पितृ पक्ष में क्यों किया जाता है श्राद्ध? जानिए नर्मदा, गया और पितृ तर्पण से जुड़ी मान्यताएं
September 26, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम संघ @100 पंच परिवर्तन कुटुम्ब प्रबोधन

पितृ पक्ष में क्यों किया जाता है श्राद्ध? जानिए नर्मदा, गया और पितृ तर्पण से जुड़ी मान्यताएं

जानिये ब्रह्मांड का प्रथम श्राद्ध कहां हुआ था, भगवान राम ने कहां किया था पिता दशरथ का पिंडदान

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Sep 26, 2026, 07:17 pm IST
inकुटुम्ब प्रबोधन, धर्म-संस्कृति
पितृ पक्ष

पितृ पक्ष

पितृ पक्ष में न जाने किस रूप में कितने पुराने हमारे ज्ञात और अज्ञात पूर्वज आकर मिलेंगे। यही तो सबसे पवित्र और पुनीत दिन हैं, जब तर्पण कर पूर्वजों से आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।

शक्ति परमोच्च सत्ता के साथ अर्द्धनारीश्वर के रूप में सदैव विद्यमान है। शिवपुत्री मां नर्मदा प्रतिकल्पा के रूप में पितरों की तारणहार हैं। मां नर्मदा का प्रथम अवतरण ही पितरों के तर्पण के लिए हुआ था। मातृ नवमी को माताओं के लिए तर्पण का दिन नियत है।

इंद्र गया तीर्थ पर हुआ था ब्रह्मांड का प्रथम श्राद्ध

‘यथा हि गया शिर: पुण्यं, पूर्व मेव पठयते तथा रेवा तटे पुण्यं शूल भेद न संशया:। ”

इस श्लोक से स्पष्ट है कि मां नर्मदा ही श्राद्ध की जननी हैं। जबलपुर शहर से 15 किलोमीटर दूर गया तीर्थ के बराबर ही नर्मदा के दक्षिण तट,चरगवां रोड पर त्रिशूलभेद तीर्थ है। उसके पास इंद्र गया तीर्थ स्थान है, जहां पर सबसे पहला श्राद्ध हुआ था। जिस प्रकार गयाजी में पितरों का तर्पण करने से पितर संतुष्ट होते हैं, वैसे ही नर्मदा में श्राद्ध करने से पितरों को संतुष्टि मिलती है। यही है नर्मदा में श्राद्ध करने के महत्व का रहस्य।

स्कंदपुराण के रेवाखंड के अनुसार श्राद्ध क्या है। श्राद्ध क्यों करना चाहिए। इसका पता प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि, देवता और दानवों को भी नहीं था। सतयुग के आदिकल्प के प्रारंभ में जब नर्मदा पृथ्वी पर प्रकट हुईं, जब पितरों द्वारा ही श्राद्ध किया गया। सूर्य के कन्या राशि में भ्रमण के दौरान ही भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से श्राद्ध अर्थात महालय प्रारंभ हो जाता है।

पहला श्राद्ध नर्मदा में ही क्यों किया

स्कंदपुराण के रेवाखंड के अनुसार राजा हिरण्यतेजा अपने पितरों का तर्पण करने के लिए पृथ्वी के सभी तीर्थों में गए, लेकिन उनके पितर कहीं संतुष्ट नहीं हुए। तब उन्होंने पितरों से पूछा कि आपको कहां संतुष्टि मिलेगी। तब पितरों ने कहा कि हमारा तर्पण मां नर्मदा में ही करें। राजा पुरूरवा ने भी नर्मदा तट पर आकर अपने पितरों का तर्पण और यज्ञादि धार्मिक अनुष्ठान किए। नर्मदा के त्रिपुरी तीर्थ (जबलपुर ) इंद्र गया में अयोध्या के चक्रवर्ती राजा मनु ने भी अपने पितरों का तर्पण किया है।

