दक्ष उत्थानसम्पन्नः स्वयंकारी सदा भवेत्।
नावकाशः प्रदातव्यः कस्यचित् सर्वकर्मसु॥
भावार्थ :
दक्ष, उद्योगपरायण और स्वयं काम करने वाला सदा बने। अपने सभी कर्तव्यों के पालन में दूसरे को अवकाश नहीं देना चाहिये।
आज की प्रासंगिकता :
स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता : आज के आधुनिक कार्यक्षेत्र में केवल दूसरों पर निर्भर रहने से काम की गुणवत्ता और गति प्रभावित होती है। अपने काम को खुद संभालने की क्षमता व्यक्ति को अधिक सक्षम और स्वतंत्र बनाती है।
जवाबदेही और स्वामित्व : “स्वयंकारी” बनने का अर्थ है अपने दायित्वों की पूरी जिम्मेदारी लेना। जब व्यक्ति अपने मुख्य कर्तव्यों में ढील नहीं देता या दूसरों पर काम नहीं टालता, तो गलतियों की संभावना कम हो जाती है।
कार्यकुशलता और तत्परता : “दक्ष” और “उद्योगपरायण” होना आज के प्रतिस्पर्धी युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। लगातार नए कौशल सीखना और काम में टालमटोल न करना सफलता की कुंजी है।
ढील न देना : अपने मुख्य कर्तव्यों में किसी दूसरे को अवसर न देने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को अपनी प्राथमिकताओं पर इतना सतर्क रहना चाहिए कि कोई अन्य व्यक्ति उसके काम में बाधा न डाल सके या उसकी लापरवाही का अनुचित लाभ न उठा सके।

















