गत 20 सितंबर को भोपाल के लाल परेड मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर स्वयंसेवकों का विराट एकत्रीकरण हुआ। अनुशासन, संगठन और राष्ट्रभाव से ओतप्रोत इस आयोजन में लगभग 30 हजार स्वयंसेवकों के साथ समाज से करीब 5,000 मातृशक्ति एवं महानुभाव सहभागी हुए। कार्यक्रम में संघ की शताब्दी यात्रा, समाज के साथ किए गए विभिन्न संपर्क एवं सेवा कार्यों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया।
स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और यह प्रगति अनेक आयामों में दिखाई दे रही है। भारत का आगे बढ़ना केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि मानवता के लिए भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज विश्व में भारत की उपलब्धियों को अनेक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। विज्ञान, अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में भारतीय वैज्ञानिकों ने देश का नाम आगे बढ़ाया है। इसके साथ ही विश्व के अनेक हिस्सों में भारत को लेकर उत्सुकता के साथ सम्मान, श्रद्धा और गौरव का भाव भी दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के परम वैभव के ध्येय को लेकर कार्य कर रहा है। यह यात्रा किसी एक उपलब्धि पर समाप्त होने वाली यात्रा नहीं है। समाज संगठन और व्यक्ति के चरित्र निर्माण का कार्य निरंतर चलता रहने वाला है।
‘अविनाशी और मृत्युंजय राष्ट्र’ भारत
उन्होंने कहा कि भारत की लगभग पांच हजार वर्ष की सभ्यतागत यात्रा में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा रहा हो, भारत हर बार उससे उबरकर आगे बढ़ा है। उन्होंने कहा कि भारत ने विभिन्न कालखंडों में संकटों और संघर्षों का सामना किया, लेकिन समाज की जीवनशक्ति समाप्त नहीं हुई। उन्होंने कहा कि दुनिया में अनेक ऐसी सभ्यताएं और राष्ट्र रहे हैं, जो कभी शक्तिशाली थे, लेकिन आज उनका स्मरण इतिहास में होता है या उनके अवशेष संग्रहालयों में दिखाई देते हैं। इसके विपरीत भारत आज भी एक जीवंत समाज के रूप में खड़ा है। उन्होंने भारत को ‘अविनाशी और मृत्युंजय राष्ट्र’ बताते हुए कहा कि किसी समाज की वास्तविक शक्ति इस बात में नहीं होती कि उसके सामने समस्याएं आती हैं या नहीं। महत्वपूर्ण यह है कि समस्याओं के सामने खड़े होने और उनका सामना करने का सामर्थ्य समाज के भीतर कितना है।

हम स्वयं को भूल गए थे
श्री होसबाले ने कहा कि लंबे समय तक चले पराधीनता के कालखंड में भारतीय समाज के भीतर अपने स्वरूप और सामर्थ्य को लेकर विस्मृति आई। उन्होंने कहा कि समाज की आंतरिक शक्ति, राष्ट्रीय भाव और अपने दायित्व को लेकर जो सजगता होनी चाहिए थी, वह कमजोर हुई। आपसी राग-द्वेष, संघर्ष और सामाजिक कुरीतियों के कारण भी समाज की एकता प्रभावित हुई। जब समाज अपने इतिहास, संस्कृति और सामूहिक दायित्व को भूलता है तो उसकी शक्ति कमजोर होती है। इसी संदर्भ में उन्होंने संघ की स्थापना के पीछे डॉ. हेडगेवार की दृष्टि का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने विचार किया कि भारत ने इतिहास में ऐसे कालखंड देखे हैं, जब वह भौतिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में उन्नति के शिखर पर था और विश्व में उसका प्रभाव था। फिर ऐसी स्थिति क्यों आई कि समाज पराधीन हो गया? इसका एक कारण यह था कि समाज अपने राष्ट्रभाव, अपनी भूमिका और अपने सामूहिक दायित्व को भूल गया था। इसी विस्मृति से बाहर निकालने के लिए व्यक्ति निर्माण और समाज संगठन को केंद्र में रखकर कार्य प्रारंभ किया गया।
‘युवा के भीतर की संवेदना को समझें’
भोपाल प्रवास के दौरान श्री होसबाले ने ‘समाज सेवा न्यास’ द्वारा आयोजित छात्र संवाद में भी भाग लिया। उनके साथ मध्य भारत प्रांत संघचालक श्री अशोक पांडेय तथा भोपाल विभाग संघचालक श्री सोमकांत उमालकर मंचस्थ रहे। छात्र संवाद में 250 विद्यार्थी व प्राध्यापक भी थे। कार्यक्रम में राम जन्मभूमि संघर्ष पर आधारित डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया। विद्यार्थियों ने सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक, तकनीकी और राष्ट्रीय विषयों से जुड़ी 11 जिज्ञासाएं रखीं। उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए श्री होसबाले ने कहा कि नई पीढ़ी का प्रश्न पूछना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। युवाओं के प्रश्नों को सुनने, समझने और संवाद के माध्यम से उत्तर देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी युवा को उसके बाहरी स्वरूप या विचारों के आधार पर देखने के बजाय उसके भीतर की संवेदना और सकारात्मक शक्ति को समझना चाहिए।