मां नर्मदा ही ब्रह्मांड में एकमात्र ऐसी नदी है, जो आदिकल्प सतयुग से इस धरा पर विद्यमान है और वे सभी को तारने में सक्षम हैं। इसी वजह से ऋषि वशिष्ठ के कहने पर राजा मनु ने नर्मदा तट पर आकर पितरों का तर्पण व यज्ञादि किया। परशुराम जी ने भी नेमावर के पास तुरनाल में अपने पितरों का तर्पण किया था । गुजरात के चांदोद , अमरकंटक के पास आरंडी संगम में भी इसका विशेष महत्व है। स्कंदपुराण में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि नर्मदा में श्राद्ध करने से पितरों को विशेष संतुष्टि प्राप्त होती है।

नर्मदा में पिंडदान का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नर्मदा नदी में पिंडदान एवं पितृ तर्पण करना गया (बिहार) के फल्गु नदी से 16 गुना ज्यादा फलदायक होना बताया गया है। स्कंद पुराण के रेवा खंड के अनुसार नर्मदा नदी में अनेक स्थानों का महत्व है। पितृपक्ष के अवसर पर जो अपने पितरों को इस स्थान पर आकर पिंडदान व तर्पण करता है उसे और कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं रहती और इसका कई गुना फल भी प्राप्त होता है। प्राचीन मान्यता के अनुसार इन 16 दिन हमारे पूर्वज पितृलोक से पृथ्वी लोक पर आते हैं। ऐसे में श्राद्ध के 16 दिन में लोग अपने पितरों को जल देते हैं और उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करते हैं।

गया जी का महात्म्य

धर्म ग्रंथों में निहित है कि चिरकाल में गयासुर नामक एक असुर था। वह जगत के पालनहार भगवान विष्णु का परम भक्त था। गयासुर ने अपने तप से भगवान विष्णु को प्रसन्न कर देवताओं से भी अधिक पवित्र होने का वरदान पा लिया। ऐसा कहा जाता है कि तत्कालीन समय में गयासुर के दर्शन मात्र से व्यक्ति के सभी पाप मिट जाते थे। साथ ही मरने के बाद स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती थी। इससे स्वर्ग में अव्यवस्था फैल गई।

यह देख स्वर्ग के देवता चिंतित हो उठे। तब ब्रह्मा जी ने गयासुर से पवित्र स्थल पर यज्ञ करने की इच्छा जताई। यह सुन गयासुर स्वंय गया जी में भूमि पर लेट गए। इसी स्थान पर देवताओं ने गयासुर के शरीर पर यज्ञ किया। हालांकि, गयासुर का शरीर स्थिर रहा। यह जान सभी भगवान विष्णु के पास गए और गयासुर की भक्ति से मुक्ति दिलाने की इच्छा जताई। भगवान विष्णु जी गयासुर के शरीर पर विराजमान हो गए। उससे भी गयासुर विचलित नहीं हुए। उस समय भगवान विष्णु प्रसन्न होकर गयासुर से वर मांगने को कहा।

यह सुन गयासुर बोला-आप अनंत काल तक इस स्थान पर विराजमान रहें। भगवान विष्णु भाव विभोर हो गए। गयासुर का शरीर पत्थर में परिवर्तित हो गया। उस समय भगवान विष्णु ने कहा- जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से गया में अपने पितरों का पिंडदान करेगा। उसके मृत पूर्वज को मोक्ष की प्राप्ति होगी।

भगवान राम ने किया दशरथ जी का पिंडदान

त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने फल्गु नदी के तट पर अपने पिता दशरथ जी का पिंडदान किया था। अतः कालांतर से गया में पितरों का पिंडदान किया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज़ों का श्राद्ध किस तिथि पर किया जाए, इस प्रश्न का मान्यताओं अनुसार सही जवाब है कि अगर पितर, पूर्वज़ या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृ पक्ष में पड़ने वाली उक्त तिथि को ही उनका श्राद्ध किया जाना चाहिए। यदि देह त्यागने की तिथि के बारे में पता नहीं हो, तो इस स्थिति में आश्विन अमावस्या को श्राद्ध कर सकते है इसलिए ही इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। यदि किसी स्वजन की असमय मृत्यु अर्थात किसी दुर्घटना, आत्महत्या आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को करना चाहिए। पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करना उपयुक्त माना गया है।

