दुनिया डगमगाई, भारत संभला
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दुनिया डगमगाई, भारत संभला

वैश्विक व्यापार तनाव, पश्चिम एशिया के युद्ध, महंगे तेल और लड़खड़ाती आपूर्ति शृंखलाओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था का 7.8 प्रतिशत की गति से बढ़ना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है। यह उस बदलते भारत का संकेत है, जो अब वैश्विक परिस्थितियों का निष्क्रिय दर्शक या उनका शिकार मात्र नहीं रहा

Written byडॉ. अश्वनी महाजनडॉ. अश्वनी महाजन
Sep 13, 2026, 10:41 pm IST
inभारत, विश्लेषण

जब पूरी दुनिया युद्ध, व्यापार संघर्ष, ऊर्जा संकट और आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन से जूझ रही है, तब भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर्ज कर एक अलग रास्ता चुना है। वास्तविक सकल मूल्य संवृद्धि (जीवीए) 8.2% दर्ज की गई, जो पिछले वर्ष की समान तिमाही (7%) से अधिक है। सकल निजी उपभोग में 7.1% की वृद्धि भी पिछले वर्ष की 6.8% से बेहतर रही। यह आंकड़ा न केवल बाजार की अपेक्षाओं से बेहतर है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित गतिशीलता और बाहरी झटकों को अवशोषित करने की क्षमता को भी रेखांकित करता है।

इस वृद्धि के पीछे निवेश, विनिर्माण, सेवाओं और घरेलू मांग का अपेक्षाकृत संतुलित योगदान रहा है। सकल स्थिर पूंजी निर्माण में 11.9% की उल्लेखनीय वृद्धि ने निवेश चक्र की मजबूती को दर्शाया, जबकि विनिर्माण क्षेत्र 9.2% और सेवा क्षेत्र 10% की दर से फैला। निजी अंतिम खपत व्यय में 7.1% की वृद्धि ने सिद्ध किया कि भारतीय उपभोक्ता मांग वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद स्थिर बनी हुई है।

जीडीपी आंकड़ों पर बहस

विपक्ष जीडीपी वृद्धि को ‘आंकड़ों की बाजीगिरी’ और ‘पी.आर. गतिविधि’ करार दे रहा है? उसके अनुसार वास्तविक वृद्धि बमुश्किल 2.6% है, जबकि प्रधानमंत्री और सरकारी पक्ष इसे उन लोगों को जवाब बता रहे हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था के डूबने की बात करते रहे हैं। बता दें कि जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को ‘मृत अर्थव्यवस्था’ कहा था, तो नेता प्रतिपक्ष ने भी उसी बात का समर्थन किया था।

दरअसल, 2026 में भारत ने 2022-23 आधार वर्ष वाली जीडीपी गणना की नई शृंखला और संशोधित पद्धति अपनाई है, जिसमें बेहतर डेटा स्रोतों (जैसे जीएसटी, ई-वाहन) का उपयोग किया गया है। सरकार ने इसे अधिक व्यापक और सटीक बताया है। ‘प्राइस डिफ्लेटर’ को लेकर सवाल उठाए जा रहे सवालों पर भी सरकार ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। लेकिन विपक्ष भारत की विकास गाथा को मानने को तैयार नहीं है। विपक्षी विदेशी मुद्रा भंडार बचाने हेतु प्रधानमंत्री की उस अपील (विदेश यात्रा टालने और सोना न खरीदने) की आलोचना कर रहे हैं। उनका तर्क है कि प्रधानमंत्री को मिसाल पेश करते हुए अपनी विदेश यात्राएं रोक देनी चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का कहना है कि जीडीपी के आंकड़े सिर्फ दिखावा हैं। सरकार जनता को आर्थिक आंकड़ों में उलझाए रखना चाहती है, जबकि लोग महंगाई, बेरोजगारी और असमानता से परेशान हैं।

