खेल की जड़ें प्राचीन क्रीड़ा-परंपरा, साधना, अनुशासन और चरित्र-निर्माण में हैं। बदलते दौर में यही विरासत भारत की आधुनिक खेल-दृष्टि को नई दिशा दे सकती है। साबरमती संवाद में क्रीड़ा भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री प्रसाद महानकर से खेल के इन आयामों पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्यांश
भारत की खेल संस्कृति की मूल प्रकृति क्या रही है? क्या हमारी परंपरा में खेल केवल मनोरंजन और शारीरिक अभ्यास तक सीमित रहे हैं?
हमारी परंपरा में खेल संस्कृति विरासत में मिली है, भले ही उनके स्वरूप बदलते रहे हों। हमारी परंपरा में हजारों प्रकार के खेल और शारीरिक गतिविधियां रही हैं, जिनका उद्देश्य केवल स्वास्थ्य नहीं, बल्कि व्यक्ति का समग्र विकास था। अधिकांश आधुनिक खेल कभी न कभी युद्ध-कला का हिस्सा रहे होंगे। रामायण काल से ही विविध युद्ध-कौशल और शारीरिक कलाएं प्रचलित थीं। कृष्ण को मथुरा में मल्लयुद्ध के लिए आमंत्रित किया गया, जहां चाणूर का मर्दन और कंस का वध हुआ। यह भी युद्ध-कला का ही रूप था। हमारी विरासत में रथ, ऊंट, हाथी और घोड़ों की दौड़, भाले से लक्ष्य-भेदन जैसी स्पर्धाएं और उनके मैदान भी रहे हैं, जिनके संदर्भ आज भी विद्यमान हैं।
आधुनिक खेलों के दौर में भारतीय खेल-दृष्टि के समग्र स्वरूप को किस तरह स्थापित किया जा सकता है?
मन, शरीर और बुद्धि का समन्वय आवश्यक है। शरीर को मेहनत से, मन को संस्कारों से और बुद्धि को इन दोनों के सामंजस्य से विकसित किया जा सकता है। आज खेल केवल प्रदर्शन, पदक और जीत तक सीमित हो गए हैं, पर इसका उद्देश्य केवल जीतना नहीं, बल्कि शरीर, मन और बुद्धि का समग्र विकास है। इतिहास गवाह है कि जो केवल शारीरिक प्रदर्शन पर टिका रहा, वह एक स्तर के बाद पीछे छूट गया; जबकि जिसने तीनों का समन्वय बनाया, वह देश का गौरव बना।
क्या भारत की पारंपरिक खेल-दृष्टि आधुनिक विश्व के लिए एक विशिष्ट खेल मॉडल प्रस्तुत कर सकती है?
जैसे ‘गुजरात मॉडल’ विकास के लिए चर्चित है, वैसे ही खेलों में भी गुजरात का ऐतिहासिक योगदान रहा है। धोलावीरा में प्राचीन स्टेडियम और पाटन के पास डेडमल में लिखा ‘मल्ल पुराण’ (विश्व का सबसे पुराना खेल-ग्रंथ) इसी के प्रमाण हैं। 13वीं से 16वीं शताब्दी में यह क्षेत्र जेठी कुश्ती के लिए प्रसिद्ध था। भारत में कई खेलों की शुरुआत और विकास गुजरात से जुड़ा है। योग, जो कभी शरीर-मन की साधना था, आज खेल बन चुका है; उसकी पहली विश्व चैंपियनशिप गुजरात में हुई। मल्लखंभ, एक पारंपरिक शरीर-साधना पद्धति, आज 30-32 देशों में अभ्यास हो रहा है और उसके खिलाड़ियों को पद्मश्री, अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार मिल चुके हैं। 2036 तक कबड्डी और योगासन को ओलंपिक में लाने तथा कुश्ती जैसे भारतीय खेलों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के प्रयास चल रहे हैं। ‘मल्ल पुराण’ में कुश्ती के अनेक रूपों का उल्लेख दर्शाता है कि पारंपरिक खेल कैसे आधुनिक स्वरूप ले रहे हैं। भारत आगे बढ़ रहा है और अगले दस वर्ष में और अधिक अंतरराष्ट्रीय सफलता की संभावना है।
‘क्रीड़ा’ और ‘साधना’ का क्या संबंध है? क्या खेल का लक्ष्य केवल जीत और रिकॉर्ड बनाना है?
