सर्वधर्म-समा वृत्तिः सर्वजातिसमा मतिः।
सर्वसेवापरा नीतिरिति संघस्य पद्धतिः॥
भावार्थ :
सभी धर्मों के साथ समान वृत्ति, सभी जातियों के साथ समानता की बुद्धि, सभी लोगों के साथ सेवा परायणता की नीति यह संघ की पद्धति है।
आज के लिए प्रासंगिकता (Relevance for Today)
आज विश्व भर में वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है। ऐसे समय में सभी धर्मों और आस्थाओं के प्रति समान सम्मान व स्वीकार्यता का भाव सामाजिक शांति और ‘सर्वधर्म समभाव’ को मजबूत करता है।
सांस्कृतिक एवं सामाजिक: सामाजिक समरसता, सामाजिक एकजुटता, समावेशी दृष्टिकोण के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने के लिए यह सिद्धांत अत्यंत आवश्यक है। सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के समान दृष्टि से देखना एक सशक्त और एकजुट राष्ट्र के निर्माण की पहली शर्त है।
निःस्वार्थ जनसेवा (‘सर्वसेवापरा नीतिः’) समाज में अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सहायता पहुंचाना और आपदाओं या संकट के समय मानवता की सेवा करना ही किसी भी संगठन या नागरिक का मूल कर्तव्य है। यह ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ के विचार को साकार करता है।
निष्कर्ष: आज के परिदृश्य में यह विचार केवल किसी एक संगठन की पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि एक शांतिपूर्ण, समावेशी और समरस समाज के निर्माण का सार्वभौमिक सूत्र (Universal Principle) है।

