युवाओं से संवाद होना चाहिए
सोशल मीडिया और वैचारिक ‘इको चैंबर’ के दौर में युवाओं से जुड़ने के प्रश्न पर श्री होसबाले ने कहा कि आज पीढ़ियों को ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ जैसे नामों से परिभाषित किया जाता है, जबकि स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को ‘युवा भारत’ कहा था। उन्होंने कहा कि नरेंद्र के रूप में स्वामी विवेकानंद ने भी प्रश्न किए थे और नचिकेता का प्रश्न करना भारतीय परंपरा में प्रसिद्ध है। इसलिए नई पीढ़ी सत्ता, समाज या किसी संस्था से प्रश्न करती है तो उसे गलत नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि युवाओं के प्रश्नों को सुनना और संवाद में जुड़ना चाहिए। केवल प्रश्न पूछने के कारण किसी को अस्वीकार करने के बजाय उसकी बात समझने का प्रयास होना चाहिए।
मानसिक स्वतंत्रता भी जरूरी
भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो चुका है, लेकिन ‘डिकोलोनाइजेशन ऑफ माइंड’ की प्रक्रिया अभी जारी है। भारतीय सभ्यता के मूल्यों, दृष्टि और शब्दावली पर अधिक शोध की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने ‘धर्म’ की अवधारणा का उदाहरण दिया। उनके अनुसार भारतीय दृष्टि को समझने के लिए इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और सामाजिक विज्ञान सहित विभिन्न क्षेत्रों में अध्ययन आवश्यक है। विद्यार्थियों के बीच वैचारिक वातावरण बदलने के उपाय पर उन्होंने स्वाध्याय मंडल, ग्रुप डिस्कशन और राष्ट्रहित से जुड़ी रचनात्मक गतिविधियां शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने बेंगलुरु के विद्यार्थियों के ‘नमो भारती’ कार्यक्रम का उदाहरण देते हुए कहा कि छोटी-छोटी गतिविधियों के माध्यम से भी सकारात्मक वातावरण बनाया जा सकता है।
तकनीक को अपने नियंत्रण में रखें
डिजिटल युग में संघ के कार्यों और तकनीक के उपयोग से जुड़े प्रश्न पर श्री होसबाले ने कहा कि मूल विचार और मूल्य स्थायी होते हैं, लेकिन समय के साथ उपलब्ध साधनों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग किया जाए, लेकिन वहां क्या और किस उद्देश्य से प्रसारित किया जा रहा है, यह व्यक्ति के संस्कार और विवेक पर निर्भर करता है। तकनीक मानवता, राष्ट्र, पर्यावरण और इतिहास के लिए लाभकारी होनी चाहिए तथा मनुष्य तकनीक का गुलाम बनने के बजाय उसे अपने नियंत्रण में रखे।
विमर्श के शस्त्र तर्क, सत्य और अध्ययन
वैचारिक संघर्ष के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि यदि इसे ‘विमर्श युद्ध’ कहा जा रहा है तो उसके लिए प्रभावी साधन भी आवश्यक हैं। इसके लिए तर्क, सत्य और अध्ययन पर आधारित हों, अपनी बात रखने में स्पष्टता हो, प्रभावी माध्यमों का उपयोग किया जाए और इसके लिए प्रशिक्षण भी हो। शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टि के स्थान से जुड़े प्रश्न पर उन्होंने कहा कि इतिहास, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और सामाजिक विज्ञान के कई क्षेत्रों में भारत को लंबे समय तक पश्चिमी दृष्टि से देखने का प्रयास हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज की कुरीतियों को स्वीकार करते हुए उनके सुधार के प्रयास जरूरी हैं, लेकिन समाज की सकारात्मक उपलब्धियों और परंपराओं का भी वस्तुनिष्ठ अध्ययन होना चाहिए।
भ्रष्टाचार से पहले स्वयं लड़ें
भ्रष्टाचार पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि व्यवस्था में सुधार जरूरी है, लेकिन इसकी शुरुआत व्यक्ति के अपने जीवन से होनी चाहिए। स्वयंसेवकों को पहले स्वयं भ्रष्टाचार से मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए और समाज में भी इसके विरुद्ध जागरूकता विकसित करनी चाहिए।
शिक्षित वर्ग की जिम्मेदारी