साधना से क्रीड़ा में विजय और क्रीड़ा से व्यक्तित्व-चरित्र का निर्माण होता है। शीर्ष स्थान या गोल्ड मेडल के लिए निरंतर प्रयास ही साधना है। रिकॉर्ड तो टूटते रहते हैं, असली लक्ष्य आदर्श सृजित करना और लोगों के मन जीतना है। खिलाड़ी ‘सेलिब्रिटी’ बनते हैं, पर यदि चरित्र से नहीं जीत पाए, तो खेल से संबंध भले रहे, साधना से संबंध टूट जाता है। कई बार प्रतिद्वंद्वी के गिरने पर सहयोगी रुक जाता है और तालियां उसी के लिए बजती हैं। ओलंपिक का मूल मंत्र ‘सहभागिता’ है-‘स्पीड’ और ‘टुगेदरनेस’ के साथ केवल रिकॉर्ड नहीं, बल्कि भागीदारी बढ़ाना। अत: क्रीड़ा और उसकी साधना को व्यक्तित्व, चरित्र और सामूहिक भावना के निर्माण के साधन के रूप में देखना उचित है।
भारत में खेल प्रतिभा की कमी नहीं, लेकिन अवसरों की असमानता एक बड़ी चुनौती है। ‘टैलेंट सिलेक्शन’ के बजाय ‘टैलेंट जस्टिस’ कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है?
भारत में खेल संरचना है, पर सिलेक्शन और ट्रायल अक्सर फेडरेशनों के हाथों में होते हैं। प्रक्रिया जितनी पारदर्शी, खेल-भावना से युक्त और डिजिटल होगी, उतना ही ‘टैलेंट जस्टिस’ संभव होगा। जमीनी स्तर पर सेवा-भाव से काम करने वाले कोच ही प्रतिभा को तराशते हैं। दुर्भाग्य से कोच कहते हैं, ‘ये मेरे खिलाड़ी हैं’, जबकि खिलाड़ियों को कहना चाहिए, ‘यह मेरा कोच है, जिसके कारण मैं खेल से जुड़ा।’ प्रतिभा को शीर्ष तक पहुंचाने के लिए तीन स्तरीय सेतु चाहिए-क्रीड़ा भारती जैसे सामाजिक संगठन, स्कूल-नेशनल-यूनिवर्सिटी गेम्स जैसी संस्थागत व्यवस्था और प्रशासनिक सुधार। जब तक प्राथमिक शिक्षक, स्कूल टीचर और पीटीआई को व्यवस्था में शामिल नहीं किया जाएगा और व्यवस्था उनके पास नहीं पहुंचेगी, तब तक सिलेक्शन पूरी तरह न्यायसंगत नहीं होगा। ऐसे सेतुओं की संख्या बढ़ानी होगी, ताकि खिलाड़ी शीर्ष तक पहुंचते-पहुंचते दम न तोड़ें। तभी ‘सिलेक्शन’ के साथ ‘जस्टिफिकेशन’ भी होगा और अधिक प्रतिभाएं सही मार्गदर्शन पाकर ऊपर तक पहुंचेंगी।
किसी खिलाड़ी की उपलब्धि केवल उसकी व्यक्तिगत सफलता नहीं होती। छोटे शहर से आए विजेता की एक तस्वीर के पीछे समाज और परिवार के कितने अनकहे योगदान छिपे होते हैं?
