यह श्लोक स्पष्ट संदेश देता है कि स्वतंत्रता कोई अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि मानवीय लक्ष्यों की प्राप्ति का सबसे मूलभूत आधार है। स्वतंत्रता के बिना न तो राष्ट्रीय सुरक्षा संभव है और न ही व्यक्तिगत कल्याण।
श्लोक :
पुमर्थसाधनं तद्वत् पुमर्थफलदायकम्।
यदि स्वतन्त्रं स्वं राष्ट्रं नान्यथा मङ्गलप्रदम्॥
राष्ट्रालोक।।
भावार्थ-
यदि स्वराष्ट्र स्वतन्त्र हो, सभी चारों पुरुषार्थों का साधन तथा चारों पुरुषार्थों को देने वाला होता है, अन्यथा स्वतन्त्र होने पर वह मङ्गल देने वाला नहीं होता, प्रत्युत अमङ्गल देने वाला ही होता है।
आज की प्रासंगिकता : जब तक कोई देश राजनीतिक, मानसिक या आर्थिक रूप से परतंत्र रहता है, तब तक उसकी नीतियां उसके अपने नागरिकों के हित में न होकर दूसरों के स्वार्थ से संचालित होती हैं। स्वतंत्रता ही देशवासियों को अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चतुर्वर्ग पुरुषार्थ) को पाने का अवसर देती है।

















