यह श्लोक केवल एक प्राचीन सूक्ति नहीं, बल्कि आधुनिक भारत और वैश्विक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक जीवन-दर्शन है:-
श्लोक –
राष्ट्रस्योत्थानपतने राष्ट्रियानवलम्ब्य हि।।
भवतस्सर्वदा तस्माच्छिक्षणीयास्तु राष्ट्रियाः॥
भावार्थ-
राष्ट्र का उत्थान (उन्नति/प्रगति) और पतन (अवनति/विनाश) पूर्णतः उस राष्ट्र के नागरिकों पर ही निर्भर करता है। इसीलिए, राष्ट्र के नागरिकों को सदैव (सच्ची, चरित्रनिर्माणकारी और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत) शिक्षा दी जानी चाहिए।
आज के समय में प्रासंगिकता-
- नागरिक ही राष्ट्र की शक्ति हैं: किसी देश की पहचान केवल उसकी सीमाओं, नदियों या इमारतों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के आचरण, विचार और कर्मों से होती है। यदि नागरिक जागरूक और अनुशासित हैं, तो राष्ट्र प्रगति करता है।
- शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य: आज की शिक्षा प्रणाली अक्सर केवल डिग्री और रोजगार (आजीविका) तक सीमित हो गई है। यह श्लोक याद दिलाता है कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य ‘नागरिक निर्माण’ और चरित्र-निर्माण होना चाहिए, जिससे व्यक्ति में राष्ट्रहित प्रथम की भावना जागे।
- संस्कार और राष्ट्रीय चेतना: जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति सतर्क रहते हैं, तभी कोई देश मजबूत बनता है। आपराधिक प्रवृत्तियों, भ्रष्टाचार और सामाजिक विभाजन को रोकने का एकमात्र दीर्घकालिक उपाय नागरिकों का सही शिक्षण और मार्गदर्शन है।
- भविष्य की नींव: आज के युवा ही कल का भारत गढ़ेंगे। यदि उन्हें मूल्य-आधारित (Value-based) और राष्ट्र-केंद्रित शिक्षा दी जाए, तो देश हर प्रकार की आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना कर सकता है।

















