यह श्लोक संस्कृत के पारंपरिक नीति-साहित्य एवं सामाजिक सुभाषितों से लिया गया है, जो राष्ट्र-निर्माण, सामाजिक एकता और सांगठनिक शक्ति के महत्व का प्रतिपादन करता है।
श्लोक :
संघो ददाति सामर्थ्यं सामर्थ्यात् सर्वयोग्यता।
योग्यत्वाद् यः समुत्कर्षो निरपायः स सर्वथा॥
भावार्थ:
संघ सामर्थ्य प्रदान करता है, सामर्थ्य से सब प्रकार की योग्यता प्राप्त होती है, सब प्रकार की योग्यता के द्वारा जो समुत्कर्ष प्राप्ता होता है, वह सर्वधा विघ्न-रहित होता है।
आज के युग में प्रासंगिकता :
कॉर्पोरेट एवं स्टार्टअप संस्कृति : आज के समय में कोई भी बड़ी कंपनी या स्टार्टअप किसी एक व्यक्ति के बल पर नहीं, बल्कि एक संगठित टीम के माध्यम से सफल होता है। जब प्रतिभाशाली लोग एक साथ संगठित होकर काम करते हैं, तो उनकी सामूहिक शक्ति से नई क्षमताएं (योग्यता) विकसित होती हैं, जो स्थायी और बाधा-रहित सफलता (निरपाय समुत्कर्ष) दिलाती है।
वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका : अंतरराष्ट्रीय संबंधों और व्यापार में अकेले किसी देश की बात का उतना प्रभाव नहीं होता जितना कि ब्रिक्स (BRICS), क्वाड (QUAD) या जी-20 जैसे संगठनों के माध्यम से होता है। सामूहिक शक्ति और बहुपक्षीय जुड़ाव से ही देशों को वैश्विक मंचों पर बेहतर सौदेबाजी और टिकाऊ प्रगति की क्षमता हासिल होती है।
सामाजिक समरसता और राष्ट्र-निर्माण : किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितने एकजुट हैं। बिखरा हुआ समाज अपनी ऊर्जा आंतरिक मतभेदों में गंवा देता है, जबकि संगठित समाज अपनी सामूहिक ऊर्जा से हर चुनौती को पार करते हुए सतत विकास की ओर बढ़ता है।
सतत और बाधारहित विकास : श्लोक के अनुसार बिना योग्यता और बिना संगठन के मिली सफलता क्षणिक या विघ्न-बाधित हो सकती है। लेकिन जो उन्नति सांगठनिक शक्ति, अनुशासन और कड़ी मेहनत की योग्यता से मिलती है, वह हर प्रकार के जोखिम और बाधाओं से सुरक्षित रहती है।

















