उत्तराखंड को केवल ‘देवभूमि’ नहीं, बल्कि ‘वीरभूमि’ भी कहा जाता है। इसकी वजह सिर्फ धार्मिक मान्यताएं नहीं, बल्कि हिमालय की इस धरती से निकलकर देश की सीमाओं पर बलिदान देने वाले हजारों सैनिक हैं। अब पुष्कर सिंह धामी सरकार ने इस सैन्य परंपरा को सम्मान देने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला किया है। आजादी के बाद देश की रक्षा में बलिदान होने वाले 1,845 वीर सैनिकों की प्रतिमाएं अब उनके अपने-अपने पैतृक गांवों में स्थापित की जाएंगी। राज्य कैबिनेट ने इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंजूरी दे दी है।
वीरों को सम्मान, पीढ़ियों को सीख
यह कदम महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि शहीदों की स्मृति को अब केवल राजधानी या किसी बड़े केंद्रीय स्मारक तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि उसी मिट्टी तक पहुंचाया जाएगा, जहां से ये जवान राष्ट्रसेवा के संकल्प के साथ निकले थे। जिस गांव की पगडंडी से कोई युवा सेना की वर्दी पहनकर देश की सेवा के लिए गया, उसी गांव में अब उसकी प्रतिमा खड़ी होगी और आने वाली पीढ़ियों को बताएगी कि राष्ट्रभक्ति केवल नारे या किताबों का विषय नहीं, बल्कि जीवन अर्पित करने का सवाल है।
उत्तराखंड की सामाजिक चेतना में ‘सैन्यभूमि’ की पहचान गहराई से रची-बसी है। 1947 के बाद भारत ने पाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों से लेकर 1999 के कारगिल संघर्ष तक अनेक मोर्चे देखे, और इनमें उत्तराखंड के सैनिकों ने बड़ी संख्या में सर्वोच्च बलिदान दिया। कुमाऊं रेजिमेंट और गढ़वाल राइफल्स के अलावा देश की विभिन्न रेजिमेंटों, अर्धसैनिक बलों और पुलिस सेवाओं में भी उत्तराखंड के युवाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही है।
इन 1,845 बलिदानियों में रुद्रप्रयाग (573), पिथौरागढ़ (342), चमोली (260), देहरादून (216), पौड़ी (145), अल्मोड़ा (141), बागेश्वर (113) और नैनीताल (113) सहित प्रदेश के लगभग सभी जिलों के वीर शामिल हैं। कहा जाता है कि उत्तराखंड का हर तीसरा परिवार किसी न किसी रूप में देश की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ है; सेना, अर्धसैनिक बल या पुलिस में बड़ी संख्या में जवान और अधिकारी इस पहाड़ी राज्य से आते रहे हैं। सैनिक सम्मान की इसी भावना के तहत उत्तराखंड सरकार ने परमवीर चक्र विजेताओं के परिवारों के लिए अनुग्रह राशि 1.5 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये करने का भी निर्णय लिया है।
स्मारक से आगे-स्मृति का संस्कार
पलायन की चुनौती झेल रहे पहाड़ी गांवों में बलिदानियों की प्रतिमाएं, वीरगाथाएं और उनके जीवन से जुड़ी कहानियां नई पीढ़ी को जोड़ें, तो ये गांव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और त्याग की जीवंत पाठशालाएं बन सकते हैं।
आज के डिजिटल दौर में बलिदानियों की वीरगाथाओं को केवल सरकारी पुस्तिकाओं या स्मारकों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं। उन्हें गांव की चौपाल, विद्यालय और युवाओं के जीवन से जोड़ना होगा। इसी भावना के तहत मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बलिदानियों की वीरगाथाओं को शैक्षिक पाठ्यक्रम और ‘सैन्य धाम’ पहल से जोड़ने की बात कही है।
बलिदान की प्रतिमा केवल पत्थर, धातु या सीमेंट की आकृति नहीं, बल्कि उस गांव की जीवित स्मृति होती है। वह बच्चों से सवाल करती है कि मातृभूमि के लिए जीवन देने वाले जवान के आदर्शों को वे कैसे आगे बढ़ाएंगे, और युवाओं को याद दिलाती है कि भारत की सीमाएं केवल सैनिकों की बंदूकों से नहीं, बल्कि समाज के संस्कारों से भी सुरक्षित रहती हैं।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उनकी सरकार का उद्देश्य सैनिकों के बलिदान की वीरगाथाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और शहीदों के परिजनों के प्रति सम्मान व्यक्त करना है। इसी उद्देश्य से शहीद सैनिकों की प्रतिमाएं उनके पैतृक गांवों में स्थापित की जाएंगी और उनके बलिदान की गाथा को लोगों तक पहुंचाया जाएगा। सरकार उन्हें शैक्षिक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने की भी योजना बना रही है, ताकि शहीदों की स्मृतियां जीवंत रहें और युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरणा मिले। अग्निवीर योजना के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने कहा कि सेवा अवधि पूरी करने के बाद उन्हें रोजगार उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है। युवा अग्निवीरों को भविष्य को लेकर भटकना न पड़े, इसके लिए मुख्यमंत्री कार्यालय की देखरेख में ‘अग्निवीर रोजगार सेल’ बनाया गया है, जो सेवा समाप्ति के बाद उनकी योग्यता और कौशल के अनुरूप रोजगार के अवसर जुटाने में मदद करेगा। साथ ही, सरकार सेवानिवृत्त सैनिकों को शस्त्र लाइसेंस उपलब्ध कराने का भी विचार कर रही है, ताकि उनके लिए रोजगार के अतिरिक्त अवसर खुल सकें।
श्रद्धा का ‘पांचवां धाम’
उत्तराखंड में सेना केवल रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन और पारिवारिक संस्कारों का हिस्सा रही है। चमोली के सवाड़ जैसे गांव इस सैन्य परंपरा के जीवंत उदाहरण हैं, जहां सैनिकों की स्मृति में संग्रहालय और बलिदान स्मारक तक बनाए गए हैं। इसी भावना का विस्तार देहरादून के निकट गुनियाल गांव में विकसित किए जा रहे ‘सैन्य धाम’ में दिखता है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से राज्य सरकार लगभग चार हेक्टेयर क्षेत्र में बना रही है। यहां शहीदों के पैतृक घर-आंगन की मिट्टी को कलशों में लाकर संरक्षित किया गया है और बलिदानियों की शौर्यगाथाओं को स्थान दिया जा रहा है। लगभग 104 करोड़ रुपये की लागत से विकसित इस सैन्य धाम में संग्रहालय, प्रेक्षागृह और लाइट एंड साउंड शो जैसी सुविधाएं प्रस्तावित हैं, और मुख्य द्वार पर देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत की प्रतिमा स्थापित की गई है। उत्तराखंड में श्रद्धा और सम्मान के साथ इसे ‘पांचवें धाम’ के रूप में देखा जा रहा है।
देश में पहला प्रयोग
सैनिक सम्मान के दूसरे महत्वपूर्ण पक्ष के तहत धामी सरकार ने सेवा अवधि पूरी करके लौटने वाले अग्निवीरों के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय के अधीन ‘अग्निवीर रोजगार सेल’ गठित करने का निर्णय लिया है। इसके लिए छह पद सृजित किए गए हैं। ऐसा रोजगार सेल बनाने वाला उत्तराखंड संभवतः देश का पहला राज्य है।
यह व्यवस्था इसलिए खास है, क्योंकि अग्निवीर केवल रोजगार चाहने वाले युवा नहीं, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण, अनुशासन, तकनीकी दक्षता और कठिन परिस्थितियों में काम करने का अनुभव लेकर समाज में लौटेंगे। ऐसे प्रशिक्षित युवाओं को सुरक्षा सेवाओं, पुलिस, अर्धसैनिक बलों, सरकारी विभागों, निजी क्षेत्र और स्वरोजगार से जोड़ना राज्य की मानव-संपदा को मजबूत करने वाला कदम हो सकता है। रोजगार सेल एक ‘सिंगल विंडो’ की तरह काम करेगा। अग्निवीरों का डेटाबेस तैयार करना, उनकी योग्यता के अनुरूप अवसर खोजना और सरकारी-निजी संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित करना इसका मुख्य काम होगा। राज्य सरकार ने सरकारी सेवाओं में अग्निवीरों के लिए 10 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण का निर्णय भी लिया है।
कर्नल (से.नि.) अजय कोठियाल ने कैबिनेट के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि अग्निवीर रोजगार सेल उनकी योग्यता और कौशल के अनुरूप रोजगार उपलब्ध कराने में सेतु का काम करेगा। सिंगल विंडो सिस्टम के जरिए अग्निवीरों को सेवा अवधि पूरी होने के बाद रोजगार तलाशने में आसानी होगी। सेल सरकारी और गैर-सरकारी, दोनों क्षेत्रों में पुनः रोजगार के लिए उनका डेटाबेस तैयार करेगा। सेवा अवधि पूरी होने के बाद कई अग्निवीर दोबारा सेना में जाने की योजना बना सकते हैं, जबकि केंद्र सरकार अर्धसैनिक बलों और राज्य सरकारें अपनी सुरक्षा एजेंसियों में उन्हें रोजगार देने का लक्ष्य रख रही हैं। ऐसे में रोजगार सेल इन युवाओं को उपलब्ध अवसरों की जानकारी देने और उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
राज्य के गृह सचिव शैलेश बगौली ने बताया कि मुख्यमंत्री धामी द्वारा सेल स्थापना की पूर्व घोषणा को अब कैबिनेट निर्णय से मूर्त रूप दिया गया है। सैनिक कल्याण मामलों के सचिव युगल किशोर पंत ने इसे पायलट परियोजना और देश में अपनी तरह का अभिनव प्रयोग बताया, जो अग्निवीरों को सेवा के बाद रोजगार की राह दिखाने में मदद करेगा। कुछ अग्निवीर सुरक्षा एजेंसियों, कुछ कॉरपोरेट क्षेत्र और कुछ स्वरोजगार के जरिए आगे बढ़ेंगे; रोजगार सेल इन्हें उनकी रुचि, योग्यता और कौशल के अनुरूप अवसरों से जोड़ने में सरकार की ओर से सहयोग करेगा।
बाबा जसवंत सिंह रावत आज भी ड्यूटी पर हैं !

अरुणाचल प्रदेश की करीब 10,000 फीट ऊंची पहाड़ियों में एक ऐसी सैन्य चौकी है, जहां आज भी एक सैनिक की ड्यूटी जारी मानी जाती है। नाम है राइफलमैन जसवंत सिंह रावत। गढ़वाल राइफल्स के वह वीर जवान, जिन्हें सैनिक आज ‘बाबा जसवंत’ कहते हैं।
19 अगस्त 1941 को पौड़ी गढ़वाल के बाड़ियू गांव में जन्मे जसवंत 19 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए। 17 नवंबर 1962 को नूरानांग की लड़ाई में उन्होंने अदम्य साहस दिखाया। साथी सैनिकों त्रिलोक सिंह नेगी और गोपाल गुसाईं के साथ उन्होंने चीनी सेना के खिलाफ मोर्चा संभाला। अलग-अलग स्थानों पर हथियारों की ऐसी व्यवस्था की कि दुश्मन को लगा, सामने पूरी भारतीय टुकड़ी है। उन्होंने अकेले 300 चीनी सैनिक मारे और करीब 72 घंटे तक प्रतिरोध के बाद वे वीरगति को प्राप्त हुए। उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र मिला। लेकिन इसके बाद शुरू हुई एक ऐसी कहानी, जो आज भी सैनिकों के बीच आस्था का विषय है।
मान्यता है कि बाबा जसवंत आज भी सीमा पर ड्यूटी करते हैं। जसवंतगढ़ में उनका कमरा, बिस्तर, वर्दी और जूते व्यवस्थित रखे जाते हैं। उनके लिए भोजन और चाय रखे जाने की परंपरा भी है। सैनिकों में विश्वास है कि ड्यूटी पर सोने वाले जवान को बाबा का अनुशासन झेलना पड़ता है। जहां उन्होंने अंतिम लड़ाई लड़ी, वहां बना ‘जसवंतगढ़ स्मारक’ आज सैनिकों की श्रद्धा का केंद्र है। देहरादून के सैन्य धाम में भी उनकी स्मृति को स्थान दिया गया है। उनकी वीरगाथा पर 2019 में ‘72 Hours: Martyr Who Never Died’ फिल्म भी बनी।

