क्या है श्राद्ध विधि

इन दिनों श्राद्ध करने वाले व्यक्ति देवी-देवताओं, ऋषियों और पितरों के नाम का उच्चारण करके श्राद्ध करने का संकल्प लेते हैं। इसमें जल में काले तिल मिलाकर पितरों को अर्पित किया जाता है। इस प्रक्रिया को तर्पण कहते हैं। इसे तीन बार किया जाता है। फिर चावल के बने पिंड बनाकर पितरों को अर्पित किए जाते हैं। यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाती है और इससे पितरों की आत्मा को तृप्ति मिलती है। श्राद्ध कर्म के अंत में ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और उन्हें वस्त्र, भोजन, तिल, और अन्य दान दिए जाते हैं। इसे पिंडदान से भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि ब्राह्मणों को पितरों का प्रतिनिधि माना जाता है।

परिवार में कौन कर सकता है श्राद्ध

घर का वरिष्ठ पुरुष सदस्य नित्य तर्पण कर सकता है। उसके अभाव में घर को कोई भी पुरुष सदस्य कर सकता है. पौत्र और नाती को भी तर्पण और श्राद्ध का अधिकार होता है। वर्तमान में स्त्रियां भी तर्पण और श्राद्ध कर सकती हैं। इस अवधि में दोनों वेला स्नान करके पितरों को याद करना चाहिए। कुतप वेला में पितरों को तर्पण दें। इसी वेला में तर्पण का विशेष महत्व है। पितृ पक्ष में हम अपने पितरों को नियमित रूप से जल अर्पित करें। यह जल दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके दोपहर के समय दिया जाता है। जल में काला तिल मिलाया जाता है और हाथ में कुश रखा जाता है। जिस दिन पूर्वज की देहांत की तिथि होती है, उस दिन अन्न और वस्त्र का दान किया जाता है। उसी दिन किसी निर्धन को भोजन भी कराया जाता है। इसके बाद पितृपक्ष के कार्य समाप्त हो जाते हैं। हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दिनों का बहुत ही खास महत्व है। हमारे परिवार के जिन पूर्वजों का देहांत हो चुका है, उन्हें हम पितृ मानते हैं। मृत्यु के बाद जब व्यक्ति का जन्म नहीं होता है तो वो सूक्ष्म लोक में रहता है। फिर, पितरों का आशीर्वाद सूक्ष्मलोक से परिवारवालों को मिलता है। पितृपक्ष में पितृ धरती पर आकर अपने लोगों पर ध्यान देते हैं और उन्हें आशीर्वाद देकर उनकी समस्याएं दूर करते हैं।

पितृ पक्ष की शुरुआत कब से

वर्ष 2026 में पितृ पक्ष 26 सितंबर 2026 (शनिवार) से प्रारम्भ होकर 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार) तक रहेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष की शुरुआत होती है और अश्विन मास की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या के रुप में इसका समापन होता है। किसी महालय अमावस्या भी कहते हैं।

इस वर्ष किसी भी तिथि का क्षय नहीं है, इसलिए श्राद्ध पक्ष पूरे 16 दिनों का होगा। श्राद्ध कर्म हमेशा दोपहर के समय (कुतप या रोहिणी मुहूर्त) में किए जाते हैं।

