जानकारी को व्यवस्थित कर सकती है। लेकिन एक समस्या भी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता कभी-कभी गलत उत्तर भी बहुत आत्मविश्वास के साथ दे सकती है। इसलिए केवल इसलिए किसी उत्तर को सही नहीं मान लेना चाहिए क्योंकि वह बहुत निश्चित भाषा में दिया गया है। यही बात सामाजिक माध्यमों पर काम करने वाले प्रभावशाली लोगों पर भी लागू होती है। कोई व्यक्ति बहुत आत्मविश्वास के साथ किसी शेयर या निवेश के बारे में बात कर रहा है, इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी बात सही ही होगी। निवेश के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पैसा आपका है, इसलिए अंतिम निर्णय लेने से पहले अपनी समझ और विश्वसनीय जानकारी का उपयोग करना चाहिए। एक बड़े उद्यमी ने मुझसे कहा था- “सबकी सुनो, लेकिन करो अपनी। पैसा अपना है, इसलिए बुद्धि भी अपनी लगानी चाहिए।” यही बात निवेश में भी लागू होती है।
प्रश्न 14: कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में फर्जी वीडियो और गलत जानकारी से निवेशकों को कैसे बचाया जा सकता है?
उत्तर: यह आने वाले समय की बहुत बड़ी चुनौती है। कुछ वर्ष पहले मेरे नाम से भी एक फर्जी वीडियो बनाया गया था, जिसमें यह दावा किया गया कि मैं एक विशेष संदेश सेवा समूह चला रहा हूँ और लोगों को रोज शेयर बाजार की सलाह देता हूँ। यह वीडियो लंबे समय तक सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित होता रहा। एक समय तो कुछ बड़े उद्योगपतियों ने भी मुझसे कहा कि वे मेरे उस समूह से जुड़ चुके हैं। तब मुझे एहसास हुआ कि समस्या कितनी गंभीर है। इसके बाद मैंने इस तरह के फर्जी वीडियो और गलत जानकारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की।
यह केवल मेरे नाम का मामला नहीं है। आज किसी भी व्यक्ति की आवाज और चेहरे का उपयोग करके ऐसा वीडियो बनाया जा सकता है जिसमें वह व्यक्ति ऐसी बात कहता हुआ दिखाई दे जो उसने कभी कही ही नहीं। इससे सत्य और असत्य के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते उपयोग के साथ यह समस्या और गंभीर हो सकती है। इसलिए आने वाले समय में केवल तकनीक को मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें सत्यापन की व्यवस्था, डिजिटल साक्षरता, जवाबदेही और विश्वसनीय सूचना के स्रोतों को भी मजबूत करना होगा। निवेशक को भी सावधान रहना होगा। किसी भी व्यक्ति की बात केवल इसलिए नहीं माननी चाहिए कि वह प्रसिद्ध है, आत्मविश्वास से बोल रहा है या उसका वीडियो वास्तविक दिखाई दे रहा है। सुनिए सबकी, लेकिन अपने पैसे का निर्णय अपनी समझ, विश्वसनीय जानकारी और उचित सलाह के आधार पर ही कीजिए। यही निवेशक के लिए सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा है।














