गलियारों में इलाज, भीड़भाड़ और खड़े हुए मरीज, आम तौर पर पश्चिमी मीडिया भारत के अस्पतालों के विषय मे यही चित्र प्रस्तुत करता है, और हम लोगों को भी यही लगता है कि भारत के अस्पतालों का अर्थ हुआ भीड़भाड़ और बदइंतजामी और विदेशों के अस्पतालों का अर्थ हुआ फाइव स्टार स्वास्थ्य देखभाल? परंतु क्या यह सच है? पहले भी पश्चिम के अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर तमाम तथ्य सामने आए हैं, मगर इस बार ब्रिटेन के अस्पतालों को लेकर जो रिपोर्ट सामने आई है, वह चौंकाने वाली है।
क्या है रिपोर्ट?
क्या हम और आप कभी भी यह कल्पना कर सकते हैं कि ब्रिटेन जैसे कथित विकसित देश में एक्सीडेंटल और इमरजेंसी अर्थात दुर्घटना और आपातकाल जैसे विभागों में बहुत ज्यादा भीड़ से हर सप्ताह सैकड़ों मरीज मर रहे हैं?
शायद हम नहीं कर सकते हैं? हमारा औपनिवेशिक मस्तिष्क इस बात को समझने के लिए और मानने के लिए तैयार हो ही नहीं सकता है कि कुछ ऐसा ब्रिटेन में हो सकता है?
मगर ऐसा हो रहा है। डेली मेल की एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में ऐसा हो रहा है। ब्रिटेन में 134 एएंडई विभागों में 19000 से ज्यादा मरीजों के आंकड़ों का अध्ययन और आँकलन किया गया, और इनमें पाया गया कि जैसे जैसे इमरजेंसी विभाग में मरीजों की संख्या क्षमता से अधिक बढ़ती है, वैसे ही मरीजों के अगले 28 दिनों में मरने का भी खतरा उत्पन्न हो जाता है।
डॉक्टर्स का कहना है कि स्थिति बहुत ही खतरनाक हैं। और समस्या इस सीमा तक भयावह है कि इसकी तुलना हर सप्ताह एक भयानक जम्बो जेट के क्रैश होने से कर सकते हैं।
क्या है इस अध्ययन में?
यह महत्वपूर्ण अध्ययन को ग्लास्गो यूनिवर्सिटी से जुड़े और पश्चिमी स्कॉटलैंड में इमरजेंसी मेडिसिन डॉक्टर के रूप में कार्यरत डॉ. मैकहेनरी ने अपने सहयोगियों के साथ किया है। इस अध्ययन के निष्कर्ष European Emergency Medicine Congress में प्रस्तुत किए गए तथा मूल शोध-संबंधी जानकारी European Society for Emergency Medicine (EUSEM) ने जारी की है।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने वर्ष 2025 के अलग-अलग समय खंडों के आँकड़े लिए गए थे। उन्होनें मुख्यतया दो बातों पर ध्यान दिया था। उन्होनें अध्ययन किया कि दुर्घटना और आपातकाल में कितनी भीड़ थी? अर्थात जो क्षमता थी, उपचार के लिए जितना स्थान था और क्यूबिकल्स थे, उनकी तुलना में कितने मरीज वहाँ पर मौजूद थे? और वहाँ आने के 28 दिनों के भीतर उनकी मृत्यु हुई या नहीं?
