“विभाजन के समय मेरी उम्र महज एक साल थी, इसलिए उस दौर की अपनी यादें नहीं हैं। लेकिन जिस तरह हमारा परिवार उजड़ा और बाद में माता-पिता व परिवार से उसके किस्से सुने, उन्होंने विभाजन की एक-एक बात मेरे जहन में बिठा दी। पाकिस्तान के झेलम में हमारा अच्छा-खासा कारोबार और खुशहाल जीवन था। विभाजन आया और एक झटके में सब कुछ पीछे छूट गया।”
मेरा जन्म वर्ष 1946 में जिला झेलम में हुआ था। मेरे पिता मोहिंदर सिंह साहनी और माता वीरां वाली साहनी थे। पिता जी का झेलम में गुड़ की आढ़त और लकड़ी का बहुत बड़ा कारोबार था। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री आई.के. गुजराल के परिवार के साथ भी हमारे परिवार के कारोबारी संबंध थे। झेलम में हमारा और गुजराल परिवार का आढ़त का काम साथ चलता था।
कारोबार अच्छा था और जिंदगी अपनी रफ्तार से चल रही थी, लेकिन 1947 के विभाजन ने सब कुछ बदल दिया। वर्षों की मेहनत से बनाया कारोबार, घर और बसी-बसाई जिंदगी छोड़कर परिवार को भारत आना पड़ा।
विभाजन के बाद हमारा परिवार पठानकोट पहुंचा। जो कुछ पाकिस्तान में था, वह पीछे रह चुका था। यहां जिंदगी फिर से शून्य से शुरू करनी थी। पिता जी ने हिम्मत नहीं हारी और जैसे-तैसे पठानकोट में दोबारा लकड़ी का कारोबार स्थापित किया।
लेकिन पाकिस्तान से उजड़ने का दर्द उनके भीतर हमेशा रहा। मैंने उन्हें उस दौर को याद करते देखा और उनकी बातों से महसूस किया कि इंसान नया घर और कारोबार तो बना सकता है, लेकिन पीछे छूटी जिंदगी की यादों को आसानी से नहीं मिटा सकता।
वर्ष 1967 में मेरी शादी सरदार धनबीर सिंह सूरी के साथ हुई, लेकिन पिता जी मेरी शादी से पहले ही इस दुनिया को छोड़ गए। विभाजन का दर्द उन्हें काफी सताता था। मगर आखिर इंसान कर भी क्या सकता है—जो किस्मत में होता है, वह होकर ही रहता है। आज समय बहुत आगे निकल चुका है। हमारा परिवार, घर-बार और कारोबार सब यहीं है। अब पाकिस्तान में हमारा बचा ही क्या है?
फिर भी झेलम का नाम सुनते ही उस खुशहाल जिंदगी और उजड़े हुए परिवार की कहानी एक बार फिर याद आ जाती है।
सुरिंदर कौर
मूल निवासी : झेलम, पाकिस्तान

















