बहुआयामी वीर सावरकर : ‘भारतीय संवत्सर’ के स्वप्नद्रष्टा
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होम भारत

बहुआयामी वीर सावरकर : ‘भारतीय संवत्सर’ के स्वप्नद्रष्टा

भारत के सभी पंचांगों में एकसूत्रता लाने का प्रयास लोकमान्य तिलक तथा कुछ अन्य लोगों ने किया था, किंतु उसमें सफलता नहीं मिली। पूरे देश के लिए एक ही राष्ट्रीय कालदर्शिका हो, यह विचार आधुनिक भारत में सर्वप्रथम रखने वालों में वीर सावरकर प्रमुख थे- (11)वीं कड़ी

Written byडॉ. नीरज देवडॉ. नीरज देव
Sep 25, 2026, 09:01 am IST
inभारत

एक भाषा, एक लिपि, एक सेना और एक विधान के साथ-साथ एक राष्ट्रीय पंचांग का होना भी सावरकर को आवश्यक लगता था। लंदन में सावरकर स्वतंत्र भारत के संदर्भ में अनेक विषयों पर चर्चा-विमर्श करते थे। स्टुटगार्ट में मैडम कामा द्वारा फहराया गया पहला तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज भी सावरकर की प्रेरणा का परिणाम था। इसी काल में, लगभग 1907 में, उन्होंने अपने सहयोगियों के सामने भारत की अपनी कालदर्शिका होने का विचार रखा। उस समय इस विचार को व्यस्थित रूप प्राप्त नहीं हुआ था।

इसी समय फ्रांसीसी राज्यक्रांति का अध्ययन करते हुए उनकी दृष्टि कार्लाइल की एक पुस्तक पर गई, जिसमें फ्रांस के राष्ट्रीय पंचांग की विस्तृत जानकारी थी। 1792 में फ्रांस की घटना समिति ने ईसाई पंचांग को हटाकर नया पंचांग लागू किया। इसमें 30-30 दिनों के 12 महीने थे। बारहवें महीने के अंत में अतिरिक्त पांच दिन बुद्धि, श्रम, कर्म, फल और मतप्रचार जैसे राष्ट्रीय त्योहारों के लिए रखे गए थे। प्रत्येक चार वर्ष बाद एक अतिरिक्त दिन होता था, जिसे क्रांति उत्सव के रूप में मनाया जाता था। प्रत्येक महीने को दस-दस दिनों के तीन भागों में बांटा गया था, जिन्हें ‘दशक’ कहा जाता था। रविवार का अवकाश समाप्त कर दसवें दिन के अंत में छुट्टी दी जाती थी। इस व्यवस्था के अध्ययन से सावरकर के मन में भारतीय संवत्सर की कल्पना अधिक स्पष्ट हुई। किंतु क्रांतिकार्य, कालापानी तथा हिंदुत्व के निर्माण और प्रसार के कारण वे इस दिशा में आगे ध्यान नहीं दे सके।

भारतीय परंपरा से विसंगत रोमन पंचांग

सावरकर का मानना था कि रोमन पंचांग भारतीय परंपरा से विसंगत होने के साथ मूलतः भी अनेक असंगतियों से भरा है। वे इसके संबंध में मुख्यतः तीन बातें बताते हैं-

  1. महीनों के नाम और क्रम में विसंगति : मूलतः रोमन पंचांग का आरंभ मार्च से होता था, जिसे ईसाइयों ने बदलकर जनवरी कर दिया। इसी कारण सितंबर (सप्तम), अक्टूबर (अष्टम), नवंबर (नवम) और दिसंबर (दशम) अपने अर्थ के अनुसार क्रमशः 7वें, 8वें, 9वें और 10वें महीने न रहकर, दो-दो स्थान आगे खिसक गए।

  2. महीनों के नामों का भारतीय परंपरा से संबंध नहीं : जनवरी का नाम रोमन द्विमुखी देवता जेनस, मई का नाम बुद्धि की देवी तथा जून, जुलाई और अगस्त के नाम ज्यूनियर्स ब्रुटस, जूलियस सीजर और ऑगस्टस से संबंधित हैं। इनका भारतीय परंपरा और इतिहास से कोई संबंध नहीं है।

  3. धार्मिक प्रभाव : वर्ष के अनेक पर्व और उत्सव ईसाई धार्मिक परंपरा से जुड़े हुए हैं। इसके बावजूद भारत में ईस्वी सन् का प्रचलन मुख्यतः लगभग डेढ़ सौ वर्ष की अंग्रेजी राजसत्ता और उसकी शिक्षा-पद्धति के कारण हुआ।

ईस्वी सन् का उपयोग टाला जा सकता है?