प्रश्न है, क्या आंकड़ों की बाजीगरी संभव है? दरअसल, जीडीपी के आंकड़ों के पीछे एक व्यापक और पारदर्शी प्रक्रिया होती है, जिसमें उत्पादन के आंकड़ों, औद्योगिक उत्पादन के संकेतक, इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली और गैस के उपभोग, वाहनों के उत्पादन, बंदरगाहों पर आवाजाही, एयर कार्गो और वाहन रजिस्ट्रेशन समेत कई संकेतकों का संकलन शामिल होता है। अप्रैल-जून 2026 की पहली तिमाही के दौरान ये संकेतक मजबूत वृद्धि दर्शाते हैं। खाद्यान्न उत्पादन 4.8%, तैयार स्टील का उपभोग 8.2%, इंफ्रास्ट्रक्चर/निर्माण का औद्योगिक उत्पादन संकेतक 7.5%, बिजली 9.3%, व्यावसायिक वाहनों की बिक्री 18.3%, तिपहिया वाहनों की बिक्री 29.7%, बड़े बंदरगाहों पर कार्गो हैंडलिंग 6.2%, घरेलू वाहन रजिस्ट्रेशन 15.9%, मालभाड़ा वाहन रजिस्ट्रेशन 20.5%, और पूंजीगत वस्तुओं का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक 15.2% बढ़ा। ये सभी आंकड़े पारदर्शी रूप से उपलब्ध होते हैं। अतः जो लोग जीडीपी के आंकड़ों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं, उन्हें या तो जीडीपी की गणना की जानकारी नहीं है, या वे राजनीतिक कारणों से देश और सरकार को बिना वजह कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं।

निवेश में अभूतपूर्व उछाल

खास बात यह है कि पिछले साल की पहली तिमाही की तुलना में सकल स्थिर पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) की वृद्धि 5.8% से बढ़कर दोगुनी से भी अधिक यानी 11.9% हुई है। उल्लेखनीय है कि पिछले 5 वर्ष में जीएफसीएफ जीडीपी के प्रतिशत के रूप में लगभग 32% के आसपास लगातार बना रहा, जिसने भारत को दुनिया की सबसे तेज विकास दर वाली बड़ी अर्थव्यवस्था और चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में योगदान दिया। इस वर्ष की पहली तिमाही में जीएफसीएफ का जीडीपी में हिस्सा 31.4% से बढ़कर 34.3% हो गया है। यदि वृद्धिशील पूंजी उत्पाद अनुपात (आईसीओआर) 4:1 माना जाए, तो संकेत है कि जीडीपी विकास दर लगातार 8% के आसपास रह सकती है। हालांकि, केवल एक तिमाही के आंकड़े इसकी गारंटी नहीं दे सकते। सरकार को अपनी नीतियों में सजग रहकर इस प्रवृत्ति को बनाए रखना होगा। पिछले दशक की आर्थिक यात्रा का सार यह है कि सरकार ने प्लेटफॉर्म तैयार किया है। सरकार सड़कें, बंदरगाह और डिजिटल ढांचा उपलब्ध करा सकती है, लेकिन उद्योग, नए व्यवसाय और नवाचार उद्यमियों को ही खड़े करने होंगे। पहली तिमाही में निजी निवेश के बढ़ते संकेत इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यदि यह प्रक्रिया जारी रहती है, तो भारत की विकास यात्रा एक नए चरण में प्रवेश कर सकती है।

35 वर्ष में पहली बार ए रेटिंग

जापानी रेटिंग एजेंसी ‘जेसीआर’ ने पिछले सप्ताह भारत की संप्रभु साख रेटिंग को बीबीबी (+) से बेहतर करते हुए ए (-) कर दिया है, जिसका मतलब यह है कि एजेंसी के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का स्थायी आउटलुक है। किसी भी ग्लोबल रेटिंग एजेंसी ने 35 वर्ष में पहली बार भारत को इस श्रेणी में रखा है। हालांकि शेष अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा भारत की रेटिंग का पूर्ण आकलन करना अभी बाकी है, ‘जेसीआर’ द्वारा भारत की रेटिंग के अभ्युत्थान का खासा महत्व है। रेटिंग में सुधार, दुनिया में भारत के लिए निवेश के माहौल को सकारात्मक और कंपनियों द्वारा ऋण लेने को सस्ता और सुगम बनाता है।