खिलाड़ी की उपलब्धि के पीछे अनेक कहानियां होती हैं। मीराबाई चानू के मेडल और सेलिब्रिटी बनने के बाद भी उनके परिवार का संघर्ष टीवी पर दिखा। हरियाणा में कुश्ती प्रतियोगिताओं में माता-पिता या पड़ोसी घी का डब्बा लाते हैं। चॉकलेट-बिस्किट से लेकर थार गाड़ी तक-समाज ही खिलाड़ी के पीछे खड़ा होता है। मेडल तक पहुंचाने में केवल कोच या व्यवस्था नहीं, बल्कि पूरा समाज भागीदार होता है। दिल्ली-एनसीआर में ग्रेटर नोएडा के पास दनकौर में 103 साल पुरानी परंपरा है, जहां कला और क्रीड़ा का संगम होता है। एक मेले में 2700 पहलवान भाग लेते हैं। ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट रवि दहिया उसी क्षेत्र के हैं। इसे ‘द्रोण की नगरी’ कहा जाता है। यहां एकलव्य द्वारा बनाई गई द्रोणाचार्य की 8-9 इंच की प्रतिमा आज भी विद्यमान है और उसके सामने वही प्राचीन व्यायाम-मैदान है, जहां द्रोणाचार्य शिक्षा देते थे।
भारतीय परंपरा में सच्ची खेल-विजय की परिभाषा क्या हो सकती है? क्या हार और जीत से परे भी खेल का कोई धर्म है?
‘हार हुई तो मत घबराना, विजय मिली तो मत इतराना; आज रुके तो कल बढ़ जाना।’ यह वृत्ति भारतीय दर्शन है। एक स्पर्धा में हारना अंतिम हार नहीं; बल्कि जिससे हारे, उसे गले लगाना ही खेल-धर्म है। महाभारत में दिन भर युद्ध होता था, पर रात को शिविरों में जाकर एक-दूसरे से ज्ञान लेने की परंपरा थी। आज भी ड्रेसिंग रूम में प्रतिद्वंद्वी मिलते हैं। हार-जीत चलती रहेगी, पर उसे खेल-दृष्टि और खेल-धर्म से देखना चाहिए।
यही भारतीय परंपरा है-प्रतिस्पर्धी से भी विद्या प्राप्त करना, सीखना और उसे सम्मान देना।
क्या भारत की खेल-दृष्टि केवल बाजार और पदकों तक सीमित रहनी चाहिए, या भारत अपनी विशिष्ट राष्ट्रीय खेल-दृष्टि दुनिया के सामने रख सकता है?
विजय पाना सबका लक्ष्य है, पर विजय कैसे पाई जाए-यह अधिक महत्वपूर्ण है। 2036 के ओलंपिक के लिए अमदाबाद और गुजरात केंद्र में हैं। खेल मंत्रालय और स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया के तहत 10 वर्षीय रोडमैप से तैयारियां तेज हैं। हरियाणा जैसे राज्यों ने 2036 तक 36 मेडल का लक्ष्य तय किया है। प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन और खेल मंत्री की सक्रियता से चिंतन शिविर और योजनाएं चल रही हैं। ‘अतिथि देवो भव’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भारतीय संस्कृति के अनुरूप आने वाले खिलाड़ियों और अतिथियों का हृदय जीतना भी उतना ही जरूरी है। आगमन से प्रस्थान तक का प्रबंधन, अस्पताल व्यवस्था और भारतीय वालंटियर्स के साथ संवाद-सब एक सुव्यवस्थित सिस्टम में होगा। इसका परीक्षण संभवतः 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स में होगा। केवल मेडल टैली में शीर्ष पर रहना ही नहीं, बल्कि खेल-भावना, पुरुषार्थ और विजिगीषु वृत्ति से विश्व का मन जीतना भी भारत की तैयारी का अभिन्न अंग है।

