पितृ पक्ष 2026 की मुख्य तिथियां

  • 26 सितंबर 2026 (शनिवार) पूर्णिमा श्राद्ध
  • 27 सितंबर 2026 (रविवार)प्रतिपदा श्राद्ध यह पितृ पक्ष का पहला आधिकारिक दिन होगा
  • 28 सितंबर 2026 (सोमवार) द्वितीया श्राद्ध
  • 29 सितंबर 2026 (मंगलवार)तृतीया श्राद्ध
  • 30 सितंबर 2026 (बुधवार)चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध,
  • 1 अक्टूबर 2026 (गुरुवार)षष्ठी श्राद्ध
  • 2 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)सप्तमी श्राद्ध,
  • 3 अक्टूबर 2026 (शनिवार) अष्टमी श्राद्ध,
  • 4 अक्टूबर 2026 (रविवार) नवमी श्राद्ध यह मातृ नवमी – माताओं और सौभाग्यवती महिलाओं का श्राद्ध के लिए नियत है,
  • 5 अक्टूबर 2026 (सोमवार) दशमी श्राद्ध,
  • 6 अक्टूबर 2026 (मंगलवार)एकादशी श्राद्ध,
  • 7 अक्टूबर 2026 (बुधवार)द्वादशी और मघा श्राद्ध
  • 8 अक्टूबर 2026 (गुरुवार) त्रयोदशी श्राद्ध
  • 9 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार) चतुर्दशी श्राद्ध,
  • 10 अक्टूबर 2026 (शनिवार)सर्वपितृ अमावस्या -पितृ विसर्जन, ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों का श्राद्ध के लिए नियत है

कथित वामपंथी, तथाकथित सेक्युलर यह जानते ही हैं कि सनातन धर्म के अलावा अन्य किसी मत या मजहब में  परमोच्च सत्ता के साथ स्त्री का कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए वहां स्त्री के संबंध में कोई विमर्श नहीं है। इस संबंध में कल्चरल मार्क्सिज्म के फेमिनिज्म की अवधारणा गायब हो जाती है। सनातन धर्म में स्त्रियों के विमर्श पर वे सबसे पहले खड़े हो जाते हैं, जबकि सनातन धर्म के मूल में शक्ति ही है। सनातन धर्म में स्त्री को शक्ति कहा गया है। उसे परमोच्च स्थान प्राप्त है।

 

Topics: क्या है पितृ पक्षश्राद्ध कैसे करेंश्राद्ध क्या होता हैश्राद्ध कब से हैंपितृ पक्ष. गया जी का महत्वपितृ पक्ष नमृदा
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

No Content Available
Load More

ताज़ा समाचार

पितृ पक्ष

पितृ पक्ष में क्यों किया जाता है श्राद्ध? जानिए नर्मदा, गया और पितृ तर्पण से जुड़ी मान्यताएं

27 सितंबर का पंचांग

कल का पंचांग: 27 सितंबर से पितृपक्ष शुरू, प्रतिपदा श्राद्ध के लिए ये है शुभ समय; जानें राहुकाल समेत पूरा पंचांग

CM माझी ने कहा- पंडित दीनदयाल का ‘एकात्म मानववाद’ और ‘अंत्योदय’ ही समृद्ध ओडिशा की नींव 

Gold Rate Today

Gold Rate Today: सस्ता हुआ सोना, दिल्ली से लखनऊ और मुंबई तक चेक करें आज का ताजा भाव

भारतीय पुरुष कबड्डी टीम ने एशियाई खेलों 2026 में स्वर्ण पदक जीता

Asian Games 2026: भारत का कबड्डी में डबल धमाका, पहले बेटियों ने जीता गोल्ड, फिर पुरुष टीम ने ईरान को हराकर रचा इतिहास

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर(बाएं) और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ

संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान और शहबाज शरीफ की फजीहत

आज का मौसम

UP Weather: यूपी में 27 सितंबर तक बरसेंगे बादल, इन जिलों में भारी बारिश का अलर्ट

EPFO

आपके बाद किसे मिलेगा PF का पैसा, नॉमिनी को लेकर EPFO का ये नियम जरूर जान लें

कार्यक्रम

देहरादून में ‘वंदे मातरम्’ कार्यक्रम, 1,272 लोगों ने लिया हिस्सा; विद्यार्थियों में जगा राष्ट्रभाव

Uttarakhand weather

उत्तराखंड में भारी बारिश का रेड अलर्ट, CM धामी ने जारी की एडवाइजरी; नैनीताल में आज स्कूल बंद

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies