चतुर्धा पुरुषा लोके संघकार्योपकारकाः।
मर्मज्ञा युक्तकर्मज्ञाः सद्गुणज्ञाः सुयोजकाः॥
भावार्थ :
समाज में संघ (संगठन) कार्य के उपकारक चार प्रकार के लोग होते हैं – मर्मज्ञ, योग्य कर्म को जानने वाले, सद्गुणों को जानने वाले और अच्छे योजक लोग।
श्लोक की प्रासंगिकता
किसी भी संघ, संस्था या संगठन को सुचारू रूप से चलाने और उसे सफलता के शिखर तक पहुंचाने के लिए चार विशेष योग्यताओं वाले व्यक्तियों की आवश्यकता होती है:
मर्मज्ञा : संगठन के उद्देश्य, सिद्धांत, कार्यपद्धति और सूक्ष्म पहलुओं (मर्म) को गहराई से समझने वाले लोग।
युक्तकर्मज्ञाः परिस्थिति के अनुसार उचित और योग्य कर्म को जानने वाले (व्यवहारिक/कुशल कार्यकर्ता)।
सद्गुणज्ञाः दूसरों के गुणों और क्षमताओं को पहचानने वाले लोग। ऐसे व्यक्ति समाज और संगठन में कमियों के स्थान पर दूसरों की अच्छाइयों को देखते हैं और सकारात्मक वातावरण बनाते हैं।
सुयोजकाः सही व्यक्ति को सही स्थान और कार्य पर लगाने वाले (कुशल प्रबंधक)। यह नेतृत्व का सबसे महत्वपूर्ण गुण है। जैसे चाणक्य ने कहा है-“योजकस्तत्र दुर्लभः” (जोड़ने वाला/नियोजन करने वाला दुर्लभ होता है)।

