भारत लंबे समय से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है, और उसने कभी भी अपने ऋणों पर ब्याज या मूल चुकाने में कोताही नहीं की है। विदेशी मुद्रा भंडार उच्च स्तर पर हैं। देश प्रौद्योगिकी, रक्षा, टेलीकॉम, अंतरिक्ष और डिजिटल भुगतान के क्षेत्रों में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। कुछ समय पूर्व भारत जापान को पछाड़ते हुए दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन गया। भारतीय बैंकिंग क्षेत्र भी पूर्व की समस्याओं से निजात पाते हुए आगे बढ़ रहा है, जहां क्रेडिट ग्रोथ 20% से भी अधिक है और बैंकों के सकल एनपीए मार्च 2026 तक मात्र 1.73% पर पहुंच चुके हैं।

इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद, ग्लोबल एजेंसियों मूडीज, स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स और फिच द्वारा भारत की क्रेडिट रेटिंग में केवल मामूली ही सुधार किया गया है। अभी भी मूडीज द्वारा भारत की रेटिंग ‘बीएए 3’ (स्थिर), स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स द्वारा ‘बीबीबी’ (स्थिर) और फिच द्वारा ‘बीबीबी माइनस’ (स्थिर) ही बनी हुई है। पश्चिमी देशों के सुझावों और दबावों पर चलने के बावजूद भारत की रेटिंग में लंबे समय तक कोई विशेष सुधार नहीं दिखा।

जीवीए वृद्धि का क्षेत्रवार विश्लेषण

जीवीए में 8.2% की वृद्धि के पीछे क्षेत्रवार योगदान स्पष्ट है। विनिर्माण में यह वृद्धि 9.2%, बिजली और उपयोगिता सेवाओं में 8.9%, और निर्माण में 7.7% रही। सेवा क्षेत्र में आर्थिक समृद्धि सबसे बेहतर 10% दर्ज की गई, जबकि कृषि में वृद्धि 3.6% और खनन में -2.4% रही। कुल निवल करों में वृद्धि पिछले साल की 6.5% से घटकर 3.9% रह गई। चालू कीमतों पर जीवीए वृद्धि 10.3% है, लेकिन इसमें विनिर्माण की वृद्धि केवल 7.7% है, जबकि कृषि में 7.5% है। इसका अर्थ है कि कृषि का डिफ्लेटर अधिक है (कीमतें बढ़ी हैं), जबकि विनिर्माण में यह ऋणात्मक है (कीमतें घटी हैं)। यानी कृषि का वास्तविक उत्पादन केवल 3.6% बढ़ा, लेकिन कृषि उत्पादन की चालू कीमतों में 7.5% की वृद्धि बताती है कि कीमतों में वृद्धि के कारण किसानों की मौद्रिक आमदनी 7.5% बढ़ी है।

यहां आंकड़े से बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी ताकत है, जिसने बाहरी झटकों के बीच भारत को संभाले रखा? इसका जवाब है-

l घरेलू मांग की स्थिरता : भारत की अर्थव्यवस्था मुख्यतः घरेलू खपत पर आधारित है, जिसने वैश्विक व्यापार में गिरावट के प्रभाव को कम किया। जब वैश्विक मांग कमजोर होती है, तो बाहरी बाजारों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं अधिक असुरक्षित होती हैं, लेकिन भारत की स्थिति अलग है। पहली तिमाही में निजी उपभोग में 7.1% की वृद्धि ने सिद्ध किया कि भारतीय परिवारों की मांग विकास की महत्वपूर्ण धुरी बनी हुई है।
l नीतिगत हस्तक्षेप : सरकार द्वारा ईंधन पर उत्पाद शुल्क में कटौती और आरबीआई द्वारा ब्याज दरों में समायोजन ने महंगाई के दबाव को नियंत्रित रखते हुए निवेश और खपत को प्रोत्साहित किया।
l क्षेत्रीय विविधीकरण : विनिर्माण और सेवाओं दोनों का मजबूत प्रदर्शन, साथ ही निर्यात में 12% की वृद्धि ने अर्थव्यवस्था को एकपक्षीय जोखिमों से बचाया।

