श्लोक :
वाक्ताडनं प्रमत्तस्य परीवादं रिपोरपि।
प्रतिवादं विमूढस्य वर्जयेल्लोकसंग्रही॥
भावार्थ :
प्रमत्त को डांटना, शत्रु की भी निन्दा करना, मूर्ख का प्रतिवाद करना लोकसंग्रही छोड़ दें।
श्लोक की आज के समय में प्रासंगिकता (Relevance):
अहंकार और व्यर्थ विवाद से बचाव: किसी मूर्ख से बहस करने में समय और ऊर्जा नष्ट होती है, तथा माहौल खराब होता है।
शत्रु की भी निंदा न करना: किसी नेता या जिम्मेदार व्यक्ति को अपने विरोधी की व्यक्तिगत निंदा से बचना चाहिए। यह चरित्र की गरिमा और परिपक्वता को दर्शाता है।
सकारात्मक संचार: समाज को जोड़ने वाला व्यक्ति अपनी वाणी पर संयम रखता है और व्यर्थ के वाद-विवाद से दूर रहकर दूरदर्शी लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करता है।

