उन्होंने कहा कि विद्यार्थी और प्राध्यापक समाज का सुशिक्षित वर्ग हैं, इसलिए उनकी जिम्मेदारी भी अधिक है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की शिक्षा में समाज का योगदान होता है, इसलिए शिक्षा को केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम न मानकर समाज के प्रति दायित्व से जोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत जिम्मेदारियों और समाज के प्रति दायित्व के बीच समन्वय ही धर्म का एक महत्वपूर्ण स्वरूप है। समाज को आत्मविश्वास के साथ सामर्थ्यवान भी बनना होगा, लेकिन यह शक्ति मानवता और राष्ट्र के हित के लिए होनी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से यह विचार करने का आह्वान किया कि समाज के प्रति उनके भीतर कितनी गहरी संवेदना है और उस संवेदना को कार्य में बदलने की उनकी क्या योजना है।
हनुमान और जामवंत का उदाहरण
श्री होसबाले ने हनुमान जी और जामवंत का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कभी-कभी व्यक्ति अपनी शक्ति को भूल जाता है। जब सीता जी की खोज के लिए समुद्र पार करने का प्रश्न सामने आया तो वानर दल में अलग-अलग लोग अपनी क्षमता बता रहे थे, लेकिन निर्णायक छलांग लगाने का साहस किसी में नहीं था। उस समय जामवंत ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया और इसके बाद हनुमान जी ने समुद्र लांघा। हिंदू समाज भी कई बार अपनी शक्ति और सामर्थ्य को भूल जाता है। ऐसे समय समाज के भीतर से कोई महापुरुष, कोई विचार या कोई संगठन उसे उसकी शक्ति का बोध कराता है। डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना के समय इसी प्रकार समाज की अंतर्निहित शक्ति को जागृत करने का प्रयास किया।
राम, बुद्ध और महावीर की भूमि
श्री होसबाले ने कहा कि भारत की पहचान केवल उसके भूगोल से नहीं होती। यह केवल भूमि का एक टुकड़ा या एक राज्य व्यवस्था मात्र नहीं है। यह ऐसी सभ्यता है, जिसने जीवन को केवल भौतिक सुख और उपभोग तक सीमित नहीं माना। यह राम, बुद्ध और महावीर की भूमि है। इसका अर्थ है कि यह शील और चरित्र की भूमि है। भारतीय चिंतन में व्यक्ति के चरित्र निर्माण को अत्यंत महत्व दिया गया है। इसीलिए संघ की शाखा के माध्यम से व्यक्ति के चरित्र निर्माण और समाज में संगठन के भाव को जागृत करने का प्रयास किया जाता है। उन्होंने कहा कि शाखा केवल शारीरिक अभ्यास का स्थान नहीं है। वहां व्यक्ति अपने से आगे बढ़कर समाज और राष्ट्र के बारे में विचार करना सीखता है।
नागरिक की जिम्मेदारी
श्री होसबाले ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि वह इस राष्ट्र का नागरिक है और इसलिए उसकी भी जिम्मेदारी है। प्रतिदिन यह विचार होना चाहिए कि अपने गांव, मोहल्ले, कार्यक्षेत्र और समाज के लिए वह राष्ट्रहित में क्या कर सकता है। उन्होंने कहा कि देशभक्ति केवल 26 जनवरी, 15 अगस्त या किसी विशेष अवसर पर प्रकट होने वाला भाव नहीं है। देशभक्ति का अर्थ है कि व्यक्ति के जीवन में 24 घंटे राष्ट्र के प्रति दायित्व का भाव बना रहे। उन्होंने कहा कि अपने कार्य को ईमानदारी से करना, समाज के लिए समय देना, जरूरतमंद की सहायता करना, अपने आसपास के वातावरण को बेहतर बनाना और राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर निर्णय लेना भी नागरिक दायित्व का हिस्सा है।
कोविड में दिखी सामूहिक शक्ति
श्री होसबाले ने कोविड महामारी का उल्लेख करते हुए कहा कि उस कठिन समय में स्वयंसेवकों और समाज ने मिलकर अनेक सेवा कार्य किए। संकट के समय समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ आए और आवश्यकता के अनुसार सेवा के कार्यों में सहभागी बने। उन्होंने कहा कि राष्ट्रभक्ति या सेवा केवल स्वयंसेवकों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को संकट के समय आगे आना चाहिए। संघ का प्रयास समाज की इसी सामूहिक शक्ति को जागृत करना है। उन्होंने असम में आई बाढ़ के दौरान सेवा भारती के स्वयंसेवकों द्वारा किए गए राहत कार्यों का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्वयंसेवक राहत और सहायता के कार्य में जुटे थे और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग भी प्रभावित परिवारों की सहायता के लिए आगे आए।
सकारात्मक बदलाव का आधार