सावरकर इस प्रश्न का उत्तर भारत के इतिहास से देते हैं। वे कहते हैं कि इस्लामी सत्ता के सात सौ वर्षों के दौरान भारत में इस्लामी कालगणना प्रचलित थी। मराठों के हिसाब-किताब में भी हिजरी तथा इस्लामी महीनों, तारीखों और दिनों का उपयोग दिखाई देता है। आज भी ‘दिन’ के लिए अनेक लोग ‘तारीख’ शब्द का प्रयोग करते हैं। भाषाशुद्धि के दौरान सावरकर ने ‘तारीख’ या ‘डेट’ के स्थान पर अर्थपूर्ण राष्ट्रीय शब्द ‘दिनांक’ सुझाया, जो आज प्रचलित है। यदि सात सौ वर्षों तक चलने वाली इस्लामी कालगणना अंग्रेजी सत्ता और शिक्षा के डेढ़ सौ वर्षों के बाद समाप्त हो सकती है, तो डेढ़ सौ वर्षों से प्रचलित ईस्वी कालगणना को भी बदला जा सकता है, ऐसा उनका तर्क था।

भारत में विभिन्न प्रकार के पंचांग और कालगणनाएं प्रचलित हैं, किंतु उनमें अनेक विसंगतियां हैं। पृथ्वी-अब्द या सृष्टि-अब्द करोड़ों वर्षों को दर्शाते हैं, जबकि शिव शक या दयानंद संवत् कुछ सौ वर्षों को। कुछ संवत्सरों का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है, तो कुछ का कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से। कुछ पंचांगों में महीने का आरंभ कृष्ण पक्ष से माना जाता है, तो कुछ में शुक्ल पक्ष से। क्षय और वृद्धि के कारण तिथियों में भी अनियमितता रहती है। सावरकर का मानना था कि इन सभी विसंगतियों को दूर कर सभी के लिए एक ही धार्मिक पंचांग बनाना न तो संभव है और न उचित। धार्मिक कार्यकलापों के लिए ये सभी पंचांग अपने-अपने रूप में चलते रहें; इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। सावरकर का मत था कि भारत में ईसाई और इस्लाम को मानने वाले उनके मजहबी कार्यों के लिए क्रमशः ईस्वी सन् और हिजरी कालगणना का उपयोग करना चाहें तो कर सकते हैं। उन पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।

सावरकर की कालदर्शिका

सावरकर अपनी कालदर्शिका को एक ‘ऐहिक’ (लौकिक/प्रशासनिक) कैलेंडर मानते थे। उन्होंने इसका नाम ‘भारतीय संवत’ प्रस्तावित किया ताकि इससे राष्ट्रीयता का बोध हो। इस पंचांग की प्रमुख विशेषताएं निम्न थीं:

  1. महीने और दिन: इसमें 12 महीने होंगे। पहले 11 महीने 30-30 दिनों के और अंतिम 12वां महीना 35 दिनों का होगा। लीप ईयर (प्रत्येक 4 वर्ष बाद) में अंतिम महीना 36 दिनों का होगा।

  2. सरल नामकरण: महीनों के नाम अंकवाचक (प्रथम मास, द्वितीय मास आदि) होंगे ताकि इन्हें समझना सरल रहे। सप्ताह और दिनों के नाम वर्तमान पद्धति के अनुसार ही रहेंगे।

  3. दिन की गणना: दिन का प्रारंभ और समाप्ति भारतीय पद्धति ‘उदयात् उदयते वारः’ के अनुसार होगी।

  4. प्राचीनता का बोध: सावरकर ‘भारतीय संवत्’ का पहला वर्ष 01 के स्थान पर 5001 से आरंभ करना चाहते थे। उनका तर्क था कि प्राचीन इतिहास को छोड़कर केवल ज्ञात इतिहास पर विचार करें, तब भी भारत का इतिहास कम-से-कम पांच हजार वर्ष पुराना मिलता है। अतः राष्ट्रीय पंचांग का प्रथम दिन भारतीय संवत् 5001, प्रथम मास, दिनांक 01 होना चाहिए। उनका मानना था कि यदि शासकीय स्तर पर वर्षगणना पांच हजार से आरंभ की जाए, तो हमें बार-बार अपने प्राचीनत्व को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। भारत सरकार ने नवंबर 1952 में मेघनाद साहा के नेतृत्व में कैलेंडर रिफॉर्म समिति गठित की। समिति ने शालिवाहन शक को राष्ट्रीय संवत्सर माना और महीनों की रचना चैत्रादि रखी। वैशाख से भाद्रपद तक 31-31 दिन, शेष महीनों में 30-30 दिन तथा चैत्र में प्रत्येक चार वर्ष बाद 31 दिन रखने की व्यवस्था की गई। 22 मार्च 1957 से इसे ‘भारतीय सौर’ के नाम से स्वीकृत किया गया।

समीक्षा

सर्वप्रथम ध्यान देने योग्य बात यह है कि सावरकर के उपर्युक्त लेख सरकारी समिति के गठन से लगभग डेढ़ वर्ष पहले केसरी के 13/20 मई 1951 के अंक में प्रकाशित हुए थे। गांधी-हत्या के घृणास्पद एवं द्वेषपूर्ण आरोपों के बाद तथा स्वतंत्र भारत सरकार की अधिकृत घोषणा से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय पंचांग का विचार बिना किसी व्यक्तिगत लाभ के प्रसारित करना उनकी निष्कलंक राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। यद्यपि सावरकर ने फ्रांसीसी गणतांत्रिक कैलेंडर से प्रेरणा ली थी, पर उसकी अव्यावहारिकताओं को अपने प्रस्ताव में नहीं अपनाया। फ्रांसीसी कैलेंडर में सप्ताह के स्थान पर ‘दशक’ था, जिससे कामगारों और सेवकों की वार्षिक छुट्टियां 52-53 से घटकर लगभग 36 रह गईं। इसी प्रकार 100 मिनट का एक घंटा करने से दिन के 24 घंटे घटकर 10 घंटे हो गए, जिससे दैनिक जीवन और यातायात में कठिनाई हुई।

इन कारणों तथा रोमन कैथोलिक प्रभाव के बढ़ने से मात्र 14 वर्षों में वह कैलेंडर बंद हो गया। सावरकर ने उससे केवल महीनों की मूल कल्पना ग्रहण की और शेष अव्यावहारिक व्यवस्थाओं का उल्लेख तक नहीं किया। भारत सरकार की समिति ने पंचांग को भारतीय रूप देने का प्रयास किया, किंतु ईस्वी सन् से प्राचीन युधिष्ठिर संवत, महावीर संवत या विक्रम संवत में से किसी को चुनने के बजाय 78 वर्ष पीछे के शालिवाहन शक को चुना। चैत्र, वैशाख आदि पारंपरिक महीनों के नाम भी यथावत रखे गए। इससे समस्या पूरी तरह हल होने के बजाय नई विसंगति उत्पन्न हुई। उत्तर और दक्षिण भारत में महीनों के आरंभ की परंपराएं अलग थीं और भारतीय सौर के उन्हीं नामों वाले महीनों का आरंभ दोनों से अलग तिथि पर होने लगा। इस प्रकार एक ही नाम के महीने के तीन अलग-अलग आरंभ दिखाई देने लगे।

सबसे बड़ी कमी यह रही कि भारतीय सौर का प्रयोग मुख्यतः सरकारी गजटों और कुछ शासकीय कार्यों तक सीमित रहा। परिणामतः ‘भारतीय सौर’ नामक राष्ट्रीय कालगणना की जानकारी आज भी सामान्य शिक्षित व्यक्ति में अपवादस्वरूप ही मिलती है।

सावरकर का प्रस्ताव स्वयं एक प्रारंभिक ढांचा था, जिसे वे भी पूर्ण व्यवस्था नहीं मानते थे। फिर भी राष्ट्रीय पंचांग को ऐहिक एवं राष्ट्रीय बनाने, धार्मिक पंचांगों की स्वतंत्रता बनाए रखने तथा भारतीय प्राचीनत्व को कालगणना में प्रतिष्ठित करने का उनका विचार मौलिक था। इस दृष्टि से वे आधुनिक भारत में राष्ट्रीय संवत्सर की कल्पना करने वाले दूरदर्शी चिंतकों में अग्रणी थे।

बहुआयामी वीर सावरकर की लिपि-दृष्टि

Topics: भाषाशुद्धिविदेशी शब्ददिन की गणनाभारतीय सिद्धांतआधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडरपाञ्चजन्य विशेषव्यवस्था में विषमताबहुआयामीशालिवाहन शकस्वप्नद्रष्टाभारतीय सौरविसंगतिकालदर्शिका
डॉ. नीरज देव
डॉ. नीरज देव
(दशग्रंथी सावरकर इस पीएचडी समकक्ष उपाधि से तथा महाराष्ट्र शासन-विवेक व्यासपीठ द्वारा ‘सावरकर वीरता’ पुरस्कार से सन्मानित) [Read more]
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