वैश्विक दबाव और भारत की आर्थिक ढाल

वैश्विक अर्थव्यवस्था कई दबावों से जूझ रही है। अमेरिका-चीन व्यापार तनाव और पश्चिम एशिया संघर्ष ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजारों को अस्थिर किया है। सितंबर 2026 में ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चला गया, जिससे आयात बिल, मुद्रास्फीति और रुपये पर दबाव बढ़ा और सेंसेक्स में लगभग 3,000 अंकों की गिरावट आई। फिर भी, भारतीय अर्थव्यवस्था की मूल संरचना में पिछले दशक के दौरान आए परिवर्तन इसे बाहरी झटकों से बचा रहे हैं। भारत की अर्थव्यवस्था अब केवल निर्यात-निर्भर नहीं है, इसके पास चार सशक्त स्तंभ हैं-

l विशाल घरेलू बाजार : भारत की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति उसका विशाल उपभोक्ता बाजार है। जब वैश्विक मांग कमजोर होती है, तो बाहरी बाजारों पर निर्भर अर्थव्यवस्थाएं अधिक असुरक्षित होती हैं, लेकिन भारत की स्थिति अलग है। चावित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में निजी उपभोग में 7.1% की वृद्धि ने सिद्ध किया कि भारतीय परिवारों की मांग विकास की महत्वपूर्ण धुरी बनी हुई है।

l विनिर्माण और सेवाओं का मिश्रण : भारत का मॉडल विनिर्माण, सेवाओं, डिजिटल अर्थव्यवस्था और घरेलू उपभोग का मिश्रित मॉडल बन रहा है। सेवाएं जीवीए में आधे से अधिक योगदान देती हैं। 2024 में वैश्विक सेवा व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 4.3% थी। 2025-26 की पहली छमाही में औद्योगिक क्षेत्र 7% और विनिर्माण 8.4% बढ़ा। अतः भारत का लक्ष्य केवल ‘दुनिया की फैक्टरी’ नहीं, बल्कि उत्पादन, डिजाइन, डिजिटल सेवा, वित्तीय सेवा और नवाचार केंद्र का संयोजन बनना है।

l भौतिक अवसंरचना और निवेश : पिछले कुछ वर्षों में सरकारी पूंजीगत व्यय ने सड़कें, रेलवे, बंदरगाह और डिजिटल ढांचा तैयार किया। अब निजी क्षेत्र द्वारा उस आधार पर निवेश की अगली लहर शुरू हो रही है। कोविड के बाद अमेरिका, यूरोप और जापान ने ‘चीन प्लस वन’ रणनीति अपनाई, जो भारत के लिए एक सुनहरा अवसर है। अवसर को निवेश में बदलने के लिए बंदरगाह, सड़क, बिजली, भूमि, कौशल और लॉजिस्टिक्स जैसे कारकों की आवश्यकता होती है, जिन पर भारत ने पिछले वर्षों में काम किया है। आर्थिक सर्वेक्षण ने भौतिक अवसंरचना के साथ-साथ डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और स्वच्छ ऊर्जा को भी व्यापक अवसंरचना का हिस्सा माना है।

l डिजिटल अवसंरचना : भारत की डिजिटल क्रांति आर्थिक संप्रभुता का नया आधार है। अगस्त 2026 में यूपीआई पर 24.51 अरब लेन-देन हुए (मूल्य लगभग 314 अरब डॉलर), और यह प्रणाली अब 11 देशों में परिचालन कर रही है। डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान और बैंकिंग पहुंच ने लेन-देन की लागत घटाई है और आर्थिक गतिविधियों को अधिक औपचारिक बनाया है।

आयात-निर्यात में सुधार

पिछले वर्ष की पहली तिमाही में निर्यात में 6.0% और आयात में 5.3% की मामूली वृद्धि हुई थी, लेकिन इस वर्ष निर्यात में वृद्धि 12% तक पहुंच गई है और आयात में 1.1% की कमी रिकॉर्ड हुई है, जो भुगतान संतुलन में महत्वपूर्ण और सकारात्मक सुधार की ओर इंगित करता है। पहले भुगतान असंतुलन और विदेशी संस्थागत निवेश (एफआईआई) के बहिर्गमन के कारण विदेशी मुद्रा भंडारों पर दबाव था और रुपया लगातार कमजोर हो रहा था। आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और तेल की कीमतों में वृद्धि ने स्थिति को और विकट बना दिया था। लेकिन निर्यात में भारी वृद्धि और आयात में कमी एक राहत भरी खबर है। इसके अलावा, रिजर्व बैंक की विशेष स्वैप स्कीम के कारण विदेशों में रहने वाले भारतवंशियों द्वारा भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा जमा करने से विदेशी मुद्रा भंडारों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे भारतीय रुपया मजबूत होने की संभावना है।

एनआरआई का विश्वास और विदेशी मुद्रा प्रवाह

जहां ग्लोबल रेटिंग एजेंसियां भारत की रेटिंग को जानबूझकर कमतर (बीबीबी श्रेणी) आंकती रही हैं, वहीं विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने इस रेटिंग को खारिज कर दिया है। 8 जून से 31 अगस्त 2026 के बीच मात्र तीन माह से भी कम समय में एनआरआई ने 127 अरब डॉलर से भी अधिक विदेशी मुद्रा, विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमाओं में भेज दी। जानकारों का मानना है कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि भारतवंशियों ने भारत के केंद्रीय बैंक और व्यावसायिक बैंकों में विश्वास जताया है कि उनकी जमाएं सुरक्षित हैं और उन्हें ब्याज तथा मूल की अदायगी का कोई खतरा नहीं है। इस वर्ष के आंकड़े सकल स्थिर पूंजी निर्माण में 11.9% और सकल निजी उपभोग व्यय (जीपीसीई) में 7.1% की वृद्धि दिखा रहे हैं, जो पिछले वर्ष की 6.8% से बेहतर है। यह दर्शाता है कि इस तिमाही में उपभोक्ता व्यय में भी अच्छी वृद्धि हुई है और जीडीपी वृद्धि का फायदा आम आदमी तक पहुंच रहा है। हालांकि, सरकारी व्यय में वृद्धि की दर इस वर्ष की पहली तिमाही में 4.3% रही, जो पिछले वर्ष की 4.5% से मामूली कम है।

सेवाओं का रणनीतिक लाभ और भविष्य की राह

यदि विनिर्माण भारत की नई औद्योगिक शक्ति का प्रतीक है, तो सेवाएं उसकी पुरानी और सिद्ध वैश्विक ताकत हैं। आईटी, वित्तीय सेवाओं, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स, इंजीनियरिंग, परामर्श और डिजिटल सेवाओं तक भारत की भूमिका लगातार बढ़ी है। पहली तिमाही में वित्तीय, रियल एस्टेट और पेशेवर सेवाओं की वृद्धि लगभग 12% रही। यह क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके लिए भारी भौतिक आयात की आवश्यकता नहीं होती। भारतीय प्रतिभा और तकनीकी क्षमता दुनिया के बाजारों तक सेवाएं पहुंचा सकती है, जो भारत को भौतिक आपूर्ति शृंखलाओं के झटकों से सुरक्षा प्रदान करता है।

इस संदर्भ में, ‘आत्मनिर्भरता’ का वास्तविक अर्थ दुनिया से कटना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार में सामर्थ्य के साथ बातचीत करने की क्षमता विकसित करना है। भारत अब वैश्विक विकास के प्रमुख इंजनों में शामिल होने की स्थिति में पहुंच रहा है। इसका आधार केवल 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि नहीं, बल्कि विशाल घरेलू बाजार, तेजी से बढ़ता डिजिटल ढांचा, विश्वस्तरीय सेवा निर्यात, मजबूत होती विनिर्माण क्षमता, और बढ़ती निजी पूंजीगत निवेश की संभावना है। फिर भी, महंगा तेल भारत के लिए बड़ा जोखिम बना हुआ है। सितंबर 2026 में पश्चिम एशिया के तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई, जिससे महंगाई, चालू खाते और परिवहन लागत पर दबाव पड़ सकता है। इसके अलावा, रोजगार की गुणवत्ता, कौशल विकास, कृषि उत्पादकता, ऊर्जा सुरक्षा और निजी निवेश को और व्यापक बनाने की चुनौतियां भी बनी हुई हैं।

अब निजी क्षेत्र की परीक्षा

पिछले दशक की आर्थिक यात्रा का सार यह है कि सरकार ने प्लेटफॉर्म तैयार किया है। अब निजी क्षेत्र को उस पर उत्पादन और निवेश की नई ऊंचाइयां खड़ी करनी हैं। सरकार सड़कें, बंदरगाह और डिजिटल ढांचा उपलब्ध करा सकती है, लेकिन उद्योग, नए व्यवसाय और नवाचार उद्यमियों को ही खड़े करने होंगे। पहली तिमाही में निजी निवेश के बढ़ते संकेत इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यदि यह प्रक्रिया जारी रहती है, तो भारत की विकास यात्रा एक नए चरण में प्रवेश कर सकती है। भारत को चीन नहीं, बल्कि भारत बनना है। भारत की ताकत युवा आबादी, उद्यमशीलता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, सेवाक्षमता, तकनीकी प्रतिभा, विशाल बाजार और सांस्कृतिक विविधता के संयोजन में है। अतः भारत का आर्थिक मॉडल केवल कारखानों की चिमनियों से परिभाषित नहीं होगा। यहां कारखाने भी होंगे और कोड लिखने वाले इंजीनियर भी, बंदरगाह भी होंगे और डिजिटल भुगतान भी। यही भारत का विशिष्ट विकास मॉडल हो सकता है-विनिर्माण और सेवाओं का संगम, भौतिक और डिजिटल अवसंरचना का मेल, तथा घरेलू मांग और वैश्विक बाजारों का संतुलन।

संकट में अवसर देखने वाला भारत

दुनिया डगमगा रही है। कहीं युद्ध है, कहीं व्यापार तनाव। तेल महंगा है और वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं में फंसी है। ऐसे समय में भारत की चुनौती केवल बाहरी झटकों से स्वयं को बचाने की नहीं, बल्कि अपनी आर्थिक शक्ति को इतना निर्णायक बनाने की है कि दुनिया अपने आर्थिक भविष्य की कल्पना भारत की भागीदारी के बिना न कर सके। सेमीकंडक्टर से लेकर फार्मा, रक्षा से लेकर डिजिटल भुगतान, और आईटी सेवाओं से लेकर अंतरिक्ष-भारत लगभग हर रणनीतिक क्षेत्र में अपनी क्षमता का विस्तार कर रहा है। जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं पुनर्गठित हो रही हैं, भारत के सामने नए उत्पादन केंद्र के रूप में उभरने का अवसर है। जब दुनिया विश्वसनीय डिजिटल प्रणालियों की तलाश में है, भारत अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की शक्ति के साथ सामने है।

7.8 प्रतिशत की आर्थिक वृद्धि इसी बदलती तस्वीर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, अंतिम मंजिल नहीं। निवेश में तेजी, विनिर्माण का विस्तार, सेवाओं की मजबूती और घरेलू मांग की निरंतरता बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-गति अब केवल वैश्विक परिस्थितियों की मोहताज नहीं रही। भारत की असली शक्ति यही है-वह संकट में केवल बचने की कोशिश नहीं करता, बल्कि उसी संकट में अपने लिए नई संभावनाएं तलाशता है।

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डॉ. अश्वनी महाजन
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