यह श्लोक देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत आधुनिक संस्कृत सुभाषित परंपरा (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, संस्कृत भारती एवं राष्ट्रीय विचार-धारा के सुभाषित संग्रहों) से उद्धृत है।
श्लोक :
जन्मस्थानं महर्षीणां तपःस्थानं च योगिनाम् ।
न जगद्वन्द्यतां राष्ट्रं भजेत् संघबलं बिना ।।
भावार्थ :
चाहे महर्षियों का जन्मस्थान हो चाहे योगियों की तपोभूमि हो, किन्तु जिस राष्ट्र के निवासियों में ‘संगठन’ का बल नहीं होता, वह संसार के लिए वन्दनीय नहीं हो सकता।
आज के युग में प्रासंगिकता :
केवल अतीत के गौरव पर निर्भर न रहना : भारत की भूमि महर्षियों और योगियों की रही है, लेकिन केवल इतिहास या प्राचीन आध्यात्मिक पहचान के बल पर आज का राष्ट्र शक्तिशाली नहीं बन सकता। वर्तमान में व्यावहारिक संगठनात्मक शक्ति ही दुनिया में सम्मान दिलाती है।
सांस्कृतिक धरोहर बनाम व्यावहारिक एकता : यह श्लोक एक कड़वी सच्चाई सामने रखता है कि कोई देश कितना भी पवित्र या महान क्यों न रहा हो, यदि उसके नागरिक विभाजित हैं तो दुनिया उसका आदर नहीं करेगी। आज के दौर में वैज्ञानिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से संगठित होना ही वास्तविक पूजनीयता का आधार है।
वैश्विक मंच पर आदर और प्रभाव : अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भावना या इतिहास नहीं, बल्कि राष्ट्र की आंतरिक एकजुटता और संगठित सामर्थ्य ही प्रभाव डालती है।

















