यह श्लोक किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ या वेद-पुराण से न होकर आधुनिक संस्कृत (नीति-साहित्य) का भाग है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से सामाजिक-संगठनात्मक चिंतन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे सामाजिक संगठनों की कार्यपद्धति में होता है।
श्लोक :
विना प्रीतिं विना नीतिं विना सत्कार्यपद्धतिम्।
विना कर्तृत्वशक्तिं च संघो नैव विवर्धते ॥
भावार्थ :
बिना प्रेम के, बिना नैतिकता के, सत्कार्य पद्धति और कर्तृत्व शक्ति के बिना संगठन का कार्य नहीं बढ़ता।
आज की प्रासगिकता :
यह श्लोक आधुनिक कॉर्पोरेट मैनेजमेंट, टीमवर्क, स्टार्टअप्स और किसी भी सामाजिक या राजनीतिक संगठन के लिए सफलता का मूलमंत्र है:
प्रीति (आपसी स्नेह और विश्वास): आधुनिक कार्यस्थल (Workplace) पर केवल काम का दबाव नहीं, बल्कि सौहार्द और परस्पर सम्मान होना चाहिए। बिना आपसी तालमेल के टीम वर्क संभव नहीं है।
नीति (नैतिकता और नीतियां): किसी भी संस्थान को लंबे समय तक टिकाए रखने के लिए स्पष्ट नीतियां, पारदर्शिता और गवर्नेंस की आवश्यकता होती है।
सत्कार्यपद्धति (व्यवस्थित और सकारात्मक कार्यशैली): केवल नीयत अच्छी होना काफी नहीं है, कार्य निष्पादन (Execution) की पद्धति भी पारदर्शी और कुशल होनी चाहिए।
कर्तृत्वशक्ति (सक्षमता और नेतृत्व क्षमता): संगठन में शामिल सदस्यों में अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने की क्षमता, कौशल और क्रियाशीलता होनी चाहिए।

