श्री होसबाले ने कहा कि पिछले एक वर्ष में देशभर में छोटे-बड़े कार्यक्रमों के माध्यम से यह विचार किया गया कि समाज के साथ मिलकर कौन-कौन से सकारात्मक कार्य किए जा सकते हैं। इसी चिंतन से पंचपरिवर्तन का विचार समाज के सामने रखा गया। उन्होंने पंचपरिवर्तन में सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य, स्वबोध, पर्यावरण संरक्षण और कुटुंब प्रबोधन को प्रमुखता से बताया। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता का अर्थ है कि समाज के भीतर जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र के आधार पर दूरी कम हो। नागरिक कर्तव्य का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने दायित्वों को भी समझे। स्वबोध के माध्यम से व्यक्ति और समाज को अपनी सभ्यता, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का ज्ञान हो। पर्यावरण संरक्षण के माध्यम से प्रकृति के प्रति दायित्व निभाया जाए और कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से परिवार को संस्कार एवं सामाजिक मूल्यों का केंद्र बनाए रखा जाए। उन्होंने कहा कि ये पांचों विषय समाज के जीवन से जुड़े हुए हैं और इनके माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा तैयार की जा सकती है।
गांव और बस्ती का विकास
उन्होंने कहा कि गांव और बस्ती के विकास की जिम्मेदारी केवल शासन-प्रशासन की नहीं हो सकती। वहां रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की भी भूमिका है। उन्होंने कहा कि यदि किसी गांव में शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य या अन्य किसी क्षेत्र में कमी है तो केवल सरकार से अपेक्षा करने के बजाय समाज को भी अपनी क्षमता के अनुसार प्रयास करना चाहिए। सामूहिक जिम्मेदारी की यह भावना गांव और बस्ती को आत्मनिर्भर और सशक्त बना सकती है। उन्होंने कहा कि समाज को अपनी नई पीढ़ी को रामायण, महाभारत, संतों की वाणी और गुरुओं के उपदेशों से परिचित कराना चाहिए। इन परंपराओं में जीवन, कर्तव्य, त्याग, सेवा और चरित्र निर्माण के अनेक संदेश हैं। परिवार और समाज को इन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए।
स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क
श्री होसबाले ने कहा कि स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन एक-दूसरे से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि पहले गांवों और कस्बों में व्यायामशालाएं हुआ करती थीं। संघ ने इस परंपरा को अपनी गतिविधियों के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि शरीर को सशक्त और बुद्धि को जागृत रखने के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। केवल विचारों से व्यक्ति मजबूत नहीं होता, उसके शरीर और मन दोनों का स्वस्थ होना जरूरी है। कार्यक्रम में हुए सामूहिक आसन और योग प्रदर्शन को भी उन्होंने इसी व्यापक दृष्टि से जोड़ते हुए शारीरिक अनुशासन और स्वस्थ जीवनशैली को समाज की आवश्यकता बताया।

संगठन की शक्ति
उन्होंने सामाजिक संगठन के महत्व को समझाते हुए कहा कि जाति, पंथ, भाषा और प्रांत के आधार पर स्वयं को अलग-अलग मानने से समाज की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है। यदि चार उंगलियां अलग-अलग रहें तो वे सीमित शक्ति रखती हैं, लेकिन जब वे एक साथ मिलकर मुट्ठी बनती हैं तो उनकी शक्ति कई गुना बढ़ जाती है। यही संगठन की शक्ति है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में एकता का अर्थ विविधताओं को समाप्त करना नहीं है, बल्कि उन विविधताओं के बावजूद स्वयं को एक बड़े राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा मानना है। उन्होंने कहा कि हम सभी एक विशाल भारत परिवार के सदस्य हैं। ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना भारत की व्यापक दृष्टि को व्यक्त करती है। इसलिए समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ना और एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनना आवश्यक है।
प्रतिदिन एक घंटा समाज के लिए
श्री होसबाले ने कहा कि समाज संगठन कोई एक दिन का काम नहीं है। जिस प्रकार किसी खिलाड़ी या धावक को अपनी क्षमता बनाए रखने के लिए प्रतिदिन अभ्यास करना पड़ता है, उसी प्रकार समाज संगठन के लिए भी निरंतर प्रयास आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी धावक के लिए प्रतिदिन दौड़ने का अभ्यास करना हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन निरंतर अभ्यास के बिना वह अपनी क्षमता विकसित नहीं कर सकता। इसी प्रकार समाज को संगठित करना सरल दिखाई दे सकता है, लेकिन उसे निरंतर करते रहना अनुशासन और धैर्य मांगता है। उन्होंने गांव, मोहल्ले और बस्ती के स्तर पर प्रतिदिन कुछ समय समाज के साथ बिताने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाज संगठन के लिए निस्वार्थ भाव से प्रतिदिन एक घंटा भी दिया जाए तो उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
