मुस्लिम महिलाओं पर ए पी अबूबकर के बयान को लेकर गत दिनों विवाद मचा था। अब उनका एक नया बयान सामने आया है। उन्होंने साफ कहा कि वे महिलाओं को दिए गए अपने बयान पर कायम हैं। उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक दल के हिसाब से समस्थ केरल जमीयथुल उलमा के आदेश को किसी भी हालत में बदला नहीं जा सकता है।
क्या था पुराना बयान?
अगस्त में समस्त केरल जमीयतुल उलमा के अध्यक्ष ई सुलेमान मुसलियार और महासचिव कंथापुरम ए पी अबूबकर ने एक सर्कुलर के माध्यम से मुस्लिम महिलाओं के लिए विशेषकर एक फरमान जारी किया था, जिसमें उन्होनें कहा था कि मुस्लिम महिलाओं को न ही पुरुषों के साथ मंच साझा करना चाहिए और न ही उनके साथ सार्वजनिक स्थानों पर खड़े होना चाहिए।
उन्होनें कोच्चि में एक इस्लामी कार्यक्रम में बोलते हुए यह कहा था कि मुसलमान महिलाओं का सार्वजनिक मंचों पर आना भयंकर विनाश का कारण बन सकता है। और उन्होनें कहा था कि इसी से बचने के लिए पर्दा किया जाता है।
मीडिया के अनुसार उन्होनें इसके लिए पवित्र कुरान का हवाला देते हुए कहा था कि मुसलमान महिलाओं को अपने घरों में ही रहना चाहिए और उन्हें सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आना चाहिए।
और उनके अनुसार यह कोई नए विचार नहीं है, बल्कि यह सौ वर्षों से इस्लामिक विद्वानों के विचार हैं।
इस बयान पर मचा था हंगामा
इस बयान के आते ही राजनेताओं द्वारा इस बयान की निंदा शुरू हो गई थी। देखते ही देखते हर पार्टी ने इस बयान की आलोचना की, मगर यह मजेदार है कि स्मैश द पैट्रियार्की करने वाले राहुल गांधी के केरलम में एक ऐसी पत्रकार पर एफआईआर दर्ज हुई, जिसने इस मुस्लिम महिला विरोधी बयान की आलोचना की थी।
बयान पर कायम
वहीं इन सभी हंगामे और राजनीति के बाद एक बार फिर से समस्त केरल जमीयतुल उलमा के महासचिव कंथापुरम ए पी अबूबकर ने कहा है कि चूंकि यह संस्था सुन्नियों और उनकी गतिविधियों का मार्गदर्शन और नियंत्रण करने वाली सर्वोच्च इस्लामिक संस्था है, और यह कयामत के दिन तक अपना काम जारी रखेगी।
उन्होनें चेम्मड में एक कार्यक्रम में कहा कि वे उपस्थित जनों को याद दिलाना चाहते हैं कि हर किसी को यह बात ध्यान रखनी चाहिए, और इसके बने रहने के लिए दुआ करनी चाहिए।
साथ ही उन्होनें यह साफ कहा कि यह कुछ खास लोगों की पसंद या प्राथमिकताओं को पूरा करने के लिए कोई भी काम नहीं करती है। बल्कि यह पड़ताल करके काम करती है कि कौन से हालातों में क्या जरूरी है। उन्होनें यह भी कहा कि इस संस्था के किसी भी निर्णय को पलटना असंभव है।
इसके साथ ही उन्होनें यह भी कहा कि उनका रवैया आज तक किसी भी व्यक्ति या राजनीतिक दल के लिए निर्णयों को बदलने का नहीं रहा है। वे अपनी मजहबी किताबों और नियमों के हिसाब से जांच परख कर कोई भी निर्णय लेते हैं।
इस बयान पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया अभी नहीं आई है
हालांकि अभी इस बयान पर कोई भी राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, परंतु एक बात तो कई उदाहरणों से साफ दिखती है कि कॉंग्रेस के केरलम का चुनाव जीतने के बाद से ही कट्टरपंथी सोच और तेजी से बढ़ी है। भारतीय जनता पार्टी ने आरोप लगाया है कि कॉंग्रेस ने कट्टरपंथी ताकतों के सामने घुटने टेक दिए हैं।
यह भी देखना होगा कि इस बयान पर कि यह संस्था किसी भी राजनीतिक दल के लिए अपना फैसला नहीं बदलती, पर उन राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया क्या होगी, जो महिलाओं के मसीहा होने का दावा करते हैं। वहीं इस मामले में भारत के फेमिनिस्ट समूहों से लगातार ही चुप्पी देखी जा रही है, जो बहुत ही हैरान करने वाली बात है। फेमिनिस्ट महिलाओं और कथित प्रगतिशील लेखक वर्ग का भी इस मामले पर विरोध न आना यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं वे लोग भी विवादों में नहीं पड़ना चाहते हैं। या फिर वे लोग डरते हैं! अब यह डर क्या है, यह नहीं पता!













