यह प्रसिद्ध श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता संस्कृत के सुभाषितों (नीति-ग्रंथों) से उद्धृत है। यह ‘पञ्चतन्त्र’, ‘हितोपदेश’ और ‘महाभारत’ (शान्ति पर्व / उद्योग पर्व) जैसे नीति-शास्त्र ग्रंथों में सज्जनों (साधु पुरुषों) के लक्षण और नेतृत्व के गुण बताने के उद्देश्य से प्रयुक्त हुआ है।
श्लोक :
अनुगृह्णाति यः सर्वान् विगृह्णाति न केनचित्।
संगृह्णाति स एकाकी लोकान् शतसहस्त्रशः।।
भावार्थ :
जो सब लोगों पर अनुग्रह करता है, किसी से भी विग्रह (लड़ाई) नहीं करता, वह अकेला ही सैंकड़ो हजारों लोगों को साथ मिला लेता है।
आज के युग में प्रासंगिकता :
यह श्लोक आधुनिक युग में नेतृत्व क्षमता (Leadership), भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence), और मानव-संबंधों (Human Relations) का मूलमंत्र है:
सच्चा नेतृत्व और नेटवर्किंग (True Leadership & Collaboration):
आज के दौर में शक्ति या अधिकार के बल पर लोगों को लंबे समय तक नहीं जोड़ा जा सकता। जो व्यक्ति निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद (अनुग्रह) करता है, वह बिना किसी दबाव के अकेले ही हज़ारों-लाखों लोगों का दिल जीत लेता है और उन्हें अपने साथ जोड़ (संग्रह) लेता है।
विवाद-मुक्त जीवन और मानसिक शांति (Conflict Resolution):
आज का समय अत्यधिक तनाव, प्रतिस्पर्धा और वैचारिक मतभेद (विग्रह) का है। श्लोक सिखाता है कि अनावश्यक विवादों और शत्रुता से बचकर ऊर्जा को सकारात्मक और रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए।
टीम वर्क और समावेशी सोच (Inclusivity):
कॉर्पोरेट हो, राजनीति हो या सामाजिक जीवन—सफलता उसी को मिलती है जो “सबको साथ लेकर” (Inclusive Approach) चलने की कला जानता है।

