संघ समाज का ही अंग
सरकार्यवाह ने कहा कि संघ समाज का ही एक अंग है। समाज की शक्ति को संगठित करना, व्यक्ति में चरित्र निर्माण करना और समाज को अपने दायित्व के प्रति जागृत करना उसके कार्य का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है। व्यक्ति निर्माण से समाज संगठन और समाज संगठन से राष्ट्र निर्माण की यात्रा निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि भारत के परम वैभव का अर्थ केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति नहीं है। भारत का परम वैभव ऐसा समाज खड़ा करने में है, जो चरित्रवान, सक्षम, संगठित, संवेदनशील और अपने दायित्व के प्रति जागरूक हो।
मानवता के लिए समाज शक्तिशाली हो
श्री होसबाले ने कहा कि समाज में केवल आत्मविश्वास पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामर्थ्य और क्षमता भी आवश्यक है। एक शक्तिशाली समाज का उद्देश्य किसी अन्य समाज या व्यक्ति को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि मानवता की स्थापना और मानव जीवन के विकास में योगदान करना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा में शक्ति को हमेशा लोककल्याण से जोड़ा गया है। इसलिए समाज की शक्ति का उपयोग मानवता, राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा तथा विकास के लिए होना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसके साथ देश के नागरिकों के भीतर आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।
संघ कार्य की कोई सीमा नहीं
उन्होंने कहा कि संघ के कार्य का कोई अंतिम बिंदु निर्धारित नहीं है। जब तक समाज में व्यक्ति निर्माण और संगठन की आवश्यकता रहेगी, तब तक यह कार्य किसी न किसी रूप में चलता रहेगा। उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष किसी यात्रा का अंत नहीं, बल्कि आगे की यात्रा के लिए आत्मचिंतन और संकल्प का अवसर है। पिछले 100 वर्ष के कार्य से प्राप्त अनुभवों के आधार पर भविष्य के समाज के लिए नए प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत के पुनरुत्थान की यात्रा में प्रत्येक नागरिक की भूमिका है। भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में देखने के बजाय एक जीवंत सभ्यता और समाज के रूप में समझना होगा।
राष्ट्र निर्माण में दें योगदान
उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण के लिए बड़े पद या विशेष अधिकार की आवश्यकता नहीं है। व्यक्ति जहां है, वहीं से राष्ट्र के लिए योगदान कर सकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षक अपने विद्यार्थियों को अच्छे संस्कार देकर, किसान अपने श्रम से, वैज्ञानिक अपने शोध से, सैनिक अपनी सेवा से, व्यापारी ईमानदारी से व्यापार करके और सामान्य नागरिक अपने आसपास के समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाकर राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकता है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्रति दायित्व को जीवन के सामान्य कार्यों से अलग नहीं किया जा सकता। व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में जिस प्रकार का व्यवहार करता है, वही समाज के वातावरण को भी प्रभावित करता है।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि और एम्स, भोपाल के निदेशक लेफ्टिनेंट जनरल डॉ. नरेंद्र कोतवाल ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण की यात्रा है। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम में उपस्थित होना उनके लिए गौरव का विषय है। संघ का कार्य व्यक्ति से शुरू होकर परिवार, समाज और राष्ट्र तक पहुंचता है। किसी भी राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी भौतिक उपलब्धियों से निर्धारित नहीं होती, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, सामाजिक एकता, कर्तव्यबोध और परस्पर सहयोग से भी निर्धारित होती है। 

