हालांकि सभी मौतों को ओवर क्राउडिंग के साथ नहीं जोड़ा गया है, मगर इस बात का अनुमान लगाया गया है कि मरीजों में भीड़ ज्यादा होने के कारण मौतों का खतरा बढ़ा था।
इस अध्ययन में यह पाया गया कि आपातकाल और दुर्घटना विभाग में 175% लोग थे। अर्थात यह मानकर चलें कि यदि किसी विभाग में 100 बेड हैं, उपचार के लिए तो वहाँ पर 175 लोग इलाज के लिए आए हुए थे।
इसका अर्थ यह हुआ कि वहाँ पर बेड कम हैं और मरीज ज्यादा। या कहें कि सुविधाएं आवश्यकता के अनुपात में काफी कम हैं।
इसके साथ ही इस स्थिति में जब बेड या अन्य स्थान उपलब्ध नहीं हो पाते हैं, तो मरीजों को कॉरिडर में ही इलाज दिया जाता है। इस अध्ययन में यह कहा गया कि इस कारण भी मृत्यु के आँकड़े बढ़े हैं।
अर्थात एनएचएस के अस्पतालों में जगह और सुविधाओं की कमी के कारण कॉरिडर में इलाज के कारण भी लोग मर रहे हैं।
डेली मेल के अनुसार रॉयल कॉलेज ऑफ नर्सिंग ने पहले ही इन विभागों में बेड की कमी को लेकर चेतावनी दी थी। जिसमें स्पष्ट कहा था कि इन विभागों में बेड न होने के कारण लोग अक्सर कॉरिडर में ट्रॉली में ही अटके रहते हैं और उन्हें न ही आक्सिजन मिल पाती है और न ही अन्य आपातकालीन उपकरण, और इसके चलते स्वास्थ्य कर्मी भी आपात मरीजों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं।
डॉक्टर रयान का कहना है कि आपातकालीन विभाग में भीड़ के बढ़ने से मरने वाले मरीजों की संख्या में वृद्धि हो रही है। उन्होनें कहा कि यह जानना महत्वपूर्ण है कि इसमें बहुत भीड़ है और भीड़ कम करके ही जीवन बचाने की संभावना को बढ़ाया जा सकता है।
उनके अनुसार ज्यादा भीड़ के कारण यह संख्या 550 हो सकती है, मगर उनके अध्ययन के एक छोटे हिस्से को यूरोपियन इमर्जेंसी मेडिसन कॉंग्रेस में प्रस्तुत किया गया था, उसके अनुसार यह संख्या 33 से लेकर 1083 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
एक और डॉक्टर Dr Felix Lorang, जो हालांकि इस शोध का हिस्सा नहीं थे, उन्होनें भी इसी ओर ध्यान दिलाया। उनका कहना था कि मरीज को एएंडई विभाग से सामान्य वार्ड में भेजना चाहिए, मगर चूंकि सामान्य वार्ड में भी जगहें नहीं होती हैं, तो मरीज इमरजेंसी में ही अटका रह जाता है और उसे उचित इलाज नहीं मिल पाता है। उनका कहना था कि ज्यादा भीड़ होने और कॉरिडर केयर का अर्थ यही हुआ कि कई इमरजेंसी मरीज बचेंगे ही नहीं।
भारत को लेकर मीडिया का भेदभाव पूर्ण रवैया
इसे लेकर वहाँ पर चर्चा का बाजार गर्म है। मगर जब इस रिपोर्ट की बात आती है, तो मीडिया के सिलेक्टिव दृष्टिकोण की बात आती है।
भारत जैसे देश मे, जहां आबादी भी ब्रिटेन से कहीं अधिक है और औपनिवेशिक मीडिया की दृष्टि में भारत पिछड़ा हुआ भी है, जहां पर उचित चिकित्सा सुविधाएं नहीं हैं, में यदि अस्पताल संबंधी ऐसी कोई भी रिपोर्ट आती तो उसका रवैया क्या होता?
क्या इतना ही सहज होता, जैसा ब्रिटेन के साथ है या पश्चिम की हर अव्यवस्था के प्रति होता है? बताइए, भीड़ के चलते सैकड़ों लोग अस्पतालों में हर सप्ताह मारे जा रहे हैं, और वहाँ पर ही नहीं, किसी भी देश मे यह विमर्श नहीं है, मगर यदि इसका आधा क्या चौथाई भी होता तो भारत को अपमान करने का विमर्श तैयार हो जाता।
प्रश्न यह नहीं कि ब्रिटेन में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव के कारण लोग मर रहे हैं, प्रश्न यह है कि भारत जैसे देश में चिकित्सा सुविधा, जहां पर विदेशों से हजारों लोग सस्ता और बेहतर इलाज कराने के लिए रोज आते हैं, उसकी चिकित्सा सुविधाओं पर लगातार नकारात्मक विमर्श क्यों खड़ा किया जाता है?
क्यों ब्रिटेन की अव्यवस्था को व्यवस्थागत मुद्दा बनाकर प्रस्तुत किया जाता है तो वहीं भारत की किसी भी बात को पिछड़ापन कहकर?

